भारतीय रेल : साहित्य से सिनेमा तक
भारतीय रेल आम जन-जीवन से इतनी जुड़ी हुई है कि यह किसी न किसी रूप में हर भारतीय के जीवन में अपना एक खास स्थान रखती है!

पहले-पहल जब भारत में रेल चलना शुरू हुई तब क्या अधिकारी क्या सुपरवाइजर सभी अंग्रेज ही होते थे। धीरे-धीरे रेल नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें एंग्लो-इंडियंस और पारसियों को जगह मिलनी शुरू हुई। इसका एक बड़ा कारण था अंग्रेजी भाषा पर अपेक्षाकृत उनकी बेहतर पकड़ और उनका अंग्रेजी रहन-सहन। लेकिन वे थे कर्मचारी स्तर पर ही। यथा टीसी, गार्ड, एएसएम, इंजन ड्राइवर आदि। प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड ने अपने एक चाचा का उल्लेख किया है जो दिल्ली स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।
यदि आप साहित्य के फलक पर देखेंगे तो पाएंगे क्या गीतकार शैलेन्द्र, क्या गुलशन बावरा, क्या आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी—जिनके नाम से एक पूरा युग ही हिंदी साहित्य में “दिवेदी युग” के नाम से जाना जाता है—वे मध्य रेलवे, तब की “जीआईपी रेलवे” में कार्यरत थे। अजमेर, बम्बई, बॉम्बे और अब मुंबई, नागपुर के अलावा वे झाँसी डीएस (डिवीजनल सुपरिटेंडेंट) ऑफिस—वर्तमान डीआरएम (डिवीजनल रेलवे मैनेजर) के कार्यालय में मुख्य लिपिक थे। सीनियर से अनबन के कारण नौकरी छोड़ हिंदी की फुल टाइम सेवा में जुट गये थे।
दरअसल तब दो-तीन ही सरकारी विभाग थे जिनमें बम्पर नौकरियों की गुंजायश थी। एक मिलिटरी—जिसमें जाने के नाम से ही परिवार में रोना-धोना शुरू हो जाता था—दूसरा रेलवे और तीसरा डाक विभाग।
कुछ प्रमुख लोग, जो भारतीय फिल्मी दुनिया और साहित्य को रेलवे की देन है:
- बीना राय, पिता पश्चिम रेलवे में स्टोर्स ऑफिसर (IRSS) थे।
- शैलेंद्र, माटुंगा रेलवे वर्कशॉप में मकेनिक (वैल्डर) थे।
- ओम पुरी, पिता जालंधर में रेलवे के स्टोर्स विभाग में थे।
- डेविड, पिता इंजन ड्राइवर।
- गिरीश कार्नाड, बड़े भाई मध्य रेलवे में चीफ इंजीनियर (IRSE) थे।
- नूतन, ससुर रेलवे में महाप्रबंधक/रेलवे स्टाफ कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल
- वी शांताराम, जीआईपी (मध्य रेल) में टीएक्सआर स्टाफ
- ई. बिलीमोरिया, जीआईपी (मध्य रेलवे) में फायरमैन
- राज बब्बर, पिता टूंडला (उत्तर रेलवे) में टीएक्सआर स्टाफ
- गुलशन बावरा, पश्चिम रेलवे मुंबई में गुड्स क्लर्क
- बासु चटर्जी, पिता रेलवे वर्कशॉप अजमेर में
- शेख मुख्तार, पिता रेलवे पुलिस में
- विमल मित्रा, ट्रेन कंट्रोलर दक्षिण पूर्व रेलवे में
- वीना, पिता रेलवे में
- भप्पी सोनी, पूर्व टिकट कलेक्टर
- के पी सक्सेना, कहानीकार, संवाद/स्क्रिप्ट लेखक स्टेशन अधीक्षक
- शीला (मलयालम अभिनेत्री) पिता रेलवे में
- सी रामचंद, पिता मध्य रेलवे में स्टेशन मास्टर
- ऋषिकेश मुखर्जी, ससुर रेलवे में महाप्रबंधक (ए के मुखर्जी)
- मौसमी चटर्जी, पिता रेलवे में (कोलकाता)
- के एल सहगल, उत्तर रेलवे में टाइम कीपर
- रंगनाथ (तेलुगू) चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी टीसी विजयवाड़ा
- रघुनाथ रेड्डी (तेलुगू) चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी
- बालचन्द्र मेनन, निर्देशक, पिता दक्षिण रेलवे में स्टेशन मास्टर
- खराज मुखर्जी (बंगला अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी
- नागेश (तमिल अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी
- वीनू चक्रवर्ती (अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी
- अलेक्स (तमिल) गोल्डन रॉक वर्कशॉप के स्टोर्स विभाग में
- विजयन, निर्देशक (तमिल) गोल्डन रॉक वर्कशॉप
- शिखा स्वरूप, पिता उत्तर रेलवे के स्टोर्स विभाग में
