हम यूपीएससी निकाले हैं !!!

यूपीएससी जिन्दाबाद थी, जिन्दाबाद रहेगी—कभी कुछ करने से, कभी कुछ न करने से। दरअसल तीन-चार साल तक की ‘मेहनत’ और गाँव के, पड़ोस के, या किसी और परिचित का हो जाना केंडीडेट्स को ‘डिलूजन’ की अगली सीढ़ी तक ले जाता है। इसमें ‘सोशल प्रेशर’ का बहुत बड़ा हाथ होता है। लोग-बाग, घरवाले पूछने लगते हैं। शुरू-शुरू में यह वीआईपी ट्रीटमेंट बहुत एंजॉयेबल लगता है। सब जगह पूछ हो रही होती है।
लोग ईर्ष्या से देखते हैं और अपने उनसे भी नालायक बच्चों को उसका उदाहरण देने लग पड़ते हैं। केंडीडेट ये ‘न्यू फाउंड स्टेट्स’ खूब एंजॉय करता है। घर से खुले पैसे मिलते हैं। कोई पूछने वाला नहीं। आप इस लायक हैं या नहीं? इसको कोई नहीं देखता। आपने कितनी मेहनत वाकई की है या सब हवा-हवा है। वे दूसरों को अपना छद्म रूप दिखाते-दिखाते खुद उसके भँवर जाल में फंस जाते हैं और खुद उसी में यकीन करने लगते हैं।
पहले ऐसा बहुत कम होता था, बल्कि न के बराबर ही था कि कोई झूठा क्लेम करे कि वह यूपीएससी पास हो गया है। आज हालत ये है कि पचासियों लड़के-लड़कियां मंसूरी अकेडमी पहुँच जाते हैं और अनधिकृत तरीके से अकेडमी में घुसने की कोशिश करते हैं। कहना न होगा कि उनको गेट से ही भगा दिया जाता है। फिर वे ‘मेन गेट’ के बाहर या ‘जेनुइन’ आईएएस के समूह के साथ फोटो लेते हैं, सेल्फी लेते हैं और सैर-सपाटा करके घर वापिस आ जाते हैं।
घर आकर कोई कहानी सुना देते हैं यथा इस बार सीट फुल हो गई हैं बाद में बुलाएँगे। या फिर हमारा नंबर अगले बैच में आयेगा आदि आदि। घर में पड़ोस में, गाँव में खूब वीआईपी बने घूमते रहेंगे। यहाँ सम्मान हो रहा है, वहाँ डीजे बज रहे हैं। टीवी में इंटरव्यू चलेंगे। इलाके के थानेदार, क्षेत्र का विधायक आ-आकर आपको, आपके माता-पिता का सम्मान करेंगे। इसका अगर आप गंभीरता से विश्लेषण करें तो पता चलेगा यह भी एक मनोविकार है।
आप अपने ही बनाए हुए ‘बबल’ में रहते हैं और दिवास्वप्न देखने लगते हैं। ये दिवास्वप्न आपको आपके मन में यकीन दिला देता है कि आप में और जिनका चयन हुआ है उनमें कोई फर्क नहीं है। एक सज्जन तो मुझे ऐसे मिले जो बोले मिस्टर शर्मा आईएएस मेरे बैचमेट हैं। मैं हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा, क्योंकि मैं जानता था कि वो आईएएस नहीं हैं, और वो भी ये जानते थे कि मैं जानता हूँ वो आईएएस नहीं हैं। फिर उन्होने दूसरा वाक्य जोड़ा, “बस ये है कि उस साल शर्मा पास हो गया था, मैं नहीं हो पाया था!”
