मंडल कार्यालय और जोनल मुख्यालय भी हफ्ते में छह दिन काम करें!

जब रेलकर्मी हफ्ते में 6 दिन और चौबीसों घंटे लगातार फील्ड में काम पर रहते हैं, तो मंडल कार्यालय और जोनल मुख्यालय भी कम से कम 6 दिन खुलें और काम करें। यह मांग फील्ड कर्मियों की तरफ से अब लगातार बढ़ती जा रही है।

भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े परिवहन नेटवर्कों में से एक है, जिसकी सफलता का आधार केवल नीतियां और योजनाएं नहीं, बल्कि हजारों फील्ड कर्मचारियों और अधिकारियों की निरंतर मेहनत है। रेल पटरियों के रखरखाव से लेकर सिग्नलिंग, विद्युत आपूर्ति, परिचालन और सुरक्षा तक, रेलवे का फील्ड तंत्र सप्ताह के छह दिन ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर चौबीसों घंटे सक्रिय रहता है।

आज स्थिति यह है कि फील्ड में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी 24×6 की कार्यसंस्कृति के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। दुर्घटना निवारण, ट्रैक अनुरक्षण, ट्रेनों का संचालन और आपातकालीन परिस्थितियों का प्रबंधन इत्यादि किसी निश्चित कार्यालय समय की प्रतीक्षा नहीं करता। रेलवे की सेवाएं लगातार चलती हैं और इन्हें सुचारु बनाए रखने वाले कर्मचारी भी लगातार कार्यरत रहते हैं।

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ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब रेलवे का फील्ड तंत्र छह दिन अथवा उससे अधिक सक्रिय है, तो कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए कम से कम छह दिवसीय कार्य व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?

फील्ड और कार्यालय, दोनों रेल संगठन के अभिन्न अंग हैं। फील्ड स्तर पर लिए जाने वाले अनेक निर्णयों और कार्यों की सफलता प्रशासनिक सहयोग पर निर्भर करती है। यदि कार्यालय और फील्ड की कार्यप्रणाली में समय और उपलब्धता का अंतर बढ़ता है, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके विपरीत, कार्यालयों में छह दिवसीय कार्य व्यवस्था से समन्वय बेहतर होगा, फाइलों के निस्तारण में तेजी आएगी और फील्ड इकाईयों को समय पर आवश्यक सहायता मिल सकेगी।

यह केवल कार्य दिवसों की संख्या का प्रश्न नहीं है, बल्कि संगठनात्मक संतुलन और कार्य संस्कृति का भी विषय है। रेलवे जैसे सेवा-प्रधान संगठन में समान प्रतिबद्धता और साझा उत्तरदायित्व की भावना आवश्यक है। जब फील्ड अधिकारी और कर्मचारी लगातार सेवा दे रहे हैं, तो कार्यालयीन व्यवस्था का भी उसी भावना के साथ सहयोगी बनना समय की मांग है।

भारतीय रेल की मजबूती उसके ट्रैक, इंजन और तकनीक से नहीं, बल्कि उसके कर्मचारियों की सामूहिक कार्यनिष्ठा से आती है। यदि फील्ड 24×6 की जिम्मेदारी निभा रहा है, तो कम से कम छह दिन कार्यालय संचालन की अपेक्षा न तो अनुचित है और न ही अव्यावहारिक। यह संगठनात्मक दक्षता और कार्य के प्रति समान प्रतिबद्धता की दिशा में एक स्वाभाविक कदम होगा।

समान कार्य के लिए समान वेतन, कठिन कार्य के लिए अधिक वेतन

रेलवे के ट्रैक अनुरक्षक कर्मचारियों के बीच यह मांग लगातार मुखर हो रही है कि वेतन संरचना में कार्य की कठिनाई, जोखिम और जिम्मेदारी को प्राथमिक आधार बनाया जाए। उनका कहना है कि जहां एक ओर अनेक कर्मचारी एवं अधिकारी वातानुकूलित कार्यालयों में अपेक्षाकृत अत्यंत सुविधाजनक परिस्थितियों में कार्य करते हुए उच्च वेतन प्राप्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ट्रैकमैन भीषण गर्मी, कड़ाके की सर्दी, वर्षा और निरंतर सुरक्षा जोखिमों के बीच रेल पटरियों की निगरानी और अनुरक्षण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं, फिर भी उनका वेतन अपेक्षाकृत कम है।

ट्रैक कर्मियों का तर्क है कि यदि रेलवे सुरक्षा की पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है, तो उनके वेतन और भत्तों में भी उसी अनुरूप सम्मान और न्याय दिखाई देना चाहिए, अर्थात जो अधिकार और सम्मान उनके श्रम और जिम्मेदारी के अनुरूप है, वह उन्हें मिलना चाहिए।

उनका मानना है कि वेतन निर्धारण का मूल सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए — “समान कार्य के लिए समान वेतन, कठिन कार्य के लिए अधिक वेतन।” रेलवे के फील्ड कर्मचारियों का कहना है कि जो कर्मचारी अधिक जोखिम, अधिक शारीरिक श्रम और अधिक जिम्मेदारी उठाते हैं, उन्हें अधिक पारिश्रमिक मिलना चाहिए, जबकि अपेक्षाकृत कम जोखिम और सुविधाजनक वातावरण में होने वाले कार्यों के लिए वेतन संरचना की समीक्षा की जानी चाहिए। उनका मानना है कि भारतीय रेल में वेतन और कार्य-दायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

न्याय चाहते हैं ट्रैकमैन

भारतीय रेल की सुरक्षा और विश्वसनीयता की नींव ट्रैकमैनों के अथक परिश्रम पर टिकी हुई है। भीषण गर्मी, कड़ाके की सर्दी, मूसलाधार बारिश और हर प्रकार के जोखिम के बीच वे दिन-रात पटरियों की निगरानी और अनुरक्षण करते हैं, ताकि करोड़ों यात्री सुरक्षित यात्रा कर सकें। इसके बावजूद ट्रैकमैनों का एक बड़ा वर्ग महसूस करता है कि उनके श्रम, जिम्मेदारी और योगदान के अनुरूप उन्हें सम्मान, सुविधाएं और आर्थिक प्रतिफल नहीं मिल रहा है।

आज ट्रैकमैन किसी विशेषाधिकार की मांग नहीं कर रहे हैं; वे केवल न्याय चाहते हैं। उनकी मांग है कि वेतन, भत्तों, पदोन्नति और सेवा शर्तों में उनके कार्य की कठिनाई, जोखिम और जिम्मेदारी को उचित महत्व दिया जाए। एक ऐसे संगठन में, जहां सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, वहां सुरक्षा की पहली पंक्ति में खड़े कर्मचारियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

ट्रैकमैनों की आवाज स्पष्ट है — “साड्डा हक़, ऐथे रख।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सम्मानजनक व्यवहार, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग है। भारतीय रेल की मजबूती तभी सुनिश्चित होगी जब पटरियों पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी उतना ही महत्व दिया जाए जितना उन प्रणालियों को जो कार्यालयों से संचालित होती हैं। ट्रैकमैन न्याय चाहते हैं, और उनकी इस मांग को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।