रेलवे बोर्ड : ‘कॉन्ट्रैक्ट राज’ में दरकते विभाग !
रेलवे बोर्ड में नए एमओबीडी के आगमन के बीच शीर्ष प्रशासनिक चुनौतियों और सांगठनिक सुधार की आवश्यकता पर एक विशेष रिपोर्ट
- रेल का संकट: जुगाड़ बनाम सिस्टम!
- नए MOBD से उम्मीद और आशंका?
- भारतीय रेल: दम तोड़ती गरिमा, खामोश बोर्ड!
- मिशन 2027-2029: बेपटरी होती रेल व्यवस्था!
- रेलवे का नया वर्क कल्चर: डर, कूटनीति और सरेंडर!
सुरेश त्रिपाठी
रेलवे बोर्ड के नए मेंबर ऑपरेशन एंड बिजनेस डेवलपमेंट (#MOBD) डॉ. मनोज सिंह ने सोमवार, 22 जून 2026 को औपचारिक रूप से अपना नया पदभार ग्रहण कर लिया। उनके इस पद पर आने से रेल गलियारों में उम्मीद और आशंका दोनों का माहौल बना है। ‘देर आए, पर दुरुस्त नहीं आए’ की तर्ज पर हुए इस बदलाव के बीच विशेषज्ञ उन्हें लंबी रिसर्च और स्टडी का माहिर मानते हैं, परंतु साथ ही उनके पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए परिणामों के मोर्चे पर शून्य रहने का भी आरोप उन पर लगता रहा है। वर्तमान में रेलवे के ‘कॉन्ट्रैक्ट मुखिया’ द्वारा पूरी तरह से ध्वस्त और हतोत्साहित किए जा चुके इस महत्वपूर्ण विभाग को वे कैसे उबारेंगे, यह एक बड़ा प्रश्न है।
डॉ. मनोज सिंह के विषय में यह सामान्य चर्चा है कि वे ‘देशी जुगाड़ तकनीक’ के विशेषज्ञ हैं और रेलवे बोर्ड के वर्तमान मुखिया यानि कॉन्ट्रैक्ट चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सीआरबी) की ही तरह उन्हें भी फील्ड में काम करने का कोई खास अनुभव नहीं है। जुगाड़ तकनीक में उनकी इसी महारत का ताजा प्रमाण आज उनका बोर्ड मेंबर बन जाना माना जा रहा है, जबकि इसका पुराना प्रमाण बोर्ड में रहते हुए अपने छोटे भाई पंकज सिंह—जो वर्तमान में पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल डिवीजन में डीआरएम हैं—को अपने बाद बांग्लादेश में ट्रैफिक की पोस्ट पर प्रतिनियुक्ति दिलाने की सफलता को माना जाता है।
डॉ. मनोज सिंह (IRTS-1989) ने अपनी रेल सेवा का अधिकांश समय दिल्ली में ही व्यतीत किया है, जिसके कारण उन्हें ‘ऑल इंडिया डेल्ही सर्विस’ (#AIDS) का मेंबर भी कहा जाता है। वे नीति आयोग में भी प्रतिनियुक्ति पर रहे हैं, जिससे उन्हें लंबी-लंबी रिसर्च और स्टडी करने, किंतु परिणाम के स्तर पर शून्य रहने का भी एक लंबा अनुभव है। इसके साथ ही उन्हें प्रेजेंटेशन देने तथा बिना किसी ठोस नतीजे वाली वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) करने का भी बड़ा शौकीन बताया जाता है। उनके इस आगमन के समय पूर्व एमओबीडी हरिशंकर वर्मा के उस दो माह के संक्षिप्त कार्यकाल को याद किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने पूरी निर्भीकता के साथ स्टैंड और कड़े निर्णय लेकर इस पद की आवश्यकता और गरिमा दोनों को स्थापित किया था। वर्मा जी ने इस पद के वास्तविक दायित्वों को रेखांकित करते हुए फील्ड में एक नई आशा और ऊर्जा का संचार किया था, जो वास्तव में किसी भी कुशल नेतृत्व का मुख्य गुण होता है। अब ट्रैफिक और कमर्शियल अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर गहरा संदेह है कि क्या डॉ. मनोज सिंह अपने पूर्ववर्ती अधिकारी द्वारा पुनर्स्थापित की गई इस साहसिक विरासत को संभाल पाएंगे और इसे आगे ले जा सकेंगे?

