विशेष रिपोर्ट: उत्तर रेलवे निविदा घोटाले में CBI ने किया भ्रष्टाचार के बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़
बड़ौदा हाउस मुख्यालय से संचालित हो रहा था रिश्वत का खेल; नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का आरोप
नई दिल्ली: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (#CBI) की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (AC-III, नई दिल्ली) ने उत्तर रेलवे के बड़ौदा हाउस स्थित मुख्यालय में फैले एक बड़े रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है। सीबीआई ने 3 जुलाई 2026 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (संशोधित 2018) और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की संबंधित धाराओं के तहत एक नियमित मामला (#FIR No. RC2182026A0011, दिनांक 03.07.2026) दर्ज किया है। इस मामले में उत्तर रेलवे के दो वरिष्ठ अधिकारी, एक सीनियर क्लर्क और कानपुर की एक निजी चमड़ा कंपनी के निदेशकों को नामजद किया गया है।
FIR के मुख्य बिंदु
- अधिकारियों और निजी कंपनी की साठगांठ: सीबीआई को पुख्ता सूत्रों से जानकारी मिली थी कि उत्तर रेलवे मुख्यालय के चीफ मटीरियल्स मैनेजर (स्टोर) नरेंद्र सिंह और डिप्टी चीफ मटीरियल्स मैनेजर (स्टोर) सुआशीष मैती, सीनियर क्लर्क लेनिन शर्मा के साथ मिलकर कानपुर की निजी कंपनी मेसर्स मैश इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड (Mash & Co.) को नाजायज फायदा पहुंचा रहे थे। ये अधिकारी सरकारी खरीद के तय नियमों और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाकर रिश्वत के बदले रेलवे के टेंडर इस कंपनी को आवंटित कर रहे थे।
- टेंडर फिक्सिंग और 50% कोटे का आश्वासन: एफआईआर के अनुसार, रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी कंपनी के निदेशक शारिक अली को यह भरोसा दिलाया था कि टेंडर हर हाल में उनकी कंपनी को ही मिलेगा। अधिकारी ने यहां तक आश्वासन दिया था कि यदि तकनीकी कारणों से टेंडर किसी दूसरी कंपनी को चला भी जाता है, तो भी वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कुल सप्लाई का कम से कम पचास प्रतिशत हिस्सा मैश इंटरनेशनल को ही दिलाएगा। इस ‘कृपा’ के बदले में अधिकारी ने शारिक अली को रिश्वत की रकम के साथ निजी तौर पर मिलने को कहा था।
- गोपनीय सूचनाओं की लीक और एडवांस बिडिंग: इस भ्रष्टाचार के नेटवर्क में बड़ौदा हाउस में तैनात सीनियर क्लर्क (स्टोर) लेनिन शर्मा की भूमिका बेहद संदिग्ध पाई गई है। आरोप है कि लेनिन शर्मा रिश्वत के एवज में शारिक अली को रेलवे टेंडर्स से जुड़ी बेहद संवेदनशील और गोपनीय जानकारियां समय से पहले ही मुहैया करा रहा था। इस लीक सूचना के दम पर निजी कंपनी पहले से ही अपने बिड डॉक्युमेंट्स (निविदा प्रपत्र) इस तरह तैयार कर लेती थी कि टेंडर उसी को मिले, जिससे पूरी निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता और ईमानदारी खत्म हो गई।
- ‘सेफ्टी शूज’ का परचेज ऑर्डर और दिल्ली में रिश्वत की डिलीवरी: जांच में सामने आया कि 24 जून 2026 को उत्तर रेलवे के अधिकारियों ने मैश इंटरनेशनल के पक्ष में ‘सेफ्टी शूज’ का परचेज ऑर्डर जारी कर दिया था। इसके तुरंत बाद कंपनी के मालिकों—शारिक अली और एजाज अली—ने मिलकर विभिन्न रेल अधिकारियों को दी जाने वाली रिश्वत की रकम का पूरा ब्यौरा तैयार किया। तय सौदे के तहत शारिक अली रिश्वत की मोटी रकम लेकर खुद दिल्ली पहुंचा था, जहां उसे अधिकारियों को यह अवैध राशि सौंपनी थी। सीबीआई की सतर्कता के कारण इस पूरी साजिश का भंडाफोड़ हो गया।
यह एफआईआर इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि देश के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन तंत्र यानि भारतीय रेल के भीतर भ्रष्टाचार किस कदर अपनी जड़ें जमा चुका है। जब शीर्ष स्तर के नीति-निर्धारक और प्रबंधन संभालने वाले अधिकारी (जैसे चीफ मटीरियल्स मैनेजर और डिप्टी सीएमएम) ही रिश्वतखोरी के सिंडिकेट के सरगना बन जाएं, तो व्यवस्था की शुचिता की उम्मीद बेमानी हो जाती है।
