रेल भवन के कॉकरोच | भाग 4: कॉकरोचों को दाना डालना

अपने दायरे के विस्तार का काम विशेषज्ञता के साथ वही करता है जो काम पानी व्हिस्की के साथ करता है!”

एक अधिकारी जिसने कभी कन्वर्टर खोलकर नहीं देखा, वह अगले कन्वर्टर के लिए तकनीकी विनिर्देश नहीं लिख सकता, और न ही उसकी सर्विसिंग की कीमत पर बहस कर सकता है!

भारतीय रेल सार्वजनिक रूप से अपना पुनर्गठन नहीं करती। यह इसे कार्यालय आदेशों (office orders) के माध्यम से करती है। क्रमांकित, दिनांकित, दो पन्नों के, एक संयुक्त सचिव द्वारा हस्ताक्षरित, और वेबसाइट के एक ऐसे फोल्डर में दर्ज जिन्हें ढूंढने में रेलवे के अपने अधिकारियों को भी पसीने छूट जाते हैं। प्रत्येक आदेश छोटा होता है। प्रत्येक आदेश वैध होता है। किसी एक को पढ़िए तो आपको कुछ समझ नहीं आएगा। उन्हें ग्यारह वर्षों के क्रम में एक साथ पढ़िए, और आप देखेंगे कि कैसे एक विभाग बढ़ता ही चला गया है, जबकि रेल भवन में कोई भी कभीविस्तार‘ (#expansion) शब्द तक नहीं उच्चारित करता। यह श्रृंखला उन्हें क्रम से पढ़ती है!

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जनवरी 2015 में रेल भवन में एक छोटी सी चीज दाखिल की गई और हर किसी ने बिना रोके-टोके उसे आगे जाने दिया।
इसे पर्यावरण निदेशालय (Environment Directorate) कहा गया। एक सलाहकार इसे चलाते थे, जो सीधे अध्यक्ष को रिपोर्ट करते थे। छह निदेशालयों ने इसे एक-एक कार्यकारी निदेशक (Executive Director) उधार दिया। तीन महीने बाद एक कार्यालय आदेश में दर्ज किया गया कि यह एक निगरानी संस्था (monitoring agency) है, निष्पादक (executing agency) नहीं। अप्रैल तक इसे एक नया नाम मिल गया—पर्यावरण एवं हाउसकीपिंग प्रबंधन (#EnHM), और एक मामूली सा दायित्व एक आदर्श वाक्य के साथ कि “प्रदूषण पर नजर रखें। पानी पर नजर रखें। डिब्बों को साफ रखें!” यानि जिन्हें झाड़ू-पोंछा लगाने, साफ-सफाई करने का दायित्व सौंपा गया था, अचानक वे केवल आदेश देने, हुकुम चलाने और आदर्श झाड़ने की भूमिका में आ गए! और साथ में इस काम की लागत सैकड़ों गुना बढ़ी गई!

लेकिन किसी ने आपत्ति नहीं की, क्योंकि भला स्वच्छता पर कौन आपत्ति करता है।

ग्यारह साल बाद, उसी शाखा को हाइड्रोजन ट्रेनें सौंप दी गई हैं। जो स्वयं कुछ नहीं करती! मैं यहाँ कोई चालाकी भरी बात नहीं कर रहा हूँ। एक आदेश मौजूद है—संख्या, तारीख और हस्ताक्षर के साथ।

वह आदेश

कार्यालय आदेश संख्या 72 (2025 का), फ़ाइल संख्या 2025/O&M/7/20, दिनांक 17 अक्टूबर 2025, रेलवे बोर्ड के संयुक्त सचिव टी. श्रीनिवास द्वारा हस्ताक्षरित।

मुझे यह कहाँ मिला, यह बात मायने रखती है, इसलिए मैं आपको बताता हूँ। यह रेलवे बोर्ड के अपने आदेश पृष्ठ (order page) पर नहीं है। मुझे इसके अस्तित्व का तब तक पता नहीं था जब तक कि 3 मार्च 2026 के बोर्ड के एक पत्र में इसका सरसरी तौर पर उल्लेख नहीं आया। यह एक जोनल रेलवे के सर्वर पर पच्चीस पन्नों की फाइल के दूसरे पृष्ठ पर एक संलग्नक (enclosure) के रूप में सामने आया।

