यूपीएससी में सुधार के बढ़ते कदम
यूपीएससी में कुछ और बड़े सुधारों की प्रतीक्षा है। हमने ब्रिटिश शासन से स्टील फ्रेम तो लिया, लेकिन उसकी आत्मा आत्मसात नहीं की!
हर उम्मीदवार को देश की आवश्यकता के हिसाब से संवेदनशील होना चाहिए—केवल सुविधाओं की दौड़ में नहीं!

संघ लोकसेवा आयोग (#यूपीएससी) की तारीफ की जानी चाहिए कि इस संस्था में समय के अनुसार लगातार सुधार रिव्यू की प्रक्रिया जारी रहती है। 2026 में होने वाली सिविल सेवा परीक्षा में सुधार के कुछ कदम स्वागत योग्य हैं। परीक्षा में अंतिम रूप से सफल होने पर यदि आपको ग्रुप ‘ए’ की कोई सेवा मिलती है, तो उसके बाद आपको आईएएस/आईएफएस जैसी अखिल भारतीय सेवाओं में जाने के लिए केवल एक अवसर और मिलेगा। उसके बाद परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं होगी। अगर फिर भी आप अपने विभाग से प्रसन्न नहीं है तो आप त्यागपत्र देकर फिर से परीक्षा दे सकते हैं।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में एक बार चुने जाने के बाद फिर से परीक्षा में बैठने की अनुमति पहले नियमों की तरह अभी भी नहीं होगी। अकेले इस नियम से कई स्तरों पर फायदा होगा। सबसे पहले उन नए उम्मीदवारों के लिए अधिक पद खाली मिलेंगे, वरना पहले से सफल हुए बार-बार उन्हीं पदों पर चुने जाते रहे हैं। एक बार चुने जाने वाले विद्यार्थियों के लिए भी एक और अवसर देने से लगातार वे तीस-पैंतीस वर्ष तक परीक्षा में शामिल होने के लोभ से भी बच जाएंगे। आखिर सभी सेवाओं के वेतनमान और सुविधाएँ लगभग बराबर ही होती हैं। उदाहरण के लिए एक बार डाक सेवा में आ गए, अगली बार फिर सूचना सेवा में चले गए, फिर रेलवे में आ गए, और फिर अधिकांश की लालसा इनकम टैक्स, कस्टम में आने की आखिर क्यों रहती है? कुछ काम देश के लिए भी करोगे या केवल परीक्षा ही देते रहोगे? आईएएस, विदेश सेवा, वन सेवा जैसी कुछ अखिल भारतीय और बेहतर प्रशासनिक सेवाओं के लिए आपको एक अवसर और मिल ही जाएगा।
इन सभी विभागों की ट्रेनिंग और क्षमता भी बेहतर होगी वरना इन विभागों को उम्मीदवार तो नामित हो गए, लेकिन उनमें से जॉइन कितने करेंगे, कुछ पता नहीं चलता। कुछ फिर से परीक्षा में बैठने के लिए लगातार दो-चार वर्षों तक कई-कई बहाने—जैसे मेडिकल, मां की बीमारी आदि—बताकर कोशिश करते रहते हैं, और फिर उनकी सीनियारिटी और प्रशिक्षण की समस्याएं पैदा होती हैं। परिणाम—प्रशासनिक क्षमता में लगातार गिरावट।
अब सभी विभाग और बेहतर ढ़ंग से काम कर पाएंगे। यहां लोकतांत्रिक तरीके से एक गुंजाइश और छोड़ी है। लगभग 23 विभागों में पांच विभाग जैसे दिल्ली में दानिकस या पांडिचेरी पुलिस आदि—जो ग्रुप ‘बी’ की सेवा मानी जाती हैं—यदि आप उसे चुनते हैं तब अव आपको एक से अधिक अवसर मिल सकते हैं।
इन सुधारों के सामाजिक परिणाम भी अच्छे आएंगे। जैसे जब तक उम्र के हिसाब से और जाति विशेष का होने के कारण आपको अवसर की अनंत छूट रहती है, तब तक आपके अंदर बार-बार परीक्षा देने की भूख भी कायम रहती है। लेकिन प्रश्न है कि कितने उम्मीदवारों के लिए यह संभव है? क्या दिल्ली जैसे महानगरों में रहना और परीक्षा का खर्च उठाना इतना आसान है! क्या यह दुनिया की सबसे बड़ी नौजवान पीढ़ी की क्षमता और ऊर्जा की बर्बादी नहीं है? जो किसी शासन-प्रशासन में लगती! उसके बजाय आप बार-बार उन्हें क्यों आंकड़ों और किताबों को रटने को मजबूर कर रहे हो?
