कम्पोजिट स्लीपर नीति: रेलवे बोर्ड में भारी लॉबिंग, वसूली के आरोप और वित्तीय संकट

रेलवे बोर्ड के शीर्ष स्तर पर उच्चस्तरीय लॉबिंग, अवैध धन उगाही और सार्वजनिक खरीद नीति में हेरफेर से जुड़ा एक बड़ा विवाद सामने आया है। व्हिसलब्लोअर खुलासों और उद्योग सूत्रों के अनुसार, रेलवे स्लीपर निर्माण के लिए आधुनिक कैरोसेल-आधारित तकनीक लाने की प्रस्तावित नीति को कुछ स्थापित बड़े स्लीपर निर्माताओं के सिंडिकेट द्वारा जानबूझकर पटरी से उतारने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके। वहीं दूसरी ओर, भारतीय परिस्थितियों में कम्पोजिट स्लीपरों की तकनीकी उपयुक्तता और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले भारी वित्तीय बोझ को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

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यह पूरा मामला ट्रैक इन्फ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने के लिए रेलवे बोर्ड द्वारा कैरोसेल-आधारित स्लीपर प्लांट तकनीक को अपनाने की पहल से शुरू हुआ था। शुरुआत में यह माना जा रहा था कि इस बदलाव में देश भर में कई विनिर्माण इकाईयां चलाने वाले कुछ चुनिंदा बड़े स्लीपर निर्माताओं को ही ऐसे विशेष प्लांट स्थापित करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, जब अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) ने कैरोसेल-आधारित तकनीक के लिए औपचारिक रूप से रुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) आमंत्रित की, तो मौजूदा स्लीपर निर्माताओं की ओर से लगभग 40 आवेदन प्राप्त हुए। व्यापक स्तर पर सामने आई इस खुली भागीदारी ने बड़े निर्माताओं के एकाधिकार को हिलाकर रख दिया, जिसके बाद इस आधुनिकीकरण नीति को पूरी तरह रद्द कराने के लिए परदे के पीछे से लॉबिंग शुरू हो गई।

सूत्रों का कहना है कि कई प्लांट चलाने वाले कुछ स्थापित निर्माताओं ने रेलवे बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों के साथ नीति को वापस लेने या ठंडे बस्ते में डालने के लिए दबाव बनाना शुरू किया, जिससे नए और अन्य निर्माताओं के प्रवेश को रोका जा सके। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि कुछ विशिष्ट स्लीपर निर्माताओं से शीर्ष निर्णयकर्ताओं के नाम पर बड़े पैमाने पर अनधिकृत धन संग्रह किए जाने के आरोप लगे हैं। विशेष रूप से सदस्य (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के नाम पर और कार्यकारी निदेशक/ट्रैक मॉडर्नाइजेशन (#EDTM) के कथित सहयोग से इस नीति को रद्द करवाने के लिए यह वसूली किए जाने की चर्चा है। चिंताजनक तथ्य यह भी सामने आया है कि कुछ ऐसे व्यक्ति और निर्माता, जो पहले से ही सीबीआई की जांच और कार्यवाहियों के दायरे में हैं, वे भी इस धन संग्रह और लॉबिंग की गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हैं।

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इन घटनाक्रमों को देखते हुए इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष सतर्कता जांच कराने की मांग तेज हो गई है। स्वतंत्र जांच एजेंसियों से यह सत्यापन करने का अनुरोध किया गया है कि क्या रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर निर्माताओं से कोई वित्तीय वसूली की गई, इस पूरे तंत्र को संचालित करने वाले मध्यस्थों की क्या भूमिका है, क्या वाणिज्यिक लाभ के लिए बाजार प्रतिस्पर्धा को कुचलने का प्रयास किया गया और क्या किसी रेल अधिकारी ने व्यक्तिगत लाभ के लिए इस नीतिगत हेरफेर को बढ़ावा दिया।

प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं के अलावा, बड़े पैमाने पर कम्पोजिट स्लीपरों को अपनाए जाने से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ भी एक बड़ा मुद्दा है। वर्तमान में भारतीय रेल में इस्तेमाल होने वाला एक मानक प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट (#PSC) मेनलाइन स्लीपर लगभग 2,500 से 3,500 रुपये में तैयार हो जाता है, जबकि विशेष पॉलिमर और आयातित घटकों पर आधारित एक कम्पोजिट स्लीपर की लागत लगभग 10,000 से 18,000 रुपये प्रति स्लीपर तक बैठती है, जो कंक्रीट स्लीपर की तुलना में लगभग तीन से पांच गुना अधिक महंगी है।