इसकी विषय पंक्ति (subject line) पूरी तरह से ठेठ रेल भवन शैली की है: “पर्यावरण एवं हाउसकीपिंग प्रबंधन (#EnHM) शाखा और मैकेनिकल इंजीनियरिंग (कोचिंग) शाखा की विषय सूचियों का संशोधन।”

तीन विषय मैकेनिकल इंजीनियरिंग (कोचिंग) शाखा से निकलकर पर्यावरण और हाउसकीपिंग प्रबंधन शाखा में चले जाते हैं। सेवा में लगे डिब्बों की स्वच्छता—जिसमें बायो-टॉयलेट और कूड़ेदान शामिल हैं। डिब्बों में पानी भरना (कोच वॉटरिंग)। और कोचिंग शौचालय नीति, कोच शौचालय प्रणालियों के डिजाइन और रखरखाव के साथ। वे मद संख्या (items) 10, 11 और 12 बन जाते हैं।

इसके बाद खंड 2 (clause 2) आता है, और मैं इसे पूरा उद्धृत करूँगा ताकि कोई मुझ पर काट-छाँट का आरोप न लगा सके।

“यह भी निर्णय लिया गया है कि ‘हाइड्रोजन से संबंधित परियोजनाओं और हाइड्रोजन ट्रेनसेट्स’ के विषय को EnHM शाखा को उनकी विषय सूची के मद सं. 13 के तहत आवंटित किया जाए।”

यह मद संख्या 13। ठीक कूड़ेदानों के बाद।

मद 10 से 13, एक साथ पढ़ने पर

मैं यहाँ अपने चुटीले विशेषणों के प्रयोग से बचूँगा, क्योंकि दोनों विषय स्वयं अपनी स्थिति बयान कर देते हैं।

मद सं. 10 एक शौचालय का पैन (lavatory pan) है जिसमें वाटर सील और बगल में एक डस्टबिन है। मद सं. 11 प्लेटफॉर्म पर लगा एक होज (पानी का पाइप) है। मद सं. 12 उस पैन से संबंधित नीति है। मद सं. 13 उच्च दबाव वाला हाइड्रोजन भंडारण, एक फ्यूल सेल स्टैक, और वह पावर इलेक्ट्रॉनिक्स है जो उस स्टैक के आउटपुट को ट्रैक्शन करंट में बदलता है।

एक विषय सूची। चार लगातार क्रमांक। एक ही डेस्क।

यह केवल फाइलों का कोई संयोग नहीं है

कोई आपसे कहेगा कि विषय सूची महज प्रशासनिक हाउसकीपिंग है, काम तो अब भी जोनों में ही होता है, और मैं स्टेशनरी की अलमारी को राई का पहाड़ बनते देख रहा हूँ।

मैं इस बात को गंभीरता से लेता यदि विषय सूची कुछ न करती। यह तीन काम करती है। जिस शाखा के पास कोई विषय होता है, वही तकनीकी विनिर्देश (specification) तैयार करती है। वह उस समिति में बैठती है जो उस विनिर्देश के आधार पर बोलियों (bids) का मूल्यांकन करती है। और जो डिजाइन वापस आता है, उस पर वही हस्ताक्षर करके मंजूरी देती है।

एक शौचालय और एक हाइड्रोजन फ्यूल सेल को एक ही मेज पर रख दीजिए, और आपने कोई पद नहीं बचाया है। आपने यह सुनिश्चित कर दिया है कि दोनों में से किसी भी विषय को ऐसा अधिकारी नहीं मिलेगा जो उसे समझता हो।

क्या होता है जब रेलवे अपनी ही मशीनों को समझना बंद कर देती है

यहाँ मुख्य आरोप है, और यह स्वच्छता के बारे में बिल्कुल नहीं है।

जब रेलवे विशेषज्ञता रखना बंद कर देती है, तो वह विशेषज्ञता हवा में गायब नहीं होती। वह कमरे में मौजूद एकमात्र उस पक्ष के पास चली जाती है जिसके पास वह बची है—यानि वह कंपनी जिसने आपको मशीन बेची थी। इसके बाद रेलवे मशीन तो एक बार खरीदती है, लेकिन उस ज्ञान को एक पूरी पीढ़ी तक खरीदती रहती है।

