बड़े टेंडर, अवास्तविक कार्यावधि और निर्णय-भय—सुधार की आवश्यकता
भारतीय रेल—देश के आर्थिक विकास की रीढ़ है। बीते 10-11 वर्षों में भारतीय रेल ने अभूतपूर्व पूंजी निवेश, आधारभूत ढ़ाँचे का विस्तार और यात्री सुविधाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। परंतु इसी प्रगति के साथ-साथ टेंडर प्रणाली और कार्यान्वयन तंत्र में कुछ संरचनात्मक कमजोरियाँ भी उभरकर सामने आई हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देना आवश्यक है।
बड़े टेंडर और अव्यावहारिक योजना
हाल के वर्षों में यह देखा जा रहा है कि कई बड़े कार्य—विशेषकर रोड ओवर ब्रिज (#ROB) जैसे जटिल प्रोजेक्ट भी—एक ही टेंडर में समाहित कर दिए जाते हैं। इनमें 4 से 6 अलग-अलग स्थानों के कार्य शामिल होते हैं, जिनकी भौगोलिक, तकनीकी और प्रशासनिक परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऐसे बड़े टेंडर जारी करते समय कार्य स्थल पूरी तरह उपलब्ध नहीं होते, जैसे—
- भूमि अधिग्रहण कार्य अपूर्ण रहता है
- यूटिलिटी शिफ्टिंग लंबित होती है, और
- आवश्यक स्वीकृतियाँ प्रारंभिक अवस्था में ही होती हैं
इसके बावजूद टेंडर में 15 से 24 माह की अवास्तविक पूर्णता अवधि निर्धारित कर दी जाती है, जबकि व्यावहारिक रूप से ब्रिज निर्माण जैसे बड़े कार्य पूरे होने में 4 से 5 वर्षों लग जाते हैं।
नीचे जवाबदेही, ऊपर निर्णय
रेलवे के कार्यान्वयन ढ़ाँचे में वास्तविक क्रियान्वयन JAG और SAG स्तर के अधिकारियों द्वारा किया जाता है। परंतु—
- टेंडर की संरचना,
- कार्यों की क्लबिंग, और
- कार्यावधि का निर्धारण अधिकांशतः उच्च (HAG) स्तर पर किया जाता है।
इस तरह जब परियोजनाएँ अनिवार्य रूप से विलंबित होती हैं, तो जवाबदेही नीचे के अधिकारियों पर आती है, जिससे विजिलेंस और सीबीआई मामलों का भय तो पैदा ही होता है, जबकि लागत कई गुना बढ़ जाती है, जो भ्रष्टाचार को जन्म देती है।
निर्णय-भय का दुष्परिणाम
आज स्थिति यह बन रही है कि नीचे के अधिकारी त्वरित निर्णय लेने से बच रहे हैं, फाइलों का निपटारा बहुत धीमी गति से हो रहा है, और “जोखिम न लेना” ही सुरक्षित प्रशासनिक नीति बनती जा रही है। यहाँ तक कि टेंडर फाइनल करने के बाद भी वास्तविक कार्यारंभ महीनों तक भी नहीं हो पाता है। इस तरह पीवीसी के माध्यम से लागत बढ़ती है।
नीचे के अधिकारियों एवं सुपरवाइजरों का यह निर्णय-भय (Decision Paralysis) न केवल परियोजनाओं को विलंबित करता है, बल्कि राष्ट्रीय अवसंरचना विकास की गति को भी प्रभावित करता है। इस तरह पब्लिक एक्सचेकर पर बोझ बढ़ता है।
सुधार आवश्यक है
रेलवे जैसे विशाल संगठन में विजिलेंस की भूमिका आवश्यक है, किंतु उसका उद्देश्य भय पैदा करना और दोहन करना नहीं, बल्कि सुधारात्मक करना होना चाहिए। किसी भी कार्यवाही का उद्देश्य कार्य निष्पादन बाधित करना तो कतई नहीं होना चाहिए।
समय की मांग है कि टेंडर केवल तभी जारी हों जब साइट और सभी स्वीकृतियाँ तैयार हों, यथार्थवादी पूर्णता अवधि तय की जाए, बड़े कार्यों की अनावश्यक क्लबिंग को तुरंत रोका जाए, और नीति निर्धारण एवं कार्यान्वयन के बीच जवाबदेही का संतुलन स्थापित किया जाए।
निष्कर्ष
भारतीय रेल ने देश को जोड़ने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। यदि टेंडर प्रणाली को अधिक पारदर्शी, व्यावहारिक और जवाबदेह बनाया जाए, तो न केवल निष्ठावान अधिकारियों का आत्मविश्वास लौटेगा, बल्कि परियोजनाएँ समय पर पूरी होंगी और राष्ट्र को वास्तविक लाभ मिल सकेगा।
यह विषय किसी एक अधिकारी या विभाग का नहीं, बल्कि रेलवे के दीर्घकालीन संस्थागत स्वास्थ्य से जुड़ा है—और समयानुसार आवश्यक सुधार करना ही इसका सबसे अच्छा समाधान है।

