विश्व तर्क दिवस—मतलब लॉजिक डे—एक व्यंग्य

मैंने एक दोस्त से कहा कि आज “विश्व तर्क दिवस” है, आपको बधाई, दोस्त तर्क-वितर्क का विश्व चैंपियन था। उसने तर्क दिवस क्यों और कैसे मनाया जाए इस बारे में मुझे पचास तर्क दिए। तर्क से समाज को होने वाले फायदे गिनवाए।

मैं उनसे ज्ञान प्राप्त करके सड़क पार कर ही रहा था कि शंभु जी मिल गए। उन्होंने मुझे बिना सिंगनल के सड़क पार करने पर नसीहत भी दी और साथ ही सिंगनल के महत्व पर एक तर्क संगत भाषण भी पिला दिया। उनके भाषण का कुल सार ये था कि सड़क पर जो सिंगनल लगे है उन पर सरकार का करोड़ों रुपया खर्च होता है। ये पैसा हमारे और आपके टैक्स के द्वारा सरकार को दिया जाता है। शंभु जी ने बड़े तर्क के साथ ये बात समझाई कि जब सिंगनल पर हमारा ही पैसा खर्च हुआ है तो उसका इस्तेमाल नहीं करके हम एक तरह से अपने ही पैसे को बर्बाद कर रहे हैं।

शंभु जी मुझे ये ज्ञान दे ही रहे थे कि इतने में नो पार्किंग में खड़ी उनकी स्कूटर पर गली के एक कुत्ते ने पेशाब करके उन्हें आभास करा दिया कि दूसरों से तर्क बाद में करना पहले स्कूटर को सही जगह पार्क करने की आदत डालिए!

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शंभु जी सोच रहे थे कि साले अगर तेरे मुंह में लंबे-लंबे दांत न होते और उन्हें चौदह इंजेक्शन का डर न होता तो आज तेरे ऊपर स्कूटर पर पेशाब करने से होने वाले नुकसान के तर्कों की बौछार कर देता।

कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि नुक्कड़ की पान की दुकान पर शुक्ला जी पान वाले को पान में चूना लगाने जैसे विषय पर तर्क-वितर्क करते दिखे। दरअसल शुक्ला जी का ये स्टाइल है, वे पान वाले को तर्क-वितर्क में फंसाकर दो इलायची और तीन लौंग फोकट में मुंह में ठूंसने का पराक्रम रोज करते है।

हमने पान वाले से पूछा कि इससे तो तुम्हारा नुकसान होता होगा, तो पचपन साल से चूना लगा रहे, मतलब पान में चूना लगा रहे पान वाले ने तर्क दिया कि नुकसान नहीं फायदा होता है। शुक्ला जी दो-चार लौंग खाते है और यहां खड़े होकर घंटे भर तर्क-वितर्क करते है, जिससे लोग यहां जमा होते है। जब जमा होते है तो पान भी खा ही लेते है। अपना धंधा चार लौंग-इलायची खिलाकर भी बढ़ ही रहा है।

मैं लोगों के तर्क को समझने में बिजी था कि एक ऑटो वाले ने मुझसे पूछा, रेलवे स्टेशन चलोगे? सिर्फ दस रुपए में.. मै तुरंत ऑटो में बैठ गया। मैंने ऑटो वाले से तर्क करना शुरू किया कि मिनिमम किराया तेईस रुपए है फिर तुम मुझे दस रुपए में क्यों लाए? आपका नुकसान होगा? ऑटो वाले ने अपना तर्क दिया कि देखिए मुझे तो स्टेशन से अपने बच्चे को पिकअप करने आना ही था ऐसे में आपको साथ बैठाकर लाया तो भी मुझे तो दस रुपए का फायदा ही हुआ। उसका तर्क मेरी समझ में आ गया था।

मैं सोचने लगा कि अगर ये तर्क-वितर्क न हो तो लोगो को कितना नुकसान होगा! मतलब देश-दुनियां तर्क करने वालों के भरोसे ही चल रही है। तर्क करने वालों से लोगों को भला कितना लाभ हो रहा है।

हमारे मोहल्ले में एक बाबाजी का तीन दिन का शिविर लगा था। बाबा जी तीन दिन से लोगों को खूब ज्ञान दे रहे थे। मैंने बाबा जी से शिविर में शामिल होने के लिए भक्तों से मोटी फीस लेने पर प्रश्न किया तो बाबा जी ने कहा, बच्चा ये तर्क-वितर्क का सत्र नहीं है। कभी फिर से आपसे इस विषय पर तर्कसंगत तर्क करेंगे।

मैंने उनके इस तर्क के महत्त्व को समझ लिया था, क्योंकि ये वही बाबा हैं जो चरित्र निर्माण पर लंबा ज्ञान देते हैं, जबकि खुद दो बार अपने चाल चरित्र के कारण जेल यात्रा कर चुके है। लेकिन उनसे बहस कौन करे? इनसे जेल के बारे में प्रश्न करेंगे तो ये जेल जैसा पृथ्वी पर कोई अन्य स्थान नहीं होता, इस विषय पर मुझे तर्क देना शुरू कर देंगे।

भगवान श्री कृष्ण जी ने कारागार में ही जन्म क्यों लिया था, इस पर तर्क-वितर्क शुरू कर देंगे। ये ऐसे-ऐसे तर्क देंगे कि तुरंत ही जेल जाने का मन करने लगेगा। ऐसा लगने लगेगा कि मैं अगर जेल नहीं गया तो जैसे जीवन में कुछ किया ही नहीं। वैसे भी हम उन संस्कारों में पले बढ़े हैं जहां बड़ों से, टीचर से, बुजुर्गों से तर्क नहीं करने की हिदायत दी जाती है। बाकी बचे नेता, गुंडे, अपराधी, अफसर, बॉस.. इनसे तो तर्क किया ही नहीं जा सकता!

मैं लौटकर घर आया और पत्नी से चाय में अदरक, तुलसी, इलायची डालने के फायदों पर तर्क करना चाहा तो पत्नी ने सीधे शब्दों में कहा कि चाय पर इतना तर्क करने से अच्छा है कि खुद बना लो!

तो दोस्तों मैं आपसे कोई तर्क-वितर्क नहीं कर रहा हूँ, बस दो कप चाय बना रहा हूँ, एक खुद के लिए एक पत्नी के लिए, क्योंकि दुनियां से तो तर्क-वितर्क कर सकते हैं, पत्नी से करने का परिणाम तो आप जानते ही हैं। मैं नहीं चाहता कि सब्जी कैसे अच्छी बने इस पर कोई तर्क दूँ और शाम को सब्जी भी खुद ही बनानी पड़े!

– डॉ. मुकेश गौतम, मुंबई, मो. 9619582408