इसके बाद के आँकड़े प्रकाशित रिपोर्टिंग से हैं, मेरे पास मौजूद आदेशों से नहीं, और मैं प्रत्येक का संदर्भ दे रहा हूँ।

श्रीनंद झा ने 31 अक्टूबर 2022 को अपने लेख, Vande Bharat: The good and the bad में वंदे भारत बोली के दस्तावेजों पर रिपोर्ट करते हुए इन शर्तों को रेखांकित किया था। रेलवे विनिर्माण इकाईयाँ (manufacturing units), डिपो, वाशिंग लाइनें, सिविल संरचनाएं, क्रेनें, पटरियाँ, ओवरहेड उपकरण, और मुफ्त बिजली तथा पानी उपलब्ध कराती है। यह अपने स्वयं के कर्मचारियों का वेतन देती है। इसके बाद यह टेक्नोलॉजी पार्टनर को कुल अनुबंध मूल्य का अनुमानित 3.5 प्रतिशत वार्षिक रखरखाव शुल्क (#AMC) देती है।

और यह जनशक्ति (Men) भी मुहैया कराती है। यह बात तो बिल्कुल भी केवल रिपोर्टिंग की नहीं है। रेलवे बोर्ड के टेंडर WTA-527 के साथ संलग्न विनिर्माण एवं रखरखाव समझौते (Manufacturing cum Maintenance Agreement) के पृष्ठ 27 पर अनुच्छेद 6.1.2(c) में सरकार को “ट्रेनों के निर्माण और रखरखाव के लिए जनशक्ति प्रदान करने” के लिए बाध्य किया गया है।

अप्रैल 2022 में एक निविदा दस्तावेज के नौ शब्द। इन्हें भाग-5 पढ़ने तक याद रखिएगा।

वही रिपोर्ट दर्ज करती है कि निजी बोलीदाताओं ने 35 (पैंतीस) साल की रखरखाव अवधि पर इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि एक भारतीय कोच की निर्धारित उपयोगिता (codal life) पच्चीस वर्ष होती है। ध्यान दीजिए कि आपत्ति कौन कर रहा था। रेलवे नहीं—वेंडर या बोलीदाता।

जैसा कि हमने 8 जून 2026 को, A Coach Broke in Two—The Real Crack Is in Rail Bhavan! में लिखा था, एक एकल वंदे भारत डिपो के निर्माण में सरकारी खजाने पर ₹500 करोड़ से अधिक का खर्च आता है, और एक अकेला लोकोमोटिव लगभग एक दर्जन वार्षिक रखरखाव अनुबंधों (AMCs) से लदा हो सकता है।

और 15 अप्रैल 2025 को हमने लिखा था, The OEM vis-a-vis Third Party Maintenance Conundrum!”, जिसमें बताया गया था कि एक पावर कार पर ए-चेक (A-check), जो कभी ट्रेन लाइटिंग और एयर कंडीशनिंग कर्मचारियों द्वारा विभागीय रूप से मेनटेन किया जाता था, उसकी लागत अब कुछ सौ रुपये से बढ़कर 5,000 रुपये से अधिक तक पहुँच गई है।

इस श्रृंखला के मार्गदर्शक इसे मुझसे भी अधिक दो टूक शब्दों में कहते हैं। बिक्री या निर्माण कार्य अब मुख्य पुरस्कार (लाभ) नहीं रहा। पुर्जे (spares) सप्लाई और रखरखाव अनुबंध (maintenance contract) ही अब असली पुरस्कार हैं। यह एक चरित्र-चित्रण (characterisation) है, कोई निष्कर्ष (finding) नहीं, और मैं इसे उसी रूप में चिह्नित करता हूँ।

इसके नीचे की कार्यप्रणाली को किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं है। जिस अधिकारी ने कभी कन्वर्टर खोला ही नहीं, वह अगले के लिए विनिर्देश (स्पेसिफिकेशन) नहीं लिख सकता, और इसकी सर्विसिंग की कीमत पर वह मोलभाव या बहस भी नहीं कर सकता।

