उत्तर मध्य रेलवे: गति शक्ति प्रकोष्ठ की लचर कार्यप्रणाली, टेंडर बंद करने में हीलाहवाली और कमीशनखोरी के गंभीर आरोपों की उच्चस्तरीय जांच की मांग

प्रयागराज ब्यूरो: उत्तर मध्य रेलवे के गति शक्ति प्रकोष्ठ की लचर और संदेहास्पद कार्यप्रणाली को लेकर परेशान ठेकेदारों द्वारा गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। खासकर बिजली के ठेकेदारों का आरोप है कि गति शक्ति प्रकोष्ठ में तीन-चार साल पहले काम पूरे हो जाने के बावजूद टेंडरों का औपचारिक समापन नहीं किया जा रहा है और न ही अंतिम बिलों (फाइनल बिल) का समय पर भुगतान हो रहा है। इसके चलते संबंधित ठेकेदारों को भारी आर्थिक एवं प्रशासनिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है, और वे बाजार तथा मजदूरों का भुगतान करने में भी असमर्थ हैं।

टेंडर बंद करने और बिल बनाने में देरी

बिजली के ठेकेदारों का कहना है कि काम पूरा होने के बाद भी टेंडर बंद करने, अंतिम बिल तैयार करने, बैंक गारंटी तथा सिक्योरिटी डिपॉजिट रिलीज करने की प्रक्रिया समय पर पूरी न होने के कारणों की गहन समीक्षा आवश्यक है। रेल प्रशासन को सभी लंबित टेंडरों की स्थिति की जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि अनुबंधों का समापन समय पर क्यों नहीं हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।

इसके साथ ही, प्राइस वेरिएशन क्लॉज (PVC) के अंतर्गत भुगतान की पात्रता, गणना और अनुबंध समापन में देरी के बीच के संबंध की भी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार के अनुचित आर्थिक लाभ की संभावना का पता लगाया जा सके।

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विभागीय व्यवस्था और जवाबदेही

गति शक्ति प्रकोष्ठ में कार्यभार तथा उपलब्ध स्टाफ को लेकर भी गंभीर समस्याएं हैं। विभागीय कार्यों में लापरवाही और हीलाहवाली के संदर्भ में गति शक्ति प्रकोष्ठ के कनिष्ठ अभियंता (JE) और वरिष्ठ खंड अभियंता (SSE) के नाम सामने आए हैं। रेल प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न कार्यों की निगरानी, बिल तैयार करने तथा काम खत्म होने पर टेंडर क्लोज करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर निर्धारित है। यदि स्टाफ की कमी है, तो उसके समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए, किंतु केवल इस बहाने फाइनल बिलों के भुगतान में देरी का कोई औचित्य नहीं है।

कमीशनखोरी के आरोप

ठेकेदारों की ओर से विभिन्न स्तरों पर कथित रूप से कमीशन लिए जाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतों में निम्नलिखित ‘प्रतिशत’ बताए गए हैं:

यहां केवल डिप्टी (जेएजी) लेवल तक का कमीशन परसेंटेज बताया गया है, एसएजी (HOD) और एचएजी (PHOD) लेवल का कमीशन परसेंटेज फिर कभी बताया जाएगा!

ये परसेंटेज ठेकेदारों द्वारा मौखिक आरोपों के रूप में बताए गए हैं, किसी प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं। हालाँकि, रेलवे हलकों में इसे एक खुला सार्वजनिक सत्य माना जाता है, जिसका शायद ही कभी कोई कागजी प्रमाण उपलब्ध होता है। रेल प्रशासन से मांग है कि इसकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किसी भी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।

रेल प्रशासन से प्रमुख मांगें

  • गति शक्ति विभाग के सभी लंबित टेंडरों की स्थिति की समीक्षा की जाए।
  • अनुबंध समापन में देरी की समीक्षा कर जवाबदेही तय की जाए।
  • PVC भुगतान की पात्रता, गणना और संबंधित अनुबंध शर्तों का परीक्षण कराया जाए।
  • बिल तैयार करने, अंतिम भुगतान और सिक्योरिटी डिपॉजिट रिलीज करने में होने वाली देरी की जांच की जाए।
  • कथित कमीशन संबंधी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • विभाग में पर्याप्त स्टाफ और पारदर्शी कार्यप्रणाली सुनिश्चित की जाए।

जब काम पूरा होने के बावजूद सालों तक अनुबंधों का समापन और फाइनल बिलों का निस्तारण लंबित रहता है, तो रेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक एवं संबंधित उच्च अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करवाएंगे और आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।