रेल के गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, यदि नए MOBD डॉ. मनोज सिंह भी चीफ कंट्रोलर (सीसी) और ट्रेन क्लर्क (टीएनसी) के स्तर पर जाकर काम करने लगेंगे, और अपने मन में भावी रेलमंत्री या किसी अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालय का मंत्री बनने की लालसा पाले बैठे वर्तमान ‘कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी’ की तरह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, फर्जी भागदौड़ और अंतहीन बेनतीजा रिव्यू मीटिंग्स वाली कार्य-संस्कृति को अपना लेंगे, तो भारतीय रेल का पूरी तरह से बंटाधार होना निश्चित है।
प्रशासनिक शिथिलता के इस ढ़र्रे के कारण वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के हाथ बैठे-बिठाए कई ऐसे संवेदनशील मुद्दे लग जाएंगे, जिनका सामना करना वर्तमान केंद्र सरकार के लिए अत्यंत कठिन हो जाएगा। आरोप है कि वर्तमान सीआरबी जैसे लोग अंदरखाते शुरू से ही इसी मंशा के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नए MOBD रेल व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले तंत्र का हिस्सा बनते हैं या फिर अपने नीति आयोग के पुराने अनुभव का सही उपयोग करते हुए कुछ दूरगामी नीतियों और ठोस निर्णयों पर काम कर पाते हैं।
इस बीच, रेलवे के शीर्ष पदों से सेवानिवृत्त हुए कई वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अब वह समय आ गया है जब सभी बोर्ड मेंबर्स को आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होना चाहिए और बोर्ड की गरिमा और महत्ता को फिर से स्थापित करना चाहिए, अन्यथा रेल का पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनका कहना है कि सभी मेंबर्स को मिलकर सामूहिक रूप से रेलमंत्री को यह समझाने की नितांत आवश्यकता है कि रेल जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और तकनीकी सिस्टम में डोमेन एक्सपर्ट्स यानि बोर्ड मेंबर्स की क्या इम्पॉर्टेंस होती है।
वर्तमान में पूरा बोर्ड ‘कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी सेंट्रिक’ हो चुका है, जिससे रेलवे के हर विभाग में दरारें आ रही हैं और फील्ड में प्रत्येक विभाग की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि बिना किसी भय के मंत्री महोदय को फील्ड की इस वास्तविकता से अवगत कराया जाना चाहिए कि कॉन्ट्रैक्ट पर चेयरमैन रखने का पूरी रेल व्यवस्था पर कितना आत्मघाती प्रभाव पड़ा है, जिसके चलते वरिष्ठतम अधिकारियों से लेकर कनिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों तक में काम करने का कोई मोटिवेशन नहीं बचा है।
अब स्टाफ का मोटिवेशन रेलमंत्री स्वयं कर रहे हैं!👇
पूर्व अधिकारियों के अनुसार, यह पूरा सिस्टम और रेलवे बोर्ड बड़ी सूझबूझ से तैयार किया गया था, लेकिन जब से इसमें अनावश्यक छेड़छाड़ और प्रयोग शुरू हुए हैं, तब से यह सारी व्यवस्था को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर रहा है। यदि इस प्रशासनिक गिरावट को तुरंत नहीं रोका गया, तो किसी दिन पूरा रेल तंत्र भरभराकर ढ़ह जाएगा और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। वर्तमान में स्थिति यह हो गई है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसे न तो अपने विभाग के कामकाज का पूरा अनुभव है और न ही दूसरे विभागों की तकनीकी जानकारी या समझ है, वह सभी बोर्ड मेंबर्स को पूरी तरह से डिफंक्ट (निष्प्रभावी) करके उन पर अपने निर्णय थोप रहा है और डिक्टेट कर रहा है।
रेलवे बोर्ड और जोनल अधिकारियों का यह भी कहना है कि वर्तमान में भय का वातावरण बनाना, डराना-धमकाना और अधिकारियों को अपमानित करना ही रेलवे का नया वर्क कल्चर और वर्किंग स्टाइल बन चुका है, जबकि एक आदर्श लीडरशिप का काम अपने मातहत कर्मचारियों को मोटिवेट करना और उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करना होता है। पहले के बोर्ड मेंबर्स फील्ड के लोगों द्वारा बताई गई समस्याओं की गहराई और उनके समाधान को समझते थे तथा मांगी गई सहायता उपलब्ध कराने का हरसंभव प्रयास करते थे, परंतु अब वह गौरवशाली परंपरा पूरी तरह समाप्त कर दी गई है।
