पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता का मूल्य समझने वाले समाज की कमी है!
हम पत्रकार से स्वतंत्र रहने, सत्ता से प्रश्न पूछने और सच बोलने की उम्मीद करते हैं; लेकिन जब उसकी स्वतंत्रता का मूल्य चुकाने की बारी आती है, तो सरकार, विपक्ष और समाज—तीनों पीछे हट जाते हैं!
सरकार को अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए पैसा देना पड़े, यह समझ में आता है। लेकिन जनता की ओर से सरकार से प्रश्न पूछने वाले पत्रकार को स्वतंत्र रहने के लिए पैसा कौन देगा—यह प्रश्न हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने कहीं बड़ा है!
बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का उपयोग करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाई जाए।
इसमें प्रथमदृष्ट्या में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां प्रश्न केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिला; प्रश्न यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।
एक लाख रुपये का असली मूल्य उसके नोटों में नहीं, उसके प्रभाव में है।
किसी पत्रकार से यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सरकार की आलोचना मत करो। उसे बस इतना कह दीजिए कि सरकार की योजनाओं पर ऐसा वीडियो बनाओ जिससे व्यूज आएं और हर एक लाख व्यूज पर दस हजार रुपये मिलेंगे। फिर देखिए, सेंसर की आवश्यकता कितनी बचती है। आदमी के भीतर बैठा छोटा-सा आर्थिक गणित कई बार बाहर बैठे बड़े सेंसर से अधिक प्रभावी होता है।
जहां प्रश्न पूछने से कुछ नहीं मिलता और सरकार की उपलब्धि बताने से पैसा मिलता है, वहां धीरे-धीरे प्रश्न कम नहीं होते; प्रश्न पूछने की कीमत बढ़ जाती है।
यही इस व्यवस्था का सबसे गंभीर पक्ष है।
सरकार यह नहीं कह रही कि केवल प्रशंसा करो। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि इस योजना से हर क्रिएटर बिक जाएगा। ऐसा निष्कर्ष तथ्य से आगे निकल जाना होगा। कोई पत्रकार सरकारी योजना की जानकारी लेते हुए उसकी कमियां भी बता सकता है। कोई क्रिएटर पैसा लेकर भी स्वतंत्र रह सकता है। भुगतान अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र केवल वास्तविक सेंसरशिप से नहीं बचता। वह हितों के टकराव से भी बचाया जाता है। आज सरकारी योजना का प्रचार करने पर पैसा है। कल सरकार की किसी नीति की आलोचना करने पर क्या होगा? क्या उस आलोचना के लिए भी उतना ही संस्थागत समर्थन होगा? अगर कोई पत्रकार सरकार की योजना की जांच करके बताए कि पैसा कहां खर्च हुआ, लाभार्थी तक पहुंचा या नहीं, भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, आंकड़े सही हैं या नहीं—तो क्या उसे भी वही आर्थिक सुरक्षा मिलेगी?
या फिर व्यवस्था का संदेश इतना भर होगा—सरकार के बारे में बोलिए, सरकार की तरफ से बोलिए; बस सरकार के विरुद्ध बोलते समय अपनी जेब देख लीजिए।
यहीं से मामला बिहार की एक सोशल मीडिया नीति से निकलकर भारतीय पत्रकारिता की उस पुरानी बीमारी तक पहुंच जाता है, जिसका इलाज आज तक किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं खोजा—स्वतंत्र पत्रकारिता आखिर जिएगी कैसे?
बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की अपनी समस्याएं हैं, लेकिन सबसे कठिन स्थिति उस पत्रकार की है जो छोटे शहर, कस्बे या गांव में कलम-कैमरा लेकर निकलता है। उसके पास न बड़ी संस्था का कानूनी विभाग है, न सुरक्षा तंत्र, न स्थायी वेतन, न आर्थिक संकट के समय कोई सुरक्षा कवच। वह भ्रष्टाचार पर खबर करता है तो सामने केवल अधिकारी या नेता नहीं होता; कई बार स्थानीय दबंग, कारोबारी, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक दबाव भी होता है। पत्रकारों की सुरक्षा समिति (#CPJ) की पुरानी जांचों ने भी दर्ज किया है कि भारत में भ्रष्टाचार और राजनीति पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों में छोटे शहर और ग्रामीण पत्रकार विशेष जोखिम में रहे हैं।
सीपीजे के अनुसार, 1992 से अब तक भारत में पत्रकारों की हत्याओं के 94 मामले दर्ज हैं। लेकिन इस संख्या के पीछे 94 परिवार हैं, जिनके घर से कोई एक आदमी निकला था—प्रश्न पूछने, सच सामने लाने और दूसरों की आवाज बनने। वह लौटकर नहीं आया। उसके बाद उसके परिवार को क्या मिला? कुछ मामलों में न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा, कुछ में चुप्पी और बहुतों में वह खालीपन, जिसे कोई पुरस्कार, कोई सम्मान और कोई सरकारी बयान कभी भर नहीं सकता। हम पत्रकार से मरते दम तक सच मांगते रहे, लेकिन जब सच के लिए उसकी जान चली गई, तब उसके परिवार के हिस्से में हमारा कर्ज भी नहीं आया।
और यहीं हमारी सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। हम पत्रकार से कहते हैं—सच बोलो। सच लिखो। लेकिन यह नहीं पूछते कि सच बोलने के बाद उसका घर कैसे चलेगा। हम कहते हैं—भ्रष्टाचार उजागर करो। लेकिन जब वह उजागर कर देता है तो मुकदमा हो जाए, धमकी मिले, विज्ञापन बंद हो जाए, या परिवार पर आर्थिक संकट आए, तब हम उसकी कहानी को अगले दिन की खबर भी नहीं बनने देते।
हम पत्रकार से सत्यनिष्ठा की उम्मीद करते हैं, लेकिन सत्यनिष्ठा का आर्थिक मूल्य चुकाने को तैयार नहीं हैं। फिर जब वही पत्रकार मजबूरी में किसी राजनीतिक दल, कारोबारी, विज्ञापनदाता या सत्ता के दरवाजे पर जाता है तो हम पूछते हैं—तुम बिक गए?
प्रश्न यह है कि उसे बिकने की मजबूरी किसने पैदा की?
सरकारों ने पत्रकारिता को अक्सर विज्ञापनदाता की दृष्टि से देखा। विपक्ष ने पत्रकारिता को अक्सर अपने संघर्ष के साथी की दृष्टि से देखा। लेकिन दोनों ने एक बुनियादी प्रश्न से बचने की कोशिश की—पत्रकार को स्वतंत्र रहने की कीमत कौन देगा?
सरकार को अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए बजट मिलता है। राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए संसाधन मिलते हैं। नेताओं के पास संगठन होते हैं। बड़े संस्थानों के पास पूंजी होती है। लेकिन वह पत्रकार, जो इन सबके बीच खड़ा होकर पूछता है कि “हिसाब कहां है?” उसके पास अक्सर केवल उसकी कलम, कैमरा और हिम्मत होती है। और हिम्मत से घर नहीं चलता।
यहीं विपक्ष भी कटघरे में खड़ा होता है।
सरकार अगर अपने संदेश को डिजिटल दुनिया तक पहुंचाने के लिए आर्थिक मॉडल बना सकती है तो विपक्ष क्यों नहीं? यदि विपक्ष को लगता है कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक है तो उसने कितने छोटे पत्रकारों के लिए कानूनी सहायता कोष बनाया? कितने पत्रकारों के परिवारों के लिए आपातकालीन सहायता की व्यवस्था की? कितने पत्रकारों को उपकरण, प्रशिक्षण या स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया?
सत्ता से लड़ते समय पत्रकार विपक्ष का साथी है, लेकिन संकट में पड़ते ही वह अचानक “व्यक्तिगत मामला” क्यों हो जाता है?
राजनीतिक दलों को पत्रकार की कलम और कैमरा चाहिए, पत्रकार की जिंदगी नहीं—तो फिर स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा का दावा किसलिए?
यही कारण है कि बिहार की नीति को केवल “सरकार क्रिएटरों को पैसा दे रही है” कहकर छोड़ देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में सूचना का आर्थिक ढ़ांचा किस दिशा में जा रहा है!
अगर सरकार अपनी उपलब्धियां बताने के लिए डिजिटल आवाजों को प्रोत्साहित करती है, तो उसी अनुपात में स्वतंत्र तथ्य-जांच, खोजी रिपोर्टिंग और जनहित की पत्रकारिता के लिए भी पारदर्शी, गैर-पक्षपाती और संपादकीय स्वतंत्रता सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था क्यों नहीं बन सकती?
