संपादकीय: रेल परियोजनाओं में गुणवत्ता से समझौता—जिम्मेदार कौन?
भारत में रेलवे अवसंरचना के विस्तार पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (#DFCCIL), इरकॉन इंटरनेशनल (#IRCON) रेल विकास निगम लिमिटेड (#RVNL) तथा भारतीय रेल की विभिन्न परियोजनाओं में स्टेशन, प्लेटफॉर्म शेड, RUB/LHS शेड तथा अन्य संरचनात्मक कार्य तेजी से किए जा रहे हैं। लेकिन यदि इन परियोजनाओं में निर्धारित मानकों से कम गुणवत्ता वाली सामग्री का उपयोग हो रहा है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का भी गंभीर प्रश्न है।
कई निर्माण कार्यों में यह आरोप सामने आते रहे हैं कि ठेकेदार लागत बचाने के लिए न्यूनतम स्वीकार्य सीमा या उससे भी कम गुणवत्ता की सामग्री लगाने का प्रयास करते हैं। यदि वास्तव में 10 प्रतिशत माइनस टॉलरेंस वाले पाइपों का उपयोग किया जा रहा है और उनकी भुगतान प्रविष्टियां किसी अन्य अथवा उच्च दर वाले मद (आइटम) में दिखाई जा रही हैं, तो यह निश्चित रूप से तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक जांच का विषय बनता है।
सबसे चिंताजनक बात तब होती है जब परियोजना की निगरानी करने वाले अधिकारी, निरीक्षण एजेंसियां और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र ऐसे मामलों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करते। सार्वजनिक धन से बनने वाली संरचनाओं में गुणवत्ता से समझौता अंततः यात्रियों और नागरिकों की सुरक्षा को जोखिम में डाल सकता है। यदि किसी निर्माण में दोष पाया जाता है, तो जिम्मेदारी केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; डिजाइन की जांच करने वाले इंजीनियर, साइट निरीक्षण करने वाले अधिकारी, माप पुस्तिका (Measurement Book) प्रमाणित करने वाले कर्मचारी तथा भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारी भी जवाबदेही के दायरे में आने चाहिए।
भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप वह है जो कागज़ों पर सब कुछ सही दिखाकर वास्तविकता को छिपा देता है। जब गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था रिश्वत, दबाव या मिलीभगत के आगे कमजोर पड़ जाती है, तब नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होता, बल्कि जनता के विश्वास का भी होता है।
आज आवश्यकता है कि रेलवे और उसके सभी सार्वजनिक उपक्रमों में निर्माण कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, सामग्री की थर्ड-पार्टी जांच हो, और सभी भुगतान अभिलेखों को डिजिटल रूप से सार्वजनिक निगरानी के दायरे में लाया जाए। व्हिसलब्लोअर की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों के विरुद्ध कठोर दंड ही व्यवस्था में विश्वास बहाल कर सकता है।
यदि आरोप सही हैं, तो यह केवल एक परियोजना या एक विभाग का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और जनसुरक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। रेलवे के विकास की असली सफलता नई परियोजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही से मापी जानी चाहिए। भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कारगर कार्रवाई ही जनता को यह भरोसा दिला सकती है कि विकास के नाम पर गुणवत्ता और ईमानदारी की बलि नहीं चढ़ाई जाएगी।