भारतीय रेल के लगभग 70 हजार रूट किलोमीटर (जो वास्तविक ट्रैक विस्तार के रूप में 1 लाख किलोमीटर से अधिक है) के विशाल नेटवर्क पर प्रति किलोमीटर औसतन 1,540 से 1,660 स्लीपरों की आवश्यकता होती है। इस पूरे नेटवर्क के लिए करीब 15 से 16 करोड़ स्लीपरों की दरकार होती है। ऐसे में यदि इस ट्रैक के एक हिस्से में भी महंगे कम्पोजिट स्लीपर लगाए जाते हैं, तो इस पर लाखों करोड़ रुपये का अत्यधिक खर्च आएगा, जो पीएससी स्लीपरों की तुलना में बिना किसी ठोस अतिरिक्त लाभ के सार्वजनिक खजाने पर असहनीय बोझ डालेगा।

वित्तीय संकट के साथ-साथ भारतीय रेल के नेटवर्क पर कम्पोजिट स्लीपरों की तकनीकी और इंजीनियरिंग संबंधी मजबूती को लेकर भी गंभीर संशय बना हुआ है। भारतीय रेल वर्तमान में अपनी गति और एक्सल लोड दोनों को लगातार बढ़ा रही है, जिसमें डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर डबल-स्टैक कंटेनर संचालन के लिए 25 टन और 32.5 टन तक का भारी एक्सल लोड शामिल है। ऐसे भारी एक्सल लोड और तेज गति पर ट्रैक को स्थिरता देने के लिए पारंपरिक कंक्रीट स्लीपर अपने भारी वजन और उच्च ट्रैक मॉड्यूलस के कारण अत्यधिक गतिशील पार्श्व और ऊर्ध्वाधर बलों को आसानी से सहन कर लेते हैं। इसके विपरीत, कम्पोजिट स्लीपरों का घनत्व और वजन काफी कम होता है, जिससे लगातार भारी दबाव और उच्च गति पर ट्रैक विस्थापन, कंपन और गिट्टी (#Ballast) पर अस्थिरता का वास्तविक जोखिम बना रहता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी कमजोरी इसमें लगने वाले फास्टनरों और स्क्रू-स्पाइक्स की पकड़ को लेकर है। लगातार भारी मालगाड़ियों के आवागमन से उत्पन्न कंपन और चक्रीय भार के कारण कम्पोजिट सामग्री के भीतर माइक्रो-क्रैकिंग और स्क्रू के थ्रेड ढीले होने की आशंका बनी रहती है। समय बीतने के साथ इन स्लीपरों में लगे स्क्रू का आवश्यक टॉर्क और कसाव बनाए रखना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे लंबे समय में गेज फैलने और गंभीर ट्रेन दुर्घटनाओं का खतरा पैदा हो सकता है।

इसके अतिरिक्त, भारत की चरम और विविधतापूर्ण जलवायु भी कम्पोजिट स्लीपरों के लिए एक बड़ी चुनौती है। यूरोप या ठंडी जलवायु वाले देशों में जहां इनका उपयोग केवल लकड़ी के सड़ने की समस्या से बचने के लिए स्टील गर्डर पुलों, टर्नआउट्स या लाइट रेल ट्रांजिट तक ही सीमित रखा गया है, वहीं भारतीय उपमहाद्वीप में ट्रैक को 45 से 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक की भीषण गर्मी, तीव्र पराबैंगनी (यूवी) विकिरण और अत्यधिक मानसूनी नमी का सामना करना पड़ता है। लंबे समय तक अत्यधिक तापमान और यूवी किरणों के प्रभाव से कम्पोजिट पॉलिमर के भीतर कड़ापन (ब्रिटलनेस), थर्मल फैलाव और लचीलेपन में कमी आ सकती है, जिससे स्लीपर कमजोर होकर समय से पहले खराब हो सकते हैं।

यूरोपीय देशों में जहां यह स्लीपर कम वजन और विशिष्ट परिस्थितियों में सीमित तौर पर उपयोगी साबित हुए हैं, वहीं भारतीय रेल के 1676 मिमी वाले ब्रॉड गेज और भारी एक्सल लोड वाले मेनलाइन ट्रैक पर इनकी उपयुक्तता अभी भी तकनीकी कसौटी पर खरी नहीं उतरी है। ब्रॉड गेज की चौड़ाई अधिक होने के कारण स्लीपर के केंद्र पर बेंडिंग मोमेंट काफी अधिक पड़ता है, जिसके लिए असाधारण मजबूती और बैलास्ट बेड पर समान भार वितरण की आवश्यकता होती है। ऐसे में बिना किसी बहुवर्षीय व्यापक फील्ड ट्रायल के और प्रशासनिक शुचिता व वित्तीय व्यवहार्यता को दरकिनार कर कम्पोजिट स्लीपर नीति को आगे बढ़ाना रेल संरक्षा और सार्वजनिक धन दोनों के साथ खिलवाड़ साबित हो सकता है।