टिप्पणी: रेलवे में ‘स्टोर और प्रोक्योरमेंट’ (सामग्री खरीद) विभाग हमेशा से भ्रष्टाचार का सबसे संवेदनशील अड्डा रहा है। इस मामले में जिस तरह से सुरक्षा से जुड़े उपकरण (सेफ्टी शूज) के टेंडर में हेराफेरी की गई, वह न केवल वित्तीय धोखाधड़ी है, बल्कि रेल कर्मचारियों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है। एक अदना सा क्लर्क पूरी व्यवस्था की गोपनीय फाइलों को निजी कंपनियों के सामने खोलकर रख देता है और वरिष्ठ अधिकारी एक-दूसरे के नाम पर रिश्वत वसूलने का कलेक्टिव सिंडिकेट चलाते हैं। यह दिखाता है कि डिजिटल इंडिया और ई-टेंडरिंग के दावों के बावजूद मानवीय हस्तक्षेप और सांठगांठ के जरिए पूरी पारदर्शिता को हाइजैक किया जा रहा है। ऐसे दीमकों पर केवल एफआईआर नहीं, बल्कि सेवा से बर्खास्तगी और संपत्ति कुर्की जैसी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सिस्टम में बैठे अन्य भ्रष्टाचारियों को कड़ा संदेश मिले।
भ्रष्टाचार का यह कोई पहला मामला नहीं है। सीबीआई ने पिछले कुछ सालों में भारतीय रेल के विभिन्न जोन में बड़ी कार्रवाईयां करते हुए करोड़ों रुपये की रिश्वतखोरी के मामलों में क्लास-1 अधिकारियों से लेकर चीफ ओएस और सुपरवाइजरों को रंगेहाथ दबोचा है। सीबीआई द्वारा हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के बड़े मामलों में दबोचे गए उच्च पदस्थ रेल अधिकारियों (जैसे DRM, PCMM, PCME) की संक्षिप्त सूची नीचे दी गई है:
- सौरभ प्रसाद, IRSME (डीआरएम/विशाखापतनम): इन्हें एक निजी फर्म के मालिक से ₹25 लाख की भारी-भरकम रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने रंगेहाथ दबोचा था। यह रिश्वत रेलवे के विभिन्न ठेकों में अनुचित लाभ पहुंचाने और जुर्माने को कम करने के एवज में ली जा रही थी। तलाशी के दौरान इनके ठिकानों से करोड़ों की बेनामी संपत्ति के दस्तावेज मिले थे।
- विनय सिंह, IRSE (डीआरएम/गुंटकल): दक्षिण मध्य रेलवे के गुंटकल डिवीजन के तत्कालीन डीआरएम को सीबीआई ने एक निर्माण कंपनी के बिल पास करने और निविदाओं में पक्षपात करने के लिए ₹11 लाख की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार किया था।
- अखिलेश कुमार जोशी, IRSS (PCMM-प्रिंसिपल चीफ मटीरियल मैनेजर/पूर्वोत्तर रेलवे): NER/गोरखपुर के पीसीएमएम पद पर रहते हुए इन्हें एक सप्लायर से रेलवे स्टोर के टेंडर्स को मंजूरी देने और सप्लाई आर्डर्स के एवज में ₹3 लाख की रिश्वत की किस्त लेते हुए रंगेहाथ पकड़ा गया था। उनके आवास से लाखों रुपये कैश भी बरामद हुए थे।
- रमेश कुमार चौबे, CEDE (मुख्य विद्युत वितरण इंजीनियर): मध्य रेलवे मुंबई में तैनात इस वरिष्ठ अधिकारी को रेलवे परियोजनाओं में काम करने वाली निजी कंपनियों के बिल पास करने के नाम पर ₹10 लाख की रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने ट्रैप किया गया था। बाद में उनके ठिकानों से ₹90 लाख से अधिक की नकदी जब्त हुई थी।
- महेंद्र सिंह चौहान, IRES (CAO-चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर/कंस्ट्रक्शन): पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR), गुवाहाटी में तैनात इस सबसे सीनियर क्लास-1 अधिकारी को सीबीआई ने रेलवे इतिहास के सबसे बड़े ट्रैप ऑपरेशंस में से एक के तहत पकड़ा था। इन्हें ठेकेदार से ₹1 करोड़ की घूस लेते हुए रंगेहाथ पकड़ा गया था।
- जितेंद्र पाल सिंह, IRSE (Sr.DEN-सीनियर डिवीजनल इंजीनियर): उत्तर पूर्व सीमांत रेलवे में तैनात इस अधिकारी को रेल पटरियों के आधुनिकीकरण और निर्माण कार्यों के बिलों के भुगतान के बदले ₹2 लाख की रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने रंगेहाथ दबोचा था।
- अतुल शर्मा (CDMS-चीफ डिपो मटीरियल सुपरिटेंडेंट): उत्तर रेलवे के अंबाला स्टोर डिपो में तैनात इस वरिष्ठ सुपरवाइजर को फर्मों के माल को पास करने और सप्लायरों को भुगतान जारी करने के एवज में ₹50,000 की घूस लेते हुए सीबीआई की एंटी-करप्शन विंग ने पकड़ा था।
यह सूची पूरी तो नहीं है मगर स्पष्ट करती है कि सीबीआई का फंदा अब केवल छोटे क्लर्कों या सुपरवाइजरों तक सीमित नहीं है, बल्कि रेलवे के ‘पावर सेंटर’ माने जाने वाले डीआरएम (#DRM) और प्रिंसिपल हेड ऑफ डिपार्टमेंट (#PHOD) स्तर के अधिकारी भी लगातार सीबीआई के राडार पर आ रहे हैं। यह सूची दर्शाती है कि नीचे क्लर्क और सुपरवाइजर स्तर से लेकर ऊपर के नीतिगत पदों पर बैठे अधिकारी तक भ्रष्टाचार की इस बहती नदी में नहा रहे हैं। बड़ौदा हाउस का यह ताजा मामला इसी सिलसिले की एक और शर्मनाक कड़ी है।