उचित पक्ष, और यह वास्तव में निष्पक्ष है

22 अप्रैल 2024 को उत्तर रेलवे में योजना एवं पर्यावरण और हाउसकीपिंग प्रबंधन की मुख्य यांत्रिक इंजीनियर (CME), अर्चना मित्तल ने दिल्ली, लखनऊ, मुरादाबाद और अंबाला मंडलों में हाउसकीपिंग विंग बनाने के लिए पत्र 143-M/44 पर हस्ताक्षर किए। मुझे यह एक ब्लॉग पोस्ट में फोटो के रूप में मिला, क्योंकि इसे कभी फाइल के रूप में प्रकाशित ही नहीं किया गया था।

इसके कारण वाले खंड (reason clause) को पढ़िए। ये विंग एक ऑडिट आपत्ति और एक संसदीय रिपोर्ट के अनुपालन के लिए बनाए गए थे। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (#CAG) ने 2022 की रिपोर्ट 16 में पाया था कि ऑडिट किए गए 54 मंडलों में से ग्यारह में कोई हाउसकीपिंग विंग ही नहीं था। उन ग्यारह में से चार उत्तर रेलवे में थे। लोक लेखा समिति (#PAC) ने 5 जनवरी 2024 को फिर से यही बात कही थी।

तो इसे स्वीकार करें, और हाँ, इसे पूरी तरह स्वीकार करें। वह आदेश कोई नया पद नहीं बनाता। वह चार मौजूदा पदों का नाम बदलता है। किसी विंग को बनाने में धीमी गति दिखाने वाला विभाग काम हथियाने वाला विभाग नहीं कहलाता।

अब इसका दूसरा पहलू देखिए। यह निदेशालय 2015 में बनाया गया था। नौ साल बाद, देश के सबसे सूक्ष्मता से जांचे जाने वाले उत्तर रेलवे जोन के चार मंडलों ने तब भी वह विंग नहीं बनाया था, और इसे तभी बनाया जब राष्ट्रीय लेखा परीक्षक और एक संसदीय समिति ने ऐसा करने को कहा। इसकी तुलना उस गति से कीजिए जिससे यही संगठन अपनी पसंद के विषय को अपने पाले में लगाकर तेजी से खींचता रहा है। इसके लिए कार्यालय आदेश 72 हेतु केवल एक पन्ना लगा था।

जिस सुधार को अस्तित्व में लाने के लिए ऑडिट का डंडा चलाना पड़े, वह कभी सुधार था ही नहीं। वह तो बस एक कथित निदेशालय था, जो अपने लिए उन कामों की सूची (duty list) तलाश रहा था, जो वास्तव में उसे स्वयं कभी करने नहीं थे।

विस्तार का कुल दायरा, एक साथ

अब इन ग्यारह वर्षों को एक पैराग्राफ में रखें, यही एकमात्र तरीका है जिससे कोई भी इस चालबाजी (क्रोनोलॉजी) को समग्रता में समझ सकता है।

वैगन और डिब्बे, शुरुआत से ही इनके पास थे। 28 अगस्त 2015 से मुख्य यांत्रिक इंजीनियर के तहत जोनल हाउसकीपिंग विंग। 2016 के कार्यालय आदेश 58 द्वारा इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट्स (#EMU), मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट्स (#MEMU) और ट्रेनसेट्स। लिनन (चादर-कंबल), कीट नियंत्रण (pest control) और ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग। 5 दिसंबर 2017 को कार्यालय आदेश 97 (2017) द्वारा हाउसकीपिंग निदेशालय को स्वयं मैकेनिकल इंजीनियरिंग निदेशालय के अधीन लाया गया—एक ऐसा दस्तावेज जिसके अस्तित्व के बारे में मुझे केवल इसलिए पता चला, क्योंकि बाद के एक आदेश में इसका संदर्भ दिया गया था। 28 जुलाई 2026 को न्यूट्रल कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (#NCO) के पुनरुद्धार से #IRSME (भारतीय रेलवे यांत्रिक इंजीनियर्स सेवा) के पांच अधिकारी पद, जिन्हें मौजूदा स्वीकृत पदों में से ही तराशा गया ताकि किसी को नए पदों की मांग न करनी पड़े।

