संपादकीय: विकास मॉडल, मेगा टेंडर और प्रतिस्पर्धा

पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा मंडल द्वारा नागदा–मथुरा सेक्शन में 7 रोड ओवर ब्रिज (#ROB) के निर्माण हेतु लगभग ₹251 करोड़ का एकीकृत टेंडर जारी किया गया है। रेलवे का उद्देश्य निश्चित रूप से सराहनीय है—कयोंकि रेल फाटकों (क्रॉसिंग) को समाप्त कर रेल यातायात को सुरक्षित और सुगम बनाना है। लेकिन इस टेंडर ने ठेकेदार जगत (कॉन्ट्रैक्ट वर्ल्ड) में कई गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सात अलग-अलग ROB परियोजनाओं को एक ही पैकेज में जोड़ना वास्तव में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है या उसे सीमित करता है? ₹251 करोड़ के विशाल टेंडर में भाग लेने के लिए उच्च बिड कैपेसिटी, भारी वित्तीय संसाधन, बैंक गारंटी, सिक्योरिटी डिपॉजिट और तकनीकी पात्रता की आवश्यकता होगी। परिणामस्वरूप स्थानीय और मध्यम श्रेणी के अनेक अनुभवी ठेकेदार शुरुआत में ही दौड़ से बाहर हो जाते हैं।

विवाद का दूसरा पहलू साइट उपलब्धता से जुड़ा है। निर्माण अवधि सीमित रखी जाती है, लेकिन अक्सर सभी ROB की साइटें एक साथ उपलब्ध नहीं होतीं। यदि कुछ पुलों की भूमि, अनुमतियाँ या रेलवे ब्लॉक वर्षों बाद मिलें, तो ठेकेदार की लागत, मशीनरी योजना और वित्तीय जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं। ऐसे में परियोजना में देरी का बोझ किसके कंधों पर डाला जाएगा—यह प्रश्न रेल प्रशासन से अब भी स्पष्ट उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।

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रखरखाव अवधि भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। यदि सात में से तीन ROB निर्धारित समय में बनकर चालू हो जाएँ और शेष परियोजनाएँ साइट न मिलने के कारण लंबे समय तक अटक जाएँ, तो क्या पूरे हो चुके कार्यों की सुरक्षा जमा (सिक्योरिटी डिपॉजिट), परफॉर्मेंस गारंटी और अन्य वित्तीय देयों को प्रो-रेटा आधार पर जारी किया जाएगा? या फिर ठेकेदार को वर्षों तक अपनी पूँजी फँसाकर रखनी पड़ेगी? यह केवल तकनीकी प्रश्न नहीं, बल्कि परियोजना वित्तपोषण का मूल मुद्दा है।

इसी पृष्ठभूमि में कुछ हलकों से यह आरोप भी सुनाई देता है कि बड़े पैकेजों से बड़े खिलाड़ियों को लाभ पहुँचता है या पहुँचाया जाता है और स्थानीय उद्यमियों के अवसर सीमित होते हैं। हालांकि किसी भी प्रकार की मिलीभगत, “सेटिंग” या “कमीशन” के आरोप अत्यंत गंभीर हैं और बिना ठोस साक्ष्य के उन्हें तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे आरोपों की पुष्टि केवल जांच और प्रमाण के आधार पर ही हो सकती है, न कि धारणाओं से।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पारदर्शिता केवल ई-टेंडरिंग से नहीं आती। पारदर्शिता तब आती है जब टेंडर संरचना, साइट उपलब्धता, भुगतान व्यवस्था और जोखिम वितरण इत्यादि विषय सभी पक्षों के लिए स्पष्ट और न्यायसंगत हों। यदि एक ही पैकेज में कई परियोजनाएँ शामिल की जाती हैं, तो यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि प्रतिस्पर्धा सीमित न हो और स्थानीय उद्योग को उचित अवसर मिले।

देश को तेज विकास चाहिए, लेकिन विकास का अर्थ केवल बड़े टेंडर नहीं हो सकते हैं। विकास का अर्थ ऐसी व्यवस्था है जिसमें परियोजनाएँ समय पर पूरी हों, प्रतिस्पर्धा अधिक हो और निष्पक्ष भी, स्थानीय उद्यमियों को अवसर मिलें और सार्वजनिक धन का सर्वोत्तम उपयोग हो। रेलवे और नीति निर्माताओं को इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि मजबूत पुलों और गुणवत्तापूर्ण कार्यों के साथ-साथ मजबूत विश्वास भी किसी भी विकास मॉडल की सबसे बड़ी आवश्यकता है।