मध्य रेलवे: मनचाहे अधिकारी की घर वापसी!
मध्य रेल के सूत्रों से—पहले सोलापुर से सीनियर स्केल की पोस्ट पूना ले जाकर वहीं शुरू से पोस्टेड एक प्रमोटी अधिकारी को सीनियर स्केल दे दिया। जब इसका खुलासा हुआ और तत्कालीन महाप्रबंधक को पता चला तो आदेश बदले गए।
अब एक और ग्रुप ‘बी’ अधिकारी—बृजेश राय—को मात्र 4-5 महीने में ही वापस मुंबई ले आया गया है जहाँ उन्होंने इंस्पेक्टर से लेकर सीनियर स्केल की नौकरी की है। मात्र पाँच महीने मुंबई के बाहर रहे। इस प्रक्रिया में एक अन्य ग्रुप ‘ए’ अधिकारी को अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ट्रांसफर कर दिया गया—यह कैसा कैडर मैनेजमेंट है?
मुंबई में पुन: पोस्टिंग के लिए फेवर का शक इसलिए भी होता है, क्योंकि एक दिन पहले ही देर शाम को यह आदेश जारी हुआ था और अगले ही दिन कुछ घंटों में संबंधित अधिकारी नागपुर से सोलापुर चार्ज लेने पहुंच गया। कहाँ तो अधिकारियों को रिलीज करने में महीनों लगा दिए जाते हैं, और यहाँ आदेश के तुरंत बाद रिलीज कर दिया। कुछ तो दाल में काला है! तथापि #SrDCM को बदलने का क्या औचित्य था? अर्थात मंडल को डिस्टर्ब करने की मंशा से यह काम किया गया!
पता चला है कि पिछली कुछ जीएम मीटिंग्स में बृजेश राय को ऑपरेटिंग का काम नहीं आने या नहीं कर पाने की भूमिका संभवतः इसीलिए बनाई गई थी, क्योंकि उन्हें वापस मुंबई लाने की ‘डील’ पहले ही हो चुकी थी, यदि ऐसा नहीं था, और वास्तव में उन्हें काम नहीं आना ही उनकी घर वापसी का सही कारण है, तो फिर ऐसे बहुत सारे निकम्मे मध्य रेलवे मुख्यालय और पूरी भारतीय रेल में हैं, तो यह कारण उन्हें स्थाई रूप से घर भेजने के लिए पर्याप्त होना चाहिए!
कल ही हुई आसनसोल मंडल की घटना बताती है कि कैसे गलत ट्रांसफर, पोस्टिंग और रोटेशन के आभाव से रेल सेफ्टी और कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित हुई है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सोलापुर मंडल की ऑपरेटिंग ब्रांच का यह तीसरा ऑफिसर है एक साल में।
वहीं हेड क्वार्टर में तमाम ऐसे अधिकारी हैं जिन्हें कभी मुंबई से बाहर भेजा ही नहीं गया। कार्यवाहक महाप्रबंधक विवेक गुप्ता को इसका संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही पिछली साप्ताहिक समीक्षा बैठक में कहा था कि हेड क्वार्टर—मंडलों को फैसिलिटेट करने के लिए है—लेकिन उनके #PHOD शायद ऐसा नहीं मानते!