- जॉर्ज बेकर (असमिया/बंगला) अभिनेता पूर्वोत्तर-सीमांत रेलवे में पीडब्ल्यूआई
- सोहराब मोदी, पिता जयपुर/रतलाम/अलवर में रेलवे इंजन ड्राइवर
- नाजिर हुसैन, पिता उत्तर रेलवे लखनऊ में गार्ड
- राशिद खान, वडोदरा स्टेशन पर कार्यरत थे
- इंद्रजीत सिंह तुलसी (गीतकार) लॉ ऑफिसर पश्चिम रेलवे
- आदेश श्रीवास्तव, पिता जबलपुर में टीएक्सआर
- मिलिंद सोमन, पूर्व टिकट कलेक्टर
- पलाश सेन, पिता उत्तर रेलवे में डॉक्टर
- उत्तम मोहंती (उडिया फिल्म) पिता खड़गपुर में गुड्स क्लर्क
- सुमा (तेलुगू) पिता दक्षिण मध्य रेलवे में कार्यरत
- बुद्ध देब दासगुप्ता (बंगला निर्देशक) पिता दक्षिण पूर्व रेलवे
- सुरोजीत चटर्जी, पूर्व अधिकारी दक्षिण पूर्व रेलवे
- मालविका तिवारी, पिता रेलवे अधिकारी
- आयशा धारकर, दादा रेलवे में अधिकारी (IRAS)
- नागभूषण (तेलुगू) गुंटकल में पूर्व बुकिंग क्लर्क
- जरीना वहाब, पिता राजमुन्दरी में गार्ड
- महमूद जूनियर, पिता पश्चिम रेलवे में
- गजराज राव, पिता उत्तर रेलवे में
- लिलेट दूबे, पिता गोविंद रेलवे में इंजीनियर
- डॉ जब्बार पटेल, निर्देशक, पिता दौंड में चीफ यार्ड मास्टर
- शांता आप्टे, पिता मध्य रेलवे के सोलापुर में स्टेशन मास्टर
- राजीव मेनन, फिल्म निर्माता, भाई करुणाकर मेनन (IRAS)
- रलल्पल्ली नरसिम्हा राव, दक्षिण मध्य रेलवे के स्टेटिक्स विभाग में
- ऐरिका लाल, (वक्त फिल्म पर्दे पर ‘आगे भी जाने न तू’) पिता रेलवे में मकेनिकल ऑफिसर
- प्रेम ऋषि, अभिनेता, ड्राइंग ऑफिस पश्चिम रेलवे मुंबई
(हो सकता है त्रुटिवश कुछ नाम छूट गये हों, जिसके लिये खेद और क्षमा)
इसके अलावा क्या भगवती चरण वर्मा, क्या मुंशी प्रेम चंद, क्या के पी सक्सेना—इन महान लेखकों/साहित्यकारों ने भी भारतीय फिल्मों से किसी न किसी रूप में जुड़ाव रखा है। के. पी. सक्सेना तो रेलवे से ही थे। जबकि मुंशी प्रेम चंद और भगवती चरण वर्मा की पुस्तकों पर फिल्में बनीं। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पर भी फिल्म बनी।
हिन्दी फिल्मों में यह आम दृश्य होता था जिसमें रेल किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है। या तो हीरो खुद या कोई न कोई रेलवे में कार्यरत दिखाया जाता था। नायक ट्रेन मे चढ़ रहा है या उतर रहा है, या फिर हीरोइन साथ में ही यात्रा कर रही होती थी।
न जाने कितने ही गीत रेल में, रेल के ऊपर, रेल के इंजन में फिल्माए गए। किसी दुखियारे या दुखियारी को खुदकुशी करनी हो तो रेल, विलेन की मनपसंद जगह रेल की पटरी होती थी, जहां वह किसी न किसी को पटरी से बांध देता था।
कितनी ही फिल्मों के टाइटल तक रेलवे के इर्द-गिर्द घूमते हैं, मसलन फ़्रंटियर मेल, पंजाब मेल, तूफान मेल, रेलवे प्लेटफॉर्म, बनिंग ट्रेन, चेन्नई एक्स्प्रेस, एक चालीस की लास्ट लोकल, दि ट्रेन, भवानी जंक्शन, रेल का डिब्बा, हाफ टिकट, लास्ट ट्रेन फ्राम बॉम्बे, डेक्कन क्वीन, बॉम्बे मेल इत्यादि।
असल में भारतीय रेल आम जन-जीवन से इतनी जुड़ी हुई है कि यह किसी न किसी रूप में हर भारतीय के जीवन में अपना एक खास स्थान रखती है। आप किसी से बात करें, संभावना यह होती है कि उसके परिवार या एक्स्टेंडेड परिवार से कोई न कोई रेलवे में अवश्य होता था, पापा, चाचा, ताऊ, भाई, मामा, मौसा, भतीजा। यह तो साहित्य और फिल्मों की बात है, अन्यथा खेल की दुनिया हो या जीवन के अन्य क्षेत्र, उदाहरण के तौर पर पी टी ऊषा, विश्वनाथन आनंद, पी वी सिंधु, महेंद्र सिंह धोनी हों, लाला अमरनाथ या फिर डायना एडुलजी, गुरुबख्स सिंह, पूरन सिंह हों या फिर मैक्लुस्कीगंज को बसाने का श्रेय रखने वाले मेकलुस्की के पिता। एक समय था जब अपना-अपना भाग्य आजमाने रेल से ही मुंबई उतरते रहे हैं। सालों-साल लोकल ट्रेन में सफर करते हैं अक्सर बेटिकट ही।

