LHB कोचों में जंग लगने की गंभीर समस्या और मैकेनिकल विभाग की कार्यप्रणाली: दावों और प्रत्यक्ष वास्तविकताओं की पड़ताल
कोच की स्थिति और कोरोजन का अवलोकन एवं विश्लेषण
वीडियो में दिख रहे एलएचबी कोच (नंबर 211240, एसी थ्री-टियर) की मैन्युफैक्चरिंग प्लेट के अनुसार इसका निर्माण आईसीएफ चेन्नई द्वारा वर्ष 2020 में किया गया है, यानी यह कोच अभी छह वर्ष पुराना भी नहीं हुआ है—यह वीडियो हमारे पास 26 मई 2024 को एक स्टोर्स ऑफिसर ने भेजा था—इसके बावजूद, वीडियो में कोच के निचले हिस्से (अंडरफ्रेम, साइड वॉल्स के निचले किनारों और स्टेप्स के आसपास) पर गंभीर रूप से कोरोजन (जंग) और पेंट की पपड़ी उखड़ने की समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
एलएचबी कोचों को पारंपरिक आईसीएफ कोचों की तुलना में बेहतर डिजाइन और स्टेनलेस स्टील या उच्च संक्षारण प्रतिरोधी क्षमता वाला माना जाता है, ताकि ये लंबी अवधि तक जंग मुक्त रहें। लेकिन इस कोच की वर्तमान बदतर स्थिति यह दर्शाती है कि आरंभिक वर्षों में ही मेटल का इस हद तक क्षय होना न केवल इसके निर्माण की गुणवत्ता और एंटी-कोरोशन ट्रीटमेंट पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है, बल्कि समय-समय पर होने वाले मेंटेनेंस की पोल भी खोलता है।
रेलवे बोर्ड की चिंताएं और रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- बढ़ती चिंता: रेलवे बोर्ड ने संक्षारण-रोधी सामग्रियों और बेहतर सफाई प्रक्रियाओं के बावजूद, एलएचबी यात्री-कोचों में भारी जंग लगने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। प्रिंसिपल चीफ मैकेनिकल इंजीनियर्स के हाल ही में हुए एक सम्मेलन में, अधिकारियों ने आईसीएफ चेन्नई, आरसीएफ कपूरथला और एमसीएफ रायबरेली को इस समस्या की गंभीरता से जांच करने और सुधारात्मक उपाय सुझाने के निर्देश दिए हैं। रेलवे बोर्ड की मिनट्स के अनुसार, “एलएचबी बोगियों में भारी जंग चिंता का एक गंभीर कारण है।”
- प्रभावित हिस्से: एसी और गैर-एसी दोनों प्रकार के एलएचबी कोचों की जांच की जा रही है, जिसमें अंडरफ्रेम, बोगियों और शौचालय से जुड़े क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ईस्टर्न रेलवे द्वारा मार्च में तैयार की गई एक रिपोर्ट में कोच की उम्र और घटकों के आधार पर जंग का विश्लेषण किया गया और कई संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की गई है।
- शौचालय का रिसाव: एक मुख्य समस्या टॉयलेट/शौचालय का रिसाव है। पानी फर्श या खराब पाइप फिटिंग के माध्यम से रिसकर अंडरफ्रेम तक पहुंच सकता है। बायो-टॉयलेट का ओवरफ्लो होना या अपशिष्ट का रिसाव विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यह तरल पदार्थ अम्लीय और क्लोराइड युक्त होता है, जो ट्रफ फ्लोर, सोल बार और हेडस्टॉक जैसे घटकों में जंग की प्रक्रिया को तेज कर देता है।
अन्य पहचाने गए कारण
- अनुचित या कठोर सफाई पद्धतियां
- स्टील की सतहों पर डेंट या क्षति
- विनाइल विज्ञापन रैपर के किनारों, जोड़ों या बिना चिपके स्थानों से पानी का प्रवेश
- जल निकासी मार्गों का अवरुद्ध होना जिससे पानी का जमाव होता है
- नमकीन तटीय हवा जहां नमक एक इलेक्ट्रोलाइट के रूप में कार्य करता है और जंग को बढ़ावा देता है।
सुझाए गए एहतियाती उपाय
- आक्रामक सफाई रसायनों के प्रयोग से बचना
- कोच धोने के लिए उच्च-खारेपन या अनुपचारित पानी का उपयोग न करना
- धोने के बाद कोचों को ठीक से पोंछना और सुखाना
- ड्रेन होल्स, स्लॉट्स और अंडरफ्रेम/बोगी मार्गों को साफ रखना
- जंग-सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत करना
- निर्धारित रखरखाव के दौरान जंग के प्रति संवेदनशील घटकों का निरीक्षण करना
- महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना
रेल मंत्रालय ने सभी जोनल रेलों को पहचाने जाने वाले घटकों की जांच करने और एहतियाती उपायों का पालन करने के लिए कहा है।
मैकेनिकल इंजीनियर्स की विशेषज्ञता पर प्रश्नचिन्ह
यह कोच अभी छह साल भी पुराना नहीं है। यह एलएचबी (LHB) कोच है, जिसे आईसीएफ (ICF) कोच से बेहतर माना गया है—अपनी बनावट और डिजाइन के लिहाज से यह बेहतर है भी। लेकिन जब से ये कोच देश में बन रहे हैं, पिछले पच्चीस वर्षों से इनमें लगने वाले झटके बंद नहीं हुए हैं। इनकी कपलिंग में सुधार नहीं किया जा सका है, और ड्राइवर द्वारा ब्रेक लगाते ही यात्रियों को तेज झटका लगता है। यह भारतीय रेल के मैकेनिकल इंजीनियर्स की विशेषज्ञता का एक अनूठा नमूना है।
