कैडर का खोखलापन: क्या सेवारत रेल इंजीनियर्स को केवल क्लर्क और कमीशन एजेंट बना दिया गया है?
रेलवे बोर्ड द्वारा सेवानिवृत्त आईआरएसई (#IRSE) अधिकारियों के माध्यम से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (#DPR) की अनिवार्य “पीयर रिव्यू” (सहकर्मी समीक्षा) कराने के विवादास्पद फैसले ने सेवारत इंजीनियरिंग संवर्ग में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इसने भारतीय रेल के भीतर लंबे समय से सुलग रहे पहचान के संकट को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। सेवानिवृत्त अधिकारियों के पिछले दरवाजे से पुनर्वास और वित्तीय जवाबदेही के पूर्ण अभाव के आरोपों से इतर, वरिष्ठ बुनियादी ढांचा विश्लेषकों और सेवारत अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह नीति रेलवे की इन-हाउस पेशेवर दक्षता को खत्म करने की एक सुनियोजित साजिश है।
नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने प्रश्न उठाया, “यदि फाइनल लोकेशन सर्वे (#FLS) करने, डीपीआर तैयार करने से लेकर जटिल इंजीनियरिंग डिजाइन, हाइड्रोलिक मानकों और पुलों की ड्राइंग की जांच तक हर महत्वपूर्ण तकनीकी जिम्मेदारी निजी सलाहकारों और सेवानिवृत्त बाबुओं को ही आउटसोर्स की जानी है, तो फिर सेवारत कैडर का क्या औचित्य रह जाता है? क्या देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक को पास करके आए शीर्ष इंजीनियरिंग मस्तिष्कों को केवल प्रशासनिक बिचौलिया बना दिया गया है, जिनका काम केवल टेंडर फाइलें आगे बढ़ाना, रस्मी निरीक्षण करना, कागजी खानापूरी निपटाना और कमीशनखोरी की मशीनरी चलाना रह गया है?”
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आलोचक रेलवे बोर्ड द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी पत्र संख्या 2025/W-I/Genl./Peer Review of DPR (E-3508081) की नीति में एक स्पष्ट विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं। रेलवे बोर्ड यह तर्क देकर सेवानिवृत्त ‘सेक्टर विशेषज्ञों’ को ₹1 लाख प्रतिदिन के हिसाब से नियुक्त करने को उचित ठहरा रहा है कि निजी सलाहकारों द्वारा तैयार डीपीआर में गंभीर खामियां होती हैं, जिससे परियोजनाओं के दायरे में बार-बार बदलाव और भारी लागत वृद्धि होती है। विडंबना यह है कि इन समस्याओं को “ठीक” करने के लिए जिन सेवानिवृत्त अधिकारियों को वापस लाया जा रहा है, ये वही चेहरे हैं जिन्होंने दशकों तक इन्हीं निर्माण संगठनों, डिजाइन अनुमोदनों और परियोजना निष्पादनों का नेतृत्व किया था। निजी सलाहकारों की जवाबदेही तय करने या सेवारत फील्ड इंजीनियरों को सशक्त बनाने के बजाय, प्रशासन ने एक ऐसा बंद घेरा तैयार कर दिया है जहां वही जाने-पहचाने नाम निर्णय लेने वाली कुर्सियों से हटकर सीधे मलाईदार सेवानिवृत्ति-उपरांत पदों पर आसीन हो जाते हैं।
पर्यवेक्षक वित्तीय प्रबंधन के घिनौने दोहरे चरित्र को भी उजागर करते हैं। एक तरफ जब जोनल रेलवे लगातार खाली खजाने का रोना रोते हुए काम कर रहे ठेकेदारों के वैध रनिंग बिलों को रोक रहे हैं, परिचालन रखरखाव का गला घोंट रहे हैं, और जमीनी स्तर पर दिन-रात खटने वाले रेल कर्मचारियों के ओवरटाइम भत्ते, राष्ट्रीय अवकाश भत्ते और एरियर को लटकाए हुए हैं; वहीं दूसरी तरफ तथाकथित पीयर रिव्यू के नाम पर भारी-भरकम, बेहिसाब मानदेय बांटने के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया गया है। फ्रंटलाइन कर्मचारियों के बुनियादी हकों और जरूरी परिचालन खर्चों में कटौती करके सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के धन को सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों की जेबें भरने में लगाना, प्रशासन की विकृत वित्तीय प्राथमिकताओं और नैतिक पतन को पूरी तरह उजागर करता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस नीति में स्थापित प्रशासनिक जांच तंत्रों को जानबूझकर दरकिनार किया गया है। भारतीय रेल भारत सरकार का एक प्रमुख अंग है, जिसके पास सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए पूर्णकालिक, वैधानिक आंतरिक ऑडिट (#Audit) और सतर्कता (#Vigilance) विंग मौजूद हैं। फिर चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (#CRB) और संबंधित बोर्ड मेंबर्स इन संदिग्ध नीतिगत ढांचों के व्यापक और स्वतंत्र प्रशासनिक ऑडिट का आदेश देने से क्यों बच रहे हैं? चाहे वह ‘डीपीआर की पीयर रिव्यू’ के जरिए दिया जा रहा सेवानिवृत्ति-उपरांत अनुचित लाभ हो, या फिर सब-स्टेशन इंसुलेटर, पावर कार, ट्रैक कंपोनेंट, ओएचई (#OHE) और एसएंडटी (S&T) उपकरणों की खरीद से जुड़ी नीतियां—चयनात्मक अनदेखी का यह तरीका बिल्कुल साफ है। जब नीतिगत खामियों का सीधा फायदा बार-बार वेंडर सिंडिकेट, पसंदीदा सलाहकारों और उपकृत सेवानिवृत्त अधिकारियों को ही मिल रहा है, तो रेलवे बोर्ड के हाथ किसने बांध रखे हैं?
सेवारत अधिकारियों से मूल तकनीकी और डिजाइन जिम्मेदारियों को छीनकर भारतीय रेल अपने स्थायी इंजीनियरिंग तंत्र को पूरी तरह कौशलहीन बनाने के गंभीर खतरे की ओर धकेल रही है। जब वास्तविक इंजीनियरिंग निर्णयों को पूरी तरह से बाहरी एजेंसियों और गैर-जवाबदेह सेवानिवृत्त अधिकारियों के हवाले कर दिया जाएगा, तो आधिकारिक प्रशासनिक ढांचा केवल क्लर्क बनकर रह जाएगा। जानकारों का साफ कहना है कि जब तक रेलवे बोर्ड संरक्षण की इस समानांतर व्यवस्था पर रोक नहीं लगाता, आंतरिक डिजाइन और सर्वेक्षण की जवाबदेही बहाल नहीं करता और लापरवाह निजी सलाहकारों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक जनता की गाढ़ी कमाई इसी तरह लुटती रहेगी और वास्तविक जवाबदेही फाइलों में दबी रह जाएगी।

