पूर्व मध्य रेल: वित्त विभाग की ट्रांसफर-पोस्टिंग और प्रशासनिक विसंगतियों पर प्रश्नचिन्ह
हाजीपुर: भारतीय रेल में किसी विभाग का अगर सबसे अधिक नैतिक पतन हुआ है तो वह है—वित्त विभाग। पहली बार मेम्बर फाइनेंस के अधीन कार्य कर रहे विशेष अधिकारी के खिलाफ ट्रांसफर-पोस्टिंग और बाकी मामलों में लेन-देन की बात निकल कर सामने आई है। कुछ प्रमोटी अधिकारियों में इस बात की चर्चा है। हो सकता है यह केवल एक अफवाह हो, लेकिन धुआँ उठना कहीं न कहीं आग लगी होने की पुष्टि करता है।
भारतीय रेल की वित्तीय शुचिता और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ रखने वाले वित्त विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर चर्चा का विषय है। हाल के दिनों में रेलवे बोर्ड स्तर पर उच्च अधिकारियों के कार्यालय से जुड़े कर्मियों एवं अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाएं तेज हुई हैं। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग के भीतर असंतोष और चर्चाओं का दौर लगातार जारी है।
विशेष रूप से पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) में वित्त विभाग के शीर्ष नेतृत्व के प्रशासनिक फैसलों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है। आरोप हैं कि स्थानांतरण और पदस्थापना (ट्रांसफर-पोस्टिंग) में निर्धारित नीतियों और प्रशासनिक शुचिता की अनदेखी की जा रही है, जिस पर रेलवे बोर्ड स्तर से अपेक्षित निगरानी का अभाव दिखाई देता है।
प्रशासनिक आंकड़ों और घटनाक्रम पर दृष्टि डालें तो पूर्व मध्य रेल के पांच मंडलों में वरिष्ठ मंडल वित्त प्रबंधकों (#SrDFM) की पदस्थापना को लेकर लोगों की भौंहें ऊँची हो रही हैं। यदि वर्तमान व्यवस्था जनवरी 2027 तक इसी प्रकार चलती रही, तो लगभग दो वर्ष के कार्यकाल में पांच में से तीन मंडलों में दो-दो बार सीनियर डीएफएम की तैनाती का अभूतपूर्व परिदृश्य बन जाएगा। सोनपुर मंडल में इस तरह का फेरबदल पहले ही देखा जा चुका है, जबकि धनबाद और समस्तीपुर मंडलों में वर्तमान में तैनात अधिकारियों की कार्यावधि बेहद सीमित (क्रमशः लगभग एक वर्ष और चार महीने) है। जानकारों के अनुसार, इस व्यवस्था से दिसंबर 2026 तक पुनः मनचाही पोस्टिंग का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
किसी भी महत्वपूर्ण मंडल में मात्र कुछ महीनों के लिए किसी अधिकारी विशेष की तैनाती करना प्रशासनिक स्थिरता के सिद्धांतों के विपरीत है। आरोप यह भी है कि ये निर्णय जोनल मुख्यालय में उपलब्ध योग्य एवं वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी करके लिए जा रहे हैं। इस प्रकार के प्रशासनिक ताने-बाने से भविष्य में आने वाले नेतृत्व के लिए अगले दो वर्षों तक मंडलों में संतुलन साधना और नए ब्रांच अधिकारियों की निष्पक्ष तैनाती करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
यही स्थिति अराजपत्रित लेखा संवर्ग (Accounts Staff) के संदर्भ में भी देखने को मिल रही है। लंबे समय से पटना में तैनात रहे और मार्च 2026 में स्थानांतरित किए गए कर्मचारियों को पुनः पटना और हाजीपुर में समायोजित किए जाने की प्रक्रिया प्रशासनिक नीतियों पर न केवल प्रश्न खड़े करती है, बल्कि एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर भी संकेत करती है। इसके अलावा, पूर्व पीएफए (कंस्ट्रक्शन) के कार्यमुक्त होने की परिस्थितियों तथा मुख्यालय में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ प्रशासनिक तालमेल के अभाव ने वित्त विभाग की कार्यसंस्कृति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
प्रशासनिक पारदर्शिता, निष्पक्षता और स्थानांतरण नीति के स्पष्ट उल्लंघन के बावजूद ऐसे निर्णयों पर रेलवे बोर्ड (मेम्बर फाइनेंस, सीआरबी) तथा रेल मंत्रालय द्वारा संज्ञान न लिया जाना कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े करता है। वित्त विभाग की गरिमा और कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए इन सभी विसंगतियों की निष्पक्ष विजिलेंस जांच अत्यंत आवश्यक है, मगर यह निष्पक्ष जांच पूर्व मध्य रेलवे के वर्तमान प्रिविलेज्ड एसडीजीएम के रहते कदापि संभव नहीं हो सकती है।

