प्रशासनिक शुचिता और रेलवे बोर्ड की पदस्थापनाएं: नीतिगत विसंगतियां और कैडर नियंत्रण पर प्रश्नचिन्ह
कुछ अधिकारी नियम, नैतिकता-शुचिता और मानकों से ऊपर समझे जाते हैं। एक विद्युत अधिकारी ऐसे भी हैं, जो ‘हाँ जी सर’ और ‘यस सर’ की संस्कृति के पर्याय हैं। उन्होंने रेलवे बोर्ड में अपना डायरेक्टर का कार्यकाल पूरा किया, वर्ष 2019 में क्रिस (CRIS) में डेपुटेशन पर चले गए और फिर वर्ष 2026 में रेलवे बोर्ड में बतौर एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (ED) वापसी कर ली। इन महाशय का ‘सुनाम’ है—अजय कुमार गोस्वामी, जो पहले रेलवे बोर्ड में डायरेक्टर/इलेक्ट्रिक लोको हुआ करते थे, और अब वहीं ईडी के पद पर पुनः आसीन हो गए हैं।



शहर तो वही रहा, और दिल्ली में ऐसे बहुत सारे घोसले हैं! अब यह किस प्रकार का रोटेशन है, माननीय मंत्री जी?
हाल ही में मात्र एक ही विद्युत अधिकारी—सुंदरेशन—रेलवे बोर्ड में बाहर से आए हैं। इसके विपरीत, एक अन्य अधिकारी राजकुमार सिंह बोर्ड से डीआरएम बनकर गए, फिर जनवरी में डीआरएम का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कुछ समय बड़ौदा हाउस में टहलते रहे और अंततः पुनः बोर्ड में लौट आए। यही स्थिति जीतेन्द्र सिंह की भी रही, जो रेलवे बोर्ड से डीआरएम बनकर वड़ोदरा गए, वहां से बोर्ड में वापस आए और अब बड़ौदा हाउस में पुनः प्रमुख मुख्य विद्युत अभियंता (#PCEE) के रूप में तैनात हो गए हैं। पंकज कुमार सिंह भी बड़ौदा हाउस, दिल्ली से ही डीआरएम बनकर गए थे और वहीं वापस लौट आए—संभव है कि वे भी बड़ौदा हाउस से जल्द ही बोर्ड में आ जाएंगे।
अशोक नाकड़ा को तत्कालीन चेयरमैन/रेलवे बोर्ड विनय कुमार त्रिपाठी द्वारा दिल्ली से बिलासपुर स्थानांतरित किया गया था। उनकी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद—मानो उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए—वे आदेश रद्द कर दिए गए और नाकड़ा साहब को उत्तर रेलवे बड़ौदा हाउस से पद सहित रेलवे बोर्ड ