अदालती कटघरे में उत्तर पश्चिम रेलवे के निर्णय: तीन बड़े अनुबंधों को समाप्त करने पर कानूनी प्रश्नचिन्ह

नई दिल्ली/जयपुर: उत्तर पश्चिम रेलवे (#NWR) द्वारा वर्ष 2026 में बुनियादी ढ़ांचागत परियोजनाओं से जुड़े अनुबंधों को समय से पहले टर्मिनेट करने के निर्णयों पर कानूनी प्रश्न खड़े होने लगे हैं। दो अलग-अलग उच्च न्यायालयों में लंबित तीन बड़े इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (#EPC) अनुबंधों से जुड़े मामलों में ठेकेदारों ने रेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर समान आरोप लगाए हैं। ठेकेदारों का दावा है कि रेलवे द्वारा बिना निर्धारित विवाद समाधान प्रक्रिया (#DAB) का पालन किए अनुबंध समाप्त किए जा रहे हैं और बैंक गारंटियां भुनाई जा रही हैं। हालांकि, अदालतों ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन अंतरिम आदेशों ने इस प्रशासनिक प्रक्रिया पर विचार करने के लिए मजबूर किया है।

जोधपुर स्टेशन पुनर्विकास: अदालती सहमति और विरोधाभास

मई 2026 में उत्तर पश्चिम रेलवे ने ₹477.5 करोड़ की जोधपुर रेलवे स्टेशन पुनर्विकास परियोजना के लिए ‘विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और EVRASCON’ के संयुक्त उपक्रम का अनुबंध समाप्त करने का निर्णय लिया था। साथ ही, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट की सिफारिश पर ₹47.75 करोड़ के लिक्विडेटेड डैमेज (पेनल्टी) की मांग की गई। रेलवे के इस निर्णय के विरुद्ध ठेकेदार ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया।

न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 26 मई 2026 को सुनवाई के दौरान रेलवे के कानूनी प्रतिनिधि ने सहमति जताई थी कि जब तक विवाद समाधान बोर्ड इस पर निर्णय नहीं लेता, तब तक हर्जाने की मांग पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। परंतु, इस सहमति के महज तीन दिन बाद, 29 मई 2026 को रेलवे ने अनुबंध समाप्ति का औपचारिक नोटिस जारी कर लगभग ₹17.23 करोड़ की चार बैंक गारंटियों को भुनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिनमें से करीब ₹8 करोड़ की दो गारंटियां भुना भी ली गईं।

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दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी और अंतरिम रोक

इस कदम के बाद ठेकेदार द्वारा दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाने पर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि रेलवे के समाप्ति नोटिस में 26 मई के अदालती आदेश का कोई संदर्भ नहीं था। सुनवाई के दौरान इस बात की स्पष्टता न होने पर कि क्या मामला DAB को भेजा गया था, अदालत ने शेष बैंक गारंटियों पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और भुनाई जा चुकी राशि के उपयोग पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछले न्यायिक आदेश का उल्लेख न करने वाला समाप्ति नोटिस गंभीर विचार का विषय है।

बीकानेर और जयपुर-सवाई माधोपुर परियोजनाओं में भी विवाद

अनुबंध समाप्ति का यह अकेला मामला नहीं है। बीकानेर रेलवे स्टेशन पुनर्विकास परियोजना में भी उत्तर पश्चिम रेलवे ने ‘VPRPL-KSIPL BKN JV’ का अनुबंध समाप्त कर करीब ₹19.95 करोड़ की परफॉर्मेंस गारंटी और सिक्योरिटी डिपॉजिट को जब्त करने का प्रयास किया। ठेकेदार कंपनी का दावा है कि परियोजना में देरी का मुख्य कारण रेलवे द्वारा टेंडर कंडीशन के अनुसार निर्धारित समय पर भूमि उपलब्ध न कराना और कार्यक्षेत्र में एकतरफा बदलाव करना था। इस मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर पीठ) ने बैंक गारंटी भुनाने पर रोक लगा दी है। इसके अतिरिक्त, जयपुर-सवाई माधोपुर डबलिंग परियोजना के अनुबंध को समाप्त किए जाने के फैसले को भी राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।

आगे की न्यायिक दिशा

वर्तमान में ये सभी मामले न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं। अदालतों को अभी यह तय करना है कि क्या इन मामलों में अनुबंधों की समाप्ति नियमानुसार वैध थी या ठेकेदारों की कथित लापरवाही इसके लिए जिम्मेदार थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उत्तर पश्चिम रेलवे को दोषी नहीं ठहराया है, लेकिन प्रक्रियात्मक चूक को लेकर चिंता अवश्य व्यक्त की है। मामले की अगली नियमित सुनवाई 2 जुलाई 2026 के बाद की तारीखों पर नियत है।

स्रोत: यह रिपोर्ट दिल्ली उच्च न्यायालय के सार्वजनिक आदेशों तथा विष्णु प्रकाश आर पुगलिया लिमिटेड द्वारा स्टॉक एक्सचेंज को दी गई सार्वजनिक सूचनाओं पर आधारित है। यह किसी भी पक्ष के दावों पर न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं है; सभी विवाद अभी न्यायालय के विचाराधीन हैं।