मौजूदा दौर में बोर्ड के मेंबर्स भी कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी के सामने पूरी तरह सरेंडर कर चुके हैं, क्योंकि कुछ को उनकी हैसियत बता दी गई है, तो कुछ दूसरे सहयोगियों का हश्र देखकर ‘यस सर’ कहने के अलावा कुछ भी बोलने का साहस नहीं जुटा पाते। दूसरी तरफ, वर्तमान सीआरबी काम के अलावा अन्य जोड़-तोड़ की रणनीतियों में बड़े से बड़े शातिर कूटनीतिज्ञों को मात देने की महारत रखते हैं, जिसके बल पर वे भविष्य में मंत्री बनने से लेकर कम से कम अगले चुनाव तक अपने ‘कॉन्ट्रैक्ट’ की मियाद बढ़वाने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं और इसके लिए पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं।

एक पूर्व मेंबर इलेक्ट्रिकल ने इस प्रशासनिक संकट पर बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि वर्तमान कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी असल में बोर्ड मेंबर्स की आपसी कमियों और कमजोरियों पर खेलते हैं। उन्होंने हर विभाग, जोन और डिवीजन में अपने कुछ खास गुर्गे तैयार कर रखे हैं। ये गुर्गे अधिकतर वे अधिकारी हैं जिन्हें उनके संबंधित बोर्ड मेंबर्स से समय पर कोई प्रशासनिक मदद नहीं मिली थी, और सीआरबी ने बिना किसी मेरिट के, एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनकी मदद कर दी। परिणामतः ऐसे अधिकारी अब अपने ही मेंबर्स की जड़ें काटने और सीआरबी के इशारे पर एक ‘टूलकिट’ की तरह काम करने के लिए अंधभक्त बनकर समर्पित हैं।
पूर्व अधिकारी बताते हैं कि ट्रैफिक विभाग के पिछले MOBD चूंकि सीआरबी के साथ काम कर चुके थे, इसलिए वे उनकी रग-रग से परिचित थे और उन्होंने भरसक यह नौबत नहीं आने दी कि उनके विभाग के लोगों की शिकायतों को उनके अलावा कोई और सुने या उनके डोमेन में कोई बाहरी व्यक्ति निर्णय डिक्टेट करे। आज यही सख्त रुख सभी बोर्ड मेंबर्स को अपनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि ‘कॉन्ट्रैक्ट सीआरबी’ का रेलवे में कोई दीर्घकालिक हित या स्टेक नहीं है, इसलिए उनके दूरगामी परिणाम वाले किसी भी गलत निर्णय पर रेल हित में सभी बोर्ड मेंबर्स को खुलकर स्टैंड लेना चाहिए।
उनका कहना था कि इसके लिए उन्हें सामूहिक रूप से मंत्री के पास जाना चाहिए और यदि वहां भी सुनवाई न हो, तो अपनी बात को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक पहुंचाना चाहिए। यदि भारतीय रेल को बचाना है, तो बोर्ड मेंबर्स की गरिमा और उनकी पुरानी स्वायत्त भूमिकाओं को पुनर्जीवित करना ही सबसे पहला लक्ष्य होना चाहिए, चाहे वे नए सदस्य डॉ. मनोज सिंह हों या असहाय अवस्था में दिन काट रहे अन्य बोर्ड मेंबर्स। वर्तमान में फील्ड स्तर पर हर विभाग के लोग इतने परेशान और फ्रस्ट्रेटेड हैं कि उनके भीतर इस व्यवस्था के प्रति भारी आक्रोश है, फिर भी वे सुधार के लिए सबसे पहली उम्मीद अपने बोर्ड मेंबर से ही रखते हैं।
भारतीय रेल के इस गंभीर प्रशासनिक परिदृश्य को देखते हुए और इसके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कुछ बेहद कड़े और दूरगामी सुधारात्मक कदम उठाए जाने अनिवार्य प्रतीत होते हैं। सबसे पहले रेलवे बोर्ड में ‘कॉन्ट्रैक्ट’ संस्कृति को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर डोमेन विशेषज्ञों और वरिष्ठ कैडर के अधिकारियों की स्वायत्तता को बहाल किया जाना चाहिए, ताकि नीतिगत निर्णयों में किसी एक व्यक्ति का तानाशाही वर्चस्व न रहे। रेलवे जैसे संवेदनशील और तकनीकी संगठन में भय और अपमान पर आधारित वर्क कल्चर को बदलकर संवाद और प्रोत्साहन आधारित नेतृत्व शैली को अपनाना होगा, जिससे फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों और जूनियर अधिकारियों का मनोबल वापस लौट सके।
इसके अतिरिक्त, जोनल और डिवीजनल स्तर पर समानांतर गुटबाजी या ‘टूलकिट’ व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए एक पारदर्शी और मेरिट-आधारित शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना जरूरी है, ताकि कोई भी बाहरी तत्व अधिकारियों की व्यक्तिगत प्रशासनिक समस्याओं का अनुचित लाभ न उठा सके। रेलवे बोर्ड को अंतहीन और बेनतीजा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जाल से बाहर निकलकर वास्तविक फील्ड मॉनिटरिंग और दूरगामी अवसंरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जिससे न केवल रेल संचालन सुरक्षित हो सके, बल्कि भविष्य की राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का भी समय रहते मजबूती से सामना किया जा सके।