सरकारी योजना का प्रचार करने वाले को पैसा देना आसान है। सरकार की उसी योजना की जांच करने वाले को स्वतंत्र रखने की व्यवस्था करना लोकतंत्र है।
अंतर यहीं है।
पहले राजा दरबारियों को पालता था और दरबारी राजा की प्रशंसा करते थे। आज लोकतंत्र में वही दृश्य लौट आए, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगा। लेकिन जोखिम किसी पुराने दृश्य की वापसी में नहीं, उसके आधुनिक रूप में छिपा है। आज दरबारी शायद पगड़ी पहनकर दरबार में नहीं बैठता। वह कैमरे के सामने बैठता है, हाथ में मोबाइल रखता है और कहता है—“दोस्तों, आज हम आपको सरकार की इस शानदार योजना के बारे में बताते हैं।”
समस्या यह नहीं कि वह योजना बताए। समस्या तब शुरू होगी जब वह यह भूल जाए कि योजना जनता के पैसे से बनी है और सरकार जनता ने चुनी है; इसलिए उसकी भूमिका सरकार की प्रशंसा करना नहीं, जनता को सच बताना है। और सच केवल वह नहीं जो सरकार बताना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार छिपाना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार को असहज करता है। सच वह भी है जिसमें सरकार की उपलब्धि है, और सच वह भी है जिसमें सरकार की विफलता है।
सरकार को केवल अपने अनुकूल सच पसंद आने लगे तो पत्रकारिता सूचना विभाग बन जाती है, और पत्रकार केवल वही दिखाने लगे जिससे उसका भुगतान सुरक्षित रहे, तो जनता धीरे-धीरे दर्शक नहीं, ग्राहक बन जाती है।
लेकिन इस कहानी का सबसे दुखद पहलू सरकार नहीं है। सबसे दुखद पहलू हम हैं।
हम एक सत्यनिष्ठ पत्रकार को देखकर कहते हैं—“बहुत अच्छा काम कर रहे हो।” लेकिन जब उसे कैमरा खरीदना हो, कानूनी लड़ाई लड़नी हो, घर चलाना हो या उसके बच्चे की फीस भरनी हो, तब हमारी अपनी सत्यनिष्ठा जेब में हाथ डालते ही गायब हो जाती है।
हम चाहते हैं कि कोई हमारे लिए सच बोले, लेकिन उस सच का मूल्य कोई और चुकाए। हम चाहते हैं कि कोई भ्रष्टाचार उजागर करे, लेकिन विज्ञापनदाता नाराज न हों। हम चाहते हैं कि कोई सत्ता से प्रश्न करे, लेकिन मुकदमा उसके ऊपर आए तो हम चुप रहें। हम चाहते हैं कि पत्रकार बिके नहीं, लेकिन उसे जिंदा रहने के लिए क्या मिले—इस पर बात नहीं करना चाहते।
शायद इसलिए हमारी सबसे बड़ी समस्या पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता का मूल्य समझने वाले समाज की कमी है।
और यही वह जगह है जहां सरकार और विपक्ष दोनों से बड़ा प्रश्न जनता के सामने खड़ा होता है। अगर सरकार अपनी बात कहने के लिए पैसा खर्च कर सकती है, जो जनता का ही है, तो जनता को अपनी बात कहने वाले पत्रकार के लिए क्या करना चाहिए?
अगर विपक्ष सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रकार को अपना स्वाभाविक साथी मानता है, तो उसे संकट में पड़े पत्रकार के साथ खड़ा होने का मूल्य क्यों नहीं चुकाना चाहिए? और अगर जनता चाहती है कि उसके पास कल भी कोई ऐसा व्यक्ति हो जो बिना डरे पूछ सके—“सरकार, हिसाब दो”—तो क्या उसे आज उस व्यक्ति को केवल लाइक और शेयर देकर छोड़ देना चाहिए?
क्योंकि पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल प्रेस क्लबों, संसद के भाषणों और संविधान की किताबों में सुरक्षित नहीं रहती। वह उस छोटी सी कलम और कैमरे के पीछे भी रहती है, जिसे लेकर कोई पत्रकार अकेला सड़क पर निकलता है। वह उस रिपोर्ट में रहती है जिसे छापने के बाद विज्ञापन बंद हो सकता है। वह उस प्रश्न में रहती है जिसके बाद फोन आ सकता है। वह उस खबर में रहती है, जिसके छपने के बाद जान से मारने की धमकी मिल सकती है। वह उस परिवार में रहती है जो जानता है कि उसका आदमी आज फिर किसी ताकतवर भ्रष्ट व्यक्ति के विरुद्ध खबर निकालने गया है।
और कभी-कभी वह उस खाली कुर्सी में भी रह जाती है, जहां बैठने वाला पत्रकार कभी वापस नहीं लौटता।
इसलिए असली प्रश्न यह नहीं कि बिहार सरकार एक लाख रुपये किसे दे रही है। असली प्रश्न यह है कि जिस दिन सरकार की ओर से बोलने वाले हर डिजिटल व्यक्ति के पास संसाधन होंगे और जनता की ओर से प्रश्न पूछने वाला पत्रकार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा होगा, उस दिन लोकतंत्र में आवाज किसकी बचेगी?
उस दिन सेंसरशिप की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि आवाजें स्वयं अपने ही भीतर चुप हो चुकी होंगी।
और शायद लोकतंत्र की सबसे खतरनाक हार वही होगी—जब सरकार को चुप कराने के लिए किसी पत्रकार का मुंह बंद करने की आवश्यकता ही न पड़े; उसकी मजबूरी ही उसकी आवाज बन जाए
लेखक : सी एम जैन
प्रस्तुति : सुरेश त्रिपाठी