एक सज्जन ने मुझे बताया, “मेरे बेटे ने रेलवे इंस्पेक्टर का एक्जाम निकाला है मगर एक साल होने को आया अभी तक नियुक्ति पत्र नहीं आया है। अमुक आरआरबी का है।” संयोग से मेरे परिचित उस आरआरबी में थे। अतः मैंने रोल नंबर दिया और अपने परिचित से विवरण जानना चाहा। उसने रोल नंबर देखकर कहा, “या तो आपने रोल नंबर में कोई डिजिट मिस कर दी है या किसी और आरआरबी का होगा।” जब मैंने पता लगाया तो पिता ने रोल नंबर और आरआरबी दोनों कन्फर्म की। आरआरबी वाले परिचित हँसने लगे और उन्होंने बताया कि असल में ये लड़का या तो एक्जाम में बैठा ही नहीं या फिर फेल हो गया है और अब ‘कहानी’ डाल रहा है। रोल नंबर की ये सीरीज है ही नहीं, इस आरआरबी में।
तो ये ही है लब्बोलुआब। दरअसल जब उनके मन में ये विचार भर आता है कि उन्होंने सिविल सर्विस देना है तो इस बात की डुगडुगी गाँव भर में और तमाम रिश्तेदारी में खबर करवा दी जाती है। पूरी दुनिया को बता दिया जाता है कि अब हमें हल्के में न लें, बस यही दो चार महीने की बात है, और फिर तुम कहाँ-हम कहाँ ! अब इस सपने का टूटना बड़ा ही कष्टदायी और शर्मिंदगी का बायस बन जाता है।
हमारे पिता जी ने हमारा परिचय एक पड़ोसी के लड़के से कराया कि वह आईएएस का एक्जाम दे रहा है। उन्होंने ये बात मुझे इसलिए कही थी कि “नालायक तू भी कुछ कर ले जिंदगी में” हालांकि अभी मैं कॉलेज में पढ़ ही रहा था। अगली सुबह वो भाई साब मेरे पास फॉर्म लेकर आ गए “जरा मेरा ये फॉर्म भरवा दें प्लीज” आपको याद होगा कि तब ओल्ड सिस्टम था और प्रेलिमनरी नहीं होता था (प्रेलीमनरी 1979 की परीक्षा से शुरू हुआ था) और फॉर्म क्या, पूरी एक किताब सी आती थी कारण कि सभी विषयों का सिलेबस भी आपको (केंडीडेट्स) को दिया जाता था। दूसरे शब्दों में फॉर्म देखकर ही कमजोर दिलवालों को तो चक्कर ही आ जाये।
वास्तविकता ये है कि आईएएस जो अभी हाल के बरसों तक पर्दे की पीछे की बेनाम सर्विस मानी जाती थी। अब सोशल मीडिया के चलते और टीवी/अखबारों में जलवा ऐसे दिखाते हैं कि बस आईएएस नहीं यह साक्षात बैकुंठ है बैकुंठ। उसकी ऐसी ‘रोजी’ तस्वीर दिखाई जाती है कि ‘यूथ’ बरबाद हो रहे हैं। झूठ बोलने, धोखा देने को आमदा हैं। इस साल आधा दर्जन ऐसे फर्जी केस आ चुके हैं। इन सबसे कहीं अधिक वो होंगे जो नियत तारीख को मसूरी पहुँच जाएँगे और घुसपैठ की कोशिश करेंगे कयोंकि बहुत सख्त सुरक्षा व्यवस्था के चलते यह मुमकिन नहीं हो पाता। अतः बाहर गेट के सामने सेल्फी लेकर, घूम-घाम कर घर वापसी और कहानी पर कहानी। झूठ पर झूठ। लोग दोष कभी यूपीएससी को देने लगते हैं। या फिर वही “अजी बस अपने अपनों को ले लिया।”
एक सज्जन ने हाल ही में पुलिस में कांस्टेबल का एक्जाम निकाला और मशहूर कर दिया कि वह आईपीएस बन गया है। जब किसी ने गहराई से पूछा तो उसने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया कि वह इंडिया में रहता है, सर्विस इंडियन पुलिस में लगी है, तो हुई न इंडियन पुलिस सर्विस।
लेखक रिटायर्ड वरिष्ठ आईआरपीएस अधिकारी हैं। वह एक प्रतिष्ठित कवि एवं व्यंग्यकार भी हैं। संपर्क: hrminterventions@gmail.com

