संपादकीय: नाम बदला—खेल वही—रेलवे और हाईवेज में ठेकेदारी का काला सच
भारतीय रेल और राष्ट्रीय राजमार्गों (हाईवेज) के निर्माण में आज एक खतरनाक खेल खुलेआम खेला जा रहा है—कंपनियों के नाम बदले जाते हैं, कंपनियाँ बदली जाती हैं, लेकिन खेल वही रहता है। जिन ठेकेदारों ने घटिया निर्माण किया, टैक्स नहीं चुकाया, रख-रखाव से पल्ला झाड़ लिया और जनता की जान जोखिम में डाली, वही लोग आज नए नाम, नए बोर्ड और नई कंपनियों के साथ फिर सरकारी ठेके ले रहे हैं। सरकार और सिस्टम आँख मूँदे बैठा है, और जनता इसकी कीमत चुका रही है।
कंपनी का नाम बदलना अब सुधार का नहीं, बल्कि पाप धोने का तरीका बन चुका है। पुराने नाम के साथ आयकर और जीएसटी की देनदारियाँ दफन, घटिया काम की फाइलें बंद और दोष-दायित्व हवा हो जाता है। वही प्रमोटर, वही निदेशक, वही बैंक खाते और वही मशीनें—केवल नाम नया। प्रश्न यह नहीं कि यह हो कैसे रहा है, प्रश्न यह है कि इसे रोका क्यों नहीं जा रहा!
और इससे भी अधिक खतरनाक है—अव्यावहारिक, असंभव और आत्मघाती (नॉन-वर्केबल) दरों पर ठेके लेना। कुछ कंपनियाँ—खासतौर पर वे—जिनका सीधा या परोक्ष संबंध शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों से है—रेलवे और हाईवेज के ठेके ऐसी दरों पर उठा रही हैं जिन पर न ईमानदारी से काम होना संभव है, न सुरक्षित निर्माण। जब काम संभव ही नहीं, तो फिर प्रश्न उठता है कि उद्देश्य क्या है? इसका स्पष्ट उत्तर है—ऑर्डर बुक दिखाओ, शेयर चमकाओ, निवेशकों को बहकाओ और सार्वजनिक धन को निजी मुनाफे में बदलो।
रेलवे की पटरी अगर कमजोर हुई तो हादसा होगा—लोग मरेंगे, हाईवे अगर घटिया बने तो भी लोगों की जान जाएगी। यह कोई एक्सपेरिमेंट लैब नहीं है, जहाँ ठेकेदार बाजार में शेयर भाव बढ़ाने के लिए जनता की जिंदगी से जुआ खेलें। लेकिन आज की वास्तविक स्थिति यही हैं—सरकारी ठेके विकास का साधन नहीं, बल्कि वित्तीय हेराफेरी का औजार बनते जा रहे हैं।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बेनामी लेन-देन, धन शोधन, कर चोरी और फर्जी कॉरपोरेट पुनर्जन्म इत्यादि को रोकने के लिए पर्याप्त और पुख्ता कानून मौजूद हैं, जाँच एजेंसियाँ मौजूद हैं, फिर भी वही चेहरे बार-बार लौट आते हैं। जब तक नाम बदलने वाली, कंपनियाँ घुमाने वाली और अव्यावहारिक दरें देने वाली इकाईयों को सीधे-सीधे सिस्टम से बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक न रेलवे सुरक्षित होगी, न हाईवे टिकाऊ।
अब आधे-अधूरे सुधारों से काम नहीं चलेगा। साफ-स्पष्ट नीति चाहिए—जिस कंपनी ने कल गड़बड़ की है, वह आज नए नाम से वापस नहीं आ सकती। जब तक पुरानी देनदारियाँ नहीं चुकतीं, जब तक घटिया काम की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक नया ठेका उसे नहीं मिलना चाहिए, वरना विकास और रोजगार के नाम पर यह ठेकेदारी तंत्र देश की नींव को ही खोखला करता रहेगा। सरकारी तंत्र में प्राइवेट लेबर कॉन्ट्रैक्ट इस तथ्य का सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण हैं!