क्या इन प्रशासनिक सेवाओ में इतना अंतर होता है जिसके लिए आप देश के संसाधनों की बर्बादी में लगे हो? क्या यह सामाजिक तौर पर जाति विभाजन की तरह प्रशासनिक सेवाओं में भी कमतर और बेहतर की भावना पैदा नहीं करता? देश को इन सबसे मुक्ति चाहिए और वह एक-एक कदम से ही संभव है। उनके अभिभावक भी लगातार चिंता में डूबे रहते हैं कि उनकी परीक्षा के चक्र कब खत्म होंगे? याद कीजिए प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार अमरकांत की कहानी “डिप्टी कलेक्ट्री” जिसमें नौजवान वर्षों तक सारी दुनिया को मूर्ख बनाता रहता है।
वर्तमान सुधार का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। और वह है—राज्यवार कैडर में उम्मीदवारों का वितरण। नौकरशाही के स्टील फ्रेम में आईएएस सबसे मजबूत आधार होता है। जिस राज्य के लिए आपका आवंटन होता है, आप उस राज्य में ही रहते हैं, या केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। लेकिन उस राज्य में बने रहने के कुछ दुष्परिणाम अतीत में अनुभव किए गए। जैसे वर्ष 1984 में जब पंजाब में आतंकवादियों ने गदर मचा रखा था तब अहसास हुआ कि वहां नियुक्त अधिकारियों और ऐसे समाज-विरोधी तत्वों के बीच कुछ मिलीभगत हो गई थी। इसलिए यह फैसला किया गया कि किसी भी राज्य में वहां के रहने वाले स्थानीय उम्मीदवारों के एक तिहाई से अधिक नहीं तैनात होंगे, और दो तिहाई दूसरे राज्यों के होंगे। इसके फलस्वरूप पिछले 40 वर्षों में देश की एकता में बहुत अच्छे परिणाम आए हैं। यदि आप किसी अन्य राज्य में तैनात होते हैं तो भाई-भतीजावाद जैसे भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम रहती है। अब उसी में एक कदम और बढ़ाकर उसे और पारदर्शी ढ़ंग से किया गया है। इस अहसास को और पुख्ता बनाने के लिए, कि पूरा देश आपका है और आपको कहीं भी नियुक्ति दी जा सकती है।
लेकिन यह प्रश्न फिर भी रहता है कि सरकार कितनी दृढ़ इच्छा से इसे लागू करेगी। पुराने अनुभवों पर नजर डालें तो वर्ष 1986 में भी कुछ मिलते-जुलते कदम उठाए गए थे—जैसे परीक्षा देने के प्रयासों पर ऐसी ही रोक और उनके ट्रेनिंग के नंबरों को भी यूपीएससी की फाइनल सीनियरिटी में जोड़ जाना। लेकिन जैसे हमारा संविधान और उसकी धाराएं देश के वकीलों के लिए स्वर्ग हैं, वैसा ही इन नियमों के खिलाफ हुआ। झूठ-सच के आधार पर उम्मीदवारों ने छुट्टी ली, फिर से वर्षों तक परीक्षाएं दीं, और फिर हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमेबाजी हुई। वर्षों तक नहीं दशकों तक। नतीजा प्रशासनिक ढ़ांचा चरमरा गया और उसकी कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ा। और सबसे ज्यादा इसके बुरे परिणाम यह हुए कि किसी विभाग के अफसरों के बीच जो परस्पर सहयोग की भावना होनी चाहिए उसके बदले आपसी ईर्ष्या पैदा हुई।
क्या सरदार पटेल के शब्दों में प्रशंसित ऐसा “स्टील फ्रेम” देश को और अधिक हानि नहीं पहुंचा रहा? इसको तुरंत रोके जाने की आवश्यकता है। जब सुविधाएँ सभी सेवाओं की—लगभग 99 प्रतिशत—समान हैं, तो इनकम टैक्स में काम करने वाला रेलवे वाले को नीचा क्यों समझता है! या रेलवे वाला किसी पोस्टल सर्विस वाले को! आईएएस/आईपीएस का नशा तो सातवें आसमान पर होता है! यहां तक की रिटायरमेंट के बाद भी उनकी चाल टेढ़ी बनी रहती हैं। केवल वही नहीं, उनके आसपास मंडराने वाले अभिभावक और चापलूस दोस्त भी एक विशेष तरह की अकड़ में रहते हैं।।
यह भारतीय समाज का दुर्भाग्य है कि वह जन्म से ही बराबरी नहीं सीखता। एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री ने कहा भी है कि संविधान में तो हमने बराबरी ला दी, लेकिन समाज अभी उससे बहुत दूर है।
तथापि यूपीएससी में कुछ और बड़े सुधारों की प्रतीक्षा है। हमने ब्रिटिश शासन से स्टील फ्रेम तो लिया, लेकिन उसकी आत्मा आत्मसात नहीं की—यानि कार्य दक्षता, क्षमता ! कम उम्र में भर्ती ! पाठ्यक्रम ! व्यवस्थित प्रशिक्षण ! काम के प्रति समर्पण ! और निष्ठा एवं जिम्मेदारी ! हर उम्मीदवार को देश की आवश्यकता के हिसाब से संवेदनशील होना चाहिए—केवल सुविधाओं की दौड़ में नहीं! लेकिन इस स्टील फ्रेम में जंग के लिए हमारी राजनीति भी उतनी ही जिम्मेदार है!
#PrempalSharma, पूर्व संयुक्त सचिव, भारत सरकार।
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