नॉर्दर्न रेलवे का लेखा विभाग—भगवान भरोसे!

Northern Railway HQs

वर्ष 2026 के आरंभिक दो महीनों में नॉर्दर्न रेलवे के दोनों सीबीआई रेड—लखनऊ मंडल और एनआरसीएच—मामले में अकाउंट्स के अधिकारी और स्टाफ या तो रंगेहाथ पकड़े गए हैं, या फिर आरोपी गए हैं। आखिर दिल्ली में लंबे समय से कुर्सी तोड़ रहे अकाउंट्स के उच्च अधिकारी क्या कर रहे हैं? यह पूछ रहे हैं अकाउंट्स डिपार्टमेंट के अधिकारी।

फिर वे आगे स्वयं ही जवाब देते हुए कहते हैं, “खैर, वे करेंगे भी क्या, उनका तो पूरा तन-मन और धन दिल्ली में किसी तरह बने रहने में लगा हुआ है। अकाउंट्स का जोनल हेड—जिसको अब प्रिंसिपल फाइनेंस एडवाइजर (#पीएफए) कहा जाने लगा है—वह यूनियनों का पालतू फ्रैजाईल अधिकारी बनकर रह गया है।

उन्होंने स्मरण करते हुए बताया कि कुछेक साल पहले नॉर्दर्न रेलवे अकाउंट्स का एक सीनियर सेक्शन ऑफिसर (#SSO) को करोड़ों के एक बड़े फाइनेंसियल फ्रॉड में पकड़ा गया था, वह भी एक यूनियन से सम्बद्ध था और शर्मिंदगी के चलते उसने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी! ऐसे फाइनेंसियल फ्रॉड नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे, ईस्ट सेंट्रल रेलवे, साउथ वेस्टर्न रेलवे, सेंट्रल रेलवे इत्यादि जोनल रेलों में भी हो चुके हैं! तथापि शीर्ष अकाउंट्स अधिकारियों को सिस्टम इम्प्रूवमेंट की कोई चिंता नहीं है!

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अकाउंट्स अधिकारी बताते हैं कि सभी जोनल रेलों में सबसे कमजोर पीएफए—नॉर्दर्न रेलवे का होता है, उसकी अपनी कोई ओपिनियन नहीं होती है। वैसे भी यूनियनों के दबाव पर अधिकारियों की पोस्टिंग करने वाले से सिस्टम को कोई उम्मीद नहीं हो सकती है।

वह कहते हैं, “पहले किसी तरह से पीएफए बनना, फिर रेलवे बोर्ड में एडिशनल मेंबर, और फिर उम्र का फायदा लेकर मेंबर बन जाना, यही उनका पूरा चक्र है। उस चक्कर में पूरे सिस्टम के चाल-चरित्र का भट्ठा बैठा दिया गया है।

जो गिरफ्त में आए या फिर जो अभियुक्त बनाए गए, उनको तो सिस्टम जो सजा देगा, वह तो देगा ही, लेकिन उन कुछ दुष्ट अधिकारियों का क्या होगा जो निकम्मे, नालायक और दोषी हैं, जो लंबे समय से दिल्ली में बैठकर राजनीति कर रहे हैं?

यह भी सुनने में आया है कि मंडलों में अधिकारियों की पोस्टिंग में लाखों लाख की वसूली हो रही है। खैर, ये सभी जोनल रेलों में देखने-सुनने को मिल रहा है कि मंडलों में पोस्टिंग के लिए पैसों का खुला लेन-देन धड़ल्ले से और खूब हो रहा है। अकाउंट्स में ये नई बीमारी आई है। अकाउंट्स अधिकारी कहते हैं कि एकाध रेलवे में तो पीएफए और डकैतों में कोई अंतर नहीं रह गया है।

वे कहते हैं कि मेंबर फाइनेंस से कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि वह भी उसी सिस्टम के प्रोडक्ट हैं। मंत्री महोदय से भी उम्मीद कम है, लेकिन विनम्र अनुरोध के साथ उनसे कहना यह है कि इस मामले को गंभीरता से लें और ऐसे करप्ट-कॉवर्ड और करेक्टरलेस लोगों को सिस्टम से बाहर करें, ताकि नीचे की निरंकुशता पर कुछ तो अंकुश लगे!