और अब हाइड्रोजन।

इनमें से एक भी आदेश ‘विस्तार’ शब्द नहीं कहता। उन्हें एक-एक करके पढ़िए और आपको उनमें से किसी में भी कोई “विलेन” (खलनायक) नजर नहीं आएगा।

अगस्त के चार दिन

2 और 3 अगस्त 2026 के बीच, इस विभाग के स्वामित्व वाले इलेक्ट्रिक बेड़े के तीन मोटर कोच खराब हो गए।

पूर्व मध्य रेलवे के सिमरी बख्तियारपुर में तड़के 3.25 बजे एक मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (MEMU) में आग लग गई। अग्निशामक यंत्र उस पर काबू नहीं पा सके। चार दमकल गाड़ियों और सवा दो घंटे के कड़े संघर्ष के बाद आग बुझी। पश्चिम मध्य रेलवे के महिदपुर रोड पर एक गार्ड ने एक मोटर कोच के वैक्यूम सर्किट ब्रेकर के अंदर चिंगारी निकलते देखी, जिसमें बाद में आग लग गई। उस कोच का पिछले ही दिन ट्रिप निरीक्षण किया गया था। पुणे में एक मोटर कोच की टिन की छत टूट गई और ओवरहेड तार (#OHE) से छू गई।

मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि यह कोई आम चलन (trend) है, क्योंकि मैं ऐसा कह ही नहीं सकता। मुझे किसी ने हर दिन की कुल ट्रेनों की संख्या (denominator) नहीं दिया है, और भारतीय रेल हर दिन ऐसी कई हजार सेवाएं चलाती है।

ये तीनों घटनाएं जो दिखाती हैं, वह यह है कि शेड में जमीनी काम कैसा दिखता है। एक वैक्यूम सर्किट ब्रेकर कोई साधारण फिटिंग नहीं है। यह वह उपकरण है जो 25000 वोल्ट को ट्रेन के बाकी हिस्सों से अलग (isolate) करता है, और इसे मेंटेनेंस शीट पर केवल एक और लाइन की तरह समझना वही परिणाम है जो एक उलझी हुई कमान व्यवस्था के अंतिम छोर पर तकनीकी काम का अति-सरलीकरण करने से पैदा होता है।

आरोप, सटीक शब्दों में

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मैकेनिकल इंजीनियर अक्षम हैं। क्योंकि यह आरोप मूर्खतापूर्ण और अनुचित होगा, और इन शेडों को चलाने वाले लोग सेवा के किसी भी अन्य अधिकारी जितने ही योग्य हैं।

मैं कुछ अधिक संकीर्ण और बदतर बात कह रहा हूँ। “अपने दायरे के विस्तार का काम विशेषज्ञता के साथ वही करता है जो काम पानी व्हिस्की के साथ करता है।”

एक विभाग जिसके पास वैगन, कोच, वर्कशॉप, इलेक्ट्रिक यात्री बेड़ा, लिनन, कीट नियंत्रण, कोच में पानी भरना, शौचालय डिजाइन और हाइड्रोजन ट्रैक्शन सब कुछ है, वह उन सभी में गहराई (गहन विशेषज्ञता) नहीं रख सकता। कोई भी नहीं रख सकता। और जो गहराई वह खोता है, वह रेल भवन में नहीं टिकती। वह 35 साल के अनुबंध पर किसी वेंडर के तकनीकी सेवा प्रभाग (technical services division) के खाते में चली जाती है।

इसलिए यह मत पूछें कि दोषी कौन है। उन आदेशों में से प्रत्येक आदेश एक संयुक्त सचिव, एक सदस्य और एक फाइल से होकर गुजरा है। इसके बजाय यह पूछिए कि—“ग्यारह वर्षों में किसी भी मोड़ पर—कौन इस स्थिति में था कि वह उन्हें क्रम से पढ़ सके और कह सके कि इस शाखा के पास पहले से ही बहुत कुछ है!”

स्पैनर (पाना) पकड़ने वाले आदमी को कमान कौन देता है?

भाग-5 तक हो सकता है कि आपको इसका उत्तर पसंद न आए।