संपादकीय: विकास की राह तभी आसान होगी जब नीति, प्रशासन और कानून—तीनों एक ही दिशा में चलें!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य स्पष्ट है—भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण बार-बार बैंकों से कहती हैं कि एमएसएमई (#MSME) क्षेत्र को कम ब्याज पर अधिक ऋण उपलब्ध कराया जाए, ताकि उद्योग बढ़ें, रोजगार सृजित हों और अर्थव्यवस्था मजबूत बने। वहीं रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव चाहते हैं कि रेल परियोजनाएँ तेज गति से पूरी हों और देश का आधारभूत ढ़ाँचा नई ऊँचाइयों तक पहुँचे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जमीनी व्यवस्था भी इसी सोच के साथ काम कर रही है?
आज रेलवे के ठेकेदार एक ऐसी व्यवस्था का सामना कर रहे हैं, जो विकास की गति को बढ़ाने के बजाय उनकी कार्यशील पूंजी (Working Capital) पर अनावश्यक बोझ डाल रही है।
सबसे बड़ा उदाहरण है जीएसटी (#GST) राशि पर परफॉर्मेंस गारंटी (#PG) और सिक्योरिटी डिपॉजिट लेना।
जीएसटी सरकार का कर है। ठेकेदार केवल इसे सरकार की ओर से वसूलकर जमा करता है। यह उसकी आय या लाभ का हिस्सा नहीं है। फिर भी रेलवे द्वारा जीएसटी सहित कुल अनुबंध मूल्य पर पीजी और सिक्योरिटी ली जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि ठेकेदार को उस राशि पर भी बैंक गारंटी शुल्क, ब्याज और वित्तीय लागत वहन करनी पड़ती है, जो अंततः सरकार के खाते में जानी है।
विडंबना यह है कि यदि कोई अनुबंध फोरक्लोज, टर्मिनेट या शॉर्ट-क्लोज हो जाता है, तो अधूरे कार्य पर रेलवे स्वयं जीएसटी का भुगतान नहीं करता, क्योंकि उस कार्य पर कोई कर देय ही नहीं होता। फिर प्रश्न उठता है—जब उस जीएसटी का भुगतान कभी होना ही नहीं है, तो उसकी अनुमानित राशि पर परफॉर्मेंस गारंटी क्यों ली जा रही है?
यह केवल एक तकनीकी या लेखा संबंधी विषय नहीं है। यह एमएसएमई की पूंजी, परियोजनाओं की गति और व्यवसाय करने की सुगमता (Ease of Doing Business) से जुड़ा प्रश्न है।
यदि एक ओर सरकार उद्योगों को सस्ता ऋण दिलाने का प्रयास करे और दूसरी ओर सरकारी विभाग उसी पूंजी को अनावश्यक गारंटी और सुरक्षा में बाँध दें, तो दोनों प्रयास एक-दूसरे के उद्देश्य को कमजोर कर देते हैं।
देश के विकास के लिए आवश्यक है कि नीतियों का उद्देश्य केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि हर प्रशासनिक स्तर पर उसकी भावना के अनुरूप निर्णय लिए जाएँ। रेलवे सहित सभी सरकारी विभागों को ऐसी प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जो कानून की भावना के अनुरूप न हों और उद्योगों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डालती हों।
प्रधानमंत्री विकास चाहते हैं। वित्तमंत्री चाहती हैं कि एमएसएमई को सस्ता और पर्याप्त वित्त मिले। रेलमंत्री चाहते हैं कि परियोजनाएँ समय पर पूरी हों। लेकिन यदि व्यवस्था पुरानी सोच और अव्यावहारिक प्रक्रियाओं से बाहर नहीं निकलेगी, तो विकास की रफ्तार धीमी पड़ना स्वाभाविक है।
विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब नीति, प्रशासन और कानून—तीनों एक ही दिशा में चलेंगे।

