भारतीय रेल चुका रही विशेषाधिकार की कीमत
भारतीय रेल अब छोटे-छोटे जोनों, अधिकारियों का रोटेशन न होने और परियोजनाओं के लिए अथाह धन के बूते चल रही है। जो परिवहन सेवा कभी राष्ट्रीय स्तर के इंजीनियर तैयार करती थी, वह अब एक नगरपालिका कार्यालय की तरह व्यवहार करती है, और वैसे ही इसके बाबू (क्लर्क) हैं।
इसके संकेत सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रहे हैं। अधिकार के रूप में कई आधिकारिक गाड़ियाँ। रिजॉर्ट की तरह रेनोवेट किए गए और सजाए गए सरकारी आवास। सेलिब्रिटी की तरह रह रहे परिवार। ऐसे विदेशी अवकाश जो किसी फिल्म स्टार को भी शर्मिंदा कर दें। मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाला कोई व्यक्ति कुछ ही वर्षों में ऐसे कैसे रहने लगता है जैसे वह किसी धनी परिवार में मुंह में सोने-चाँदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ हो? सरकारी आवासों में बदलाव और करोड़ों के खर्च पर कभी प्रश्न क्यों नहीं उठाया जाता?

अब निर्माण विभाग के लिए एक नई ट्रांसफर पॉलिसी आई है, जो रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के नियंत्रण में है, और बिना किसी औचित्य के 7 साल के कार्यकाल की अनुमति देती है। यानी एक ही पद पर सात साल, एक ही ठेकेदार समूह के साथ, और कोई यह पूछने वाला नहीं कि क्यों?
जमीनी स्तर पर, केवल कीमत बदली है। वही स्थानीय ठेकेदार वही काम, उन्हीं तरीकों से करता है। लेकिन अब पैकेज इतने बड़े हो गए हैं कि वह ठेकेदार उन पर बोली नहीं लगा सकता। एक बड़ा ठेकेदार ठेका लेता है और उसे आगे सबलेट (उप-ठेके पर) कर देता है। काम की लागत तेजी से बढ़ जाती है। गुणवत्ता नहीं बढ़ती। यह सिविल इंजीनियरिंग में प्रत्यारोपित ‘पावर कार पॉलिसी’ है।

इसलिए, जिस अधिकारी को विषय की समझ है, वह अब अपने उस अनुभव और जानकारी को एक देनदारी (लायबिलिटी) के रूप में ढोता है। वह अधिकारी घटिया काम को पूरा (कम्प्लीट) होने का प्रमाणपत्र नहीं दे सकता, और इसलिए वह सिस्टम के लिए समस्या बन जाता है। सालगिरह, शादियों के अवसरों पर सामाजिक कार्यक्रमों का ‘इंतजाम’ करने की क्षमता विषय के ज्ञान से कहीं अधिक कीमती है।
देखिए, नई परियोजनाएं क्या दे रही हैं:
- टपकती हुई छतें
- धंसते हुए आरयूबी (रेलवे अंडरब्रिज)
- धंसता हुआ ट्रैक
- काम के दौरान कटने वाली केबल
- पलट जाने वाली क्रेन
- गिरती हुई फॉल्स सीलिंग
- ढहने वाले मचान (स्कैफोल्डिंग)
- मुड़ जाने वाले गर्डर
- नए निर्माणों में विफल होने वाले कंक्रीट गर्डर
इनमें से हर एक का संबंध उसी विशेषाधिकार से है जिसे अधिकारी सोशल मीडिया पर जन्मदिन के जश्न के इस वीडियो की तरह दिखाते हैं।
जमीनी स्तर की गुणवत्ता की जांच, तकनीकी दक्षता और सही काम करने का इरादा—सब अब संदेह के घेरे में हैं। जनता ने इन परियोजनाओं के लिए भुगतान किया है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि इन्हें पूरा होने का प्रमाणपत्र किसने दिया था!

