WCR : टेंडरिंग प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न

कोटा डिवीजन, पश्चिम मध्य रेलवे (#WCR) की गति शक्ति यूनिट द्वारा जारी एक बड़े टेंडर ने निर्माण कंपनियों और ठेकेदारों के सामने गंभीर समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। उपलब्ध डॉक्यूमेंट के अनुसार, कोटा मंडल के नागदा–मथुरा सेक्शन में LC No. 58, 60, 75, 123, 128, 216 एवं 217 के स्थान पर बनने वाले 7 रेलवे ओवर ब्रिज (#ROB) के कार्यों को एक ही मेगा टेंडर में शामिल किया गया है। इस टेंडर में Two Packet System, Eligibility Criteria, Bid Capacity, Joint Venture participation तथा Price Variation Clause (#PVC) जैसी शर्तें भी लागू की गई हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि निविदा का स्वरूप सामान्य प्रतिस्पर्धी टेंडरिंग से हटकर एक बड़े पैकेज मॉडल की ओर बढ़ रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ₹130.69 करोड़ से अधिक लागत के चार रोड ओवर ब्रिज (#ROB) के निर्माण कार्य के लिए जारी टेंडर नंबर GSU-Kota-08-2025 में कुल 16 फर्मों ने भाग लिया था, लेकिन आश्चर्य वाली बात यह रही कि फाइनेंशियल बिड केवल दो फर्मों की ही खोली गई, बाकी 14 प्रतिभागियों को उनकी फाइनेंसियल बिड खोले बिना ही प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने रेलवे की टेंडरिंग प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रतिस्पर्धा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

पुन: पढ़ें—“पश्चिम मध्य रेलवे में बड़ा टेंडर विवाद—सीमित की गई प्रतिस्पर्धा!

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निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि 7 अलग-अलग ROB निर्माण कार्यों को एक ही टेंडर पैकेज में जोड़ना स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा को सीमित करने वाला कदम है। यदि ऐसे कार्य अलग-अलग निविदाओं में निकाले जाते, तो उनमें अधिक संख्या में छोटे, मध्यम और क्षेत्रीय कांट्रेक्टर भाग ले सकते थे। लेकिन जब कई बड़े कार्यों को क्लब करके एक मेगा पैकेज बना दिया जाता है, तो उसकी टेंडर वैल्यू इतनी बढ़ जाती है कि केवल बड़ी कंपनियाँ या जॉइंट वेंचर ही उसमें प्रभावी रूप से भाग ले पाते हैं। इससे न केवल #MSME सेक्टर पर सीधा असर पड़ता है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया में वास्तविक प्रतिस्पर्धा भी घट जाती है।

Techno-Commercial Tabulation

ठेकेदारों का आरोप है कि इस प्रकार की टेंडर पॉलिसी से बाजार कुछ सीमित बड़े खिलाड़ियों तक सिमट रहा है। उनका कहना है कि रेलवे और अन्य सार्वजनिक संस्थानों की टेंडरिंग सिस्टम का मूल उद्देश्य अधिकतम प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना होना चाहिए, ताकि सरकार को बेहतर रेट्स और गुणवत्ता मिल सके। लेकिन जब eligibility norms, bid capacity, bank guarantee और package size इस तरह तय किए जाएँ कि छोटे एवं मध्यम ठेकेदार स्वतः बाहर हो जाएँ, तो इससे अंततः नुकसान पब्लिक फंड्स को ही होता है। कम बोलीदाता होने का सीधा अर्थ है कि रेट्स प्रतिस्पर्धी नहीं रहेंगे और प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ने की संभावना अधिक होगी।

Tabulation Statement of Financial Bids

तकनीकी दृष्टि से भी इस टेंडर मॉडल पर गंभीर आपत्ति जताई जा रही है। रेलवे ओवर ब्रिज का कार्य केवल सिविल कंस्ट्रक्शन तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें railway coordination, GAD approval, design clearance, utility shifting, foundation work, superstructure, girder launching, traffic diversion तथा safety block जैसी कई जटिल प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। ऐसे में 7 अलग-अलग लोकेशन पर स्थित ROB कार्यों को एकसाथ एक ही टेंडर में समेटना एक्ज़ेक्यूशन को और अधिक जटिल बना देता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हर साइट की ground condition, traffic pattern, land availability और local hindrances अलग-अलग होते हैं, इसलिए इतने बड़े clubbed package का प्रशासनिक और तकनीकी संतुलन भी सवालों के घेरे में है।

दस्तावेज़ में यह भी दर्शाया गया है कि टेंडर में बिड कैपेसिटी और जॉइंट वेंचर फर्मों की अप्लिकेबिलिटी लागू है, जो सामान्यतः बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए रखी जाती है। लेकिन जब कई अलग-अलग कार्यों को मिलाकर एक आर्टिफ़िशियल मेगा टेंडर बनाया जाता है, तो यही शर्तें कम्पीटीशन को और सीमित कर देती हैं।

निर्माण क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इस प्रकार की टेंडर स्ट्रक्चरिंग का प्रभाव यह होता है कि छोटे और मध्यम कांट्रेक्टर, जिनके पास पर्याप्त अनुभव और लोकल एक्ज़ेक्यूशन कैपेसिटी होती है, वे केवल फाइनेंसियल एवं क्वालिफिकेशन बैरियर्स के कारण बाहर हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति लंबे समय में स्वस्थ खुली बाजार प्रतिस्पर्धा के लिए घातक मानी जा रही है।

अब इस पूरे मामले में टेंडरिंग प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर कई प्रश्न उठ रहे हैं। मांग की जा रही है कि रेल प्रशासन स्पष्ट करे कि 7 ROB को एक ही टेंडर में क्लब करने की वास्तविक आवश्यकता क्या थी और क्या इस मॉडल का प्रभाव MSME भागीदारी तथा प्रतिस्पर्धा पर आंका गया है। इसके साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि भविष्य में इस प्रकार के मेगा पैकेजिंग मॉडल के बजाय साइट या कार्य के आधार पर टेंडर जारी किए जाएँ, ताकि अधिकतम प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक परियोजनाओं में प्रतिस्पर्धा कम होगी, तो उसका सीधा प्रभाव लागत, पारदर्शिता और सरकारी बचत — तीनों पर पड़ेगा। यही कारण है कि पश्चिम मध्य रेलवे का यह मेगा टेंडर अब केवल एक निर्माण पैकेज नहीं, बल्कि टेंडर पॉलिसी और सार्वजनिक रुचि (public interest) का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।