बैलेंस वर्क टेंडर बने भारतीय रेल के लिए जहर: नीतिगत समीक्षा की आवश्यकता

भारतीय रेल में निर्माण कार्यों के दौरान अधूरे या शेष बचे कार्यों के लिए नए सिरे से ‘बैलेंस वर्क टेंडर’ जारी करने की प्रथा पर गंभीर प्रश्न खड़े होने लगे हैं। इस प्रणाली से जुड़े जानकारों और समीक्षकों का मानना है कि यदि शेष कार्य को मौजूदा अनुबंध के दायरे में ही पूरा किया जा सकता है, तो नए टेंडर आमंत्रित करने के बजाय मौजूदा व्यवस्था का ही उपयोग किया जाना चाहिए। बार-बार नए टेंडर जारी करने से न केवल परियोजनाओं में अनावश्यक देरी होती है, बल्कि लागत में वृद्धि, प्रशासनिक खर्च का बोझ और विवादों की स्थिति भी उत्पन्न होती है।

इस पूरी प्रक्रिया के समाधान के रूप में एक त्रि-स्तरीय दृष्टिकोण का सुझाव दिया गया है। इसके तहत पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि लागू अनुबंध शर्तों के भीतर ही 50 प्रतिशत तक के बदलावों (Variations) का पता लगाया जाए। यदि किसी स्थिति में शेष कार्य को अनुमेय बदलावों के माध्यम से पूरा करना संभव न हो, तभी एक नया टेंडर जारी किया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, अति-आवश्यक परियोजनाओं के मामले में रेलवे बोर्ड को अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए, नियमों और स्वीकृतियों के अधीन आवश्यक बदलावों की अनुमति देनी चाहिए, ताकि परियोजना बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरी हो सके और जनता के उपयोग के लिए समर्पित की जा सके।

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हालांकि, इस नीति के क्रियान्वयन के पीछे एक गंभीर और संवेदनशील प्रश्न भी खड़ा होता है जिसकी गहन जांच आवश्यक है। प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि क्या मौजूदा अनुबंध में अनुमेय बदलावों की अनुमति देने के बजाय बार-बार बैलेंस वर्क टेंडर जारी करने के पीछे कोई कमीशन प्रतिशत या अन्य निहित स्वार्थ तो नहीं जुड़ा है?

इस दिशा में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र सतर्कता समीक्षा की आवश्यकता है। ऐसी समीक्षा को इस बात की गहराई से जांच करनी चाहिए कि अधूरे कार्यों को नए टेंडरों में विभाजित करने के पीछे क्या कारण थे, इसके वित्तीय निहितार्थ क्या हैं, अधिकारियों द्वारा क्या निर्णय लिए गए और क्या इसके माध्यम से किसी विशेष ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुँचाया जा रहा है। भारतीय रेल को बार-बार टेंडर प्रक्रिया में उलझने के बजाय जनहित और सार्वजनिक सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि प्रत्येक बैलेंस वर्क टेंडर किसी निहित स्वार्थ के बजाय केवल वास्तविक आवश्यकता के आधार पर ही न्यायसंगत ठहराया जा सके।