इसके साथ ही, यह दावा भी किया गया था कि इन कोचों के शेल में जंग नहीं लगेगी, लेकिन इस वीडियो ने उन सारे दावों की पोल खोल दी है। लोको शेल के घालमेल के बारे में तो हमने विस्तार से लिखा है, जबकि कोच शेल में चल रहा घोटाला उससे भी बहुत बड़ा बताया जा रहा है।
मैकेनिकल विभाग का पूरा ध्यान अपने साम्राज्य विस्तार पर है। कोचों के अंदर लगने वाली आग, ब्रेक में लगने वाली आग, ट्रेन पार्टिंग (डिब्बों का अलग होना), बायो-टॉयलेट की विफलता, #OBHS नामक स्कैम, #EnHM फ्रॉड, और मैकेनाइज्ड लांड्रियों की गड़बड़ियों ने पूरे मैकेनिकल विभाग की असलियत का पर्दाफाश कर दिया है।
एक बात और कही जा रही है कि अब एलएचबी कोच बनाने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि भविष्य वंदे भारत ट्रेनों का है। यह भी नितांत गलत है। यदि भारतीय रेल को अंत्योदय स्तर की सामान्य सेवाएं देनी है, तो प्रीमियम वंदे भारत ट्रेनें कभी वह विकल्प नहीं बन पाएंगी। ध्यान रहे कि 2×25 kV का टीआरडी (#TRD) में उन्नयन माल ढ़ोने के लिए नहीं, बल्कि वंदे भारत जैसी ट्रेनों के संचालन के लिए अधिक आवश्यक माना गया है। 4-5 हजार करोड़ रुपये की फेंसिंग और दसियों हजार करोड़ रुपये के वंदे भारत मेंटेनेंस शेड—जिनमें कैपिटल इन्वेस्टमेंट भारत सरकार का है, लेकिन उनका संचालन प्राइवेट वेंडर कर रहे हैं—यह सब वंदे भारत के सेकेंडरी और भारी-भरकम खर्चे हैं।
हजारों एमएसएमई (#MSME) यूनिटें पारंपरिक कोच मैनुफैक्चरिंग गतिविधियों से जुड़ी हैं, लेकिन वंदे भारत के मामले में ऐसा नहीं है। सरकार को यह सोचना होगा कि अंततः इससे आम जनता और उसके वोट पर क्या असर पड़ेगा।
अब समय आ गया है कि धरातल पर काम किया जाए। ठेके पर चलने वाली व्यवस्था कभी भी रेल संरक्षा (रेलवे सेफ्टी) सुनिश्चित नहीं कर सकती। ठेके पर काम चलाने के लिए भी रेल अधिकारियों और सुपरवाइजरों को काम करना आना चाहिए—शेड में और फील्ड में काम करने और करवाने का व्यावहारिक अनुभव होना आवश्यक है, जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं। रेलवे की विजिलेंस को यह सब दिखाई नहीं देता, क्योंकि उन्हें और उनकी प्राथमिकताओं (मैडमों) को केवल चमक-दमक चाहिए, और उस सुविधा या व्यवस्था को बनाए रखने के लिए शेल में जंग लगना बहुत आवश्यक है। ट्रेनें पटरी पर चलें या खेतों में, या फिर प्लेटफॉर्म पर, इससे उन्हें क्या अंतर पड़ता है कि सौ-दो सौ लोग अपनी जान गंवा बैठें।
जब फ्रांस की क्रांति हुई थी, तब रानी यह नहीं समझ पा रही थी कि यदि खाने को रोटी नहीं मिल रही, तो लोग केक क्यों नहीं खाते। भारतीय रेल की स्थिति आज कुछ ऐसी ही हो गई है। ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल में आज मंत्री, संत्री, सांसद, विधायक, छुटभैये नेता और पार्टी कार्यकर्ता सभी आकंठ डूबे हुए हैं। हर अधिकारी और सुपरवाइजर को अपनी निजी सुविधाएं सर्वोपरि लगती हैं, और पूरी व्यवस्था को वे अपने हितों के आगे झुका भी देते हैं। ऐसे में अनुशासन कैसे बना रह सकता है? सरकार को यह गंभीरता से सोचना होगा कि इस प्रकार के बेईमान और अयोग्य लोगों की विशेष स्थानों पर लगातार पोस्टिंग से उसे राजनीतिक रूप से वास्तव में कितने वोट मिल जाएंगे!
निष्कर्ष
एलएचबी कोचों को पारंपरिक आईसीएफ कोचों की तुलना में गति, सुरक्षा, यात्री क्षमता और संक्षारण प्रतिरोध (कोरोजन रेजिस्टेंस) में एक बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था। हालांकि, मात्र तीन-चार साल से भी कम पुराने कोचों में इस स्तर का गंभीर कोरोजन पाया जाना और रेलवे बोर्ड द्वारा इस पर चिंता व्यक्त करना यह साबित करता है कि यह केवल एक तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि विनिर्माण गुणवत्ता नियंत्रण, रखरखाव की भारी चूक और भ्रष्टाचार का परिणाम है।
मुख्य प्रश्न अब यह नहीं है कि जंग कहाँ-कहाँ लग रही है, बल्कि यह है कि यात्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण घटकों की कोडल लाइफ से समझौता होने से पहले इसके मूल कारणों का कितनी जल्दी समाधान किया जा सकता है। आखिरकार, यात्री सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि कोच के अंदर क्या स्थिति है, न कि केवल इस बात पर कि यात्री अंदर से उसे कैसा देख पा रहे हैं। रेल प्रशासन को अपनी निरीक्षण प्रणाली, मेंटेनेंस मानकों और प्राथमिकताओं में तत्काल कड़े सुधार करने की आवश्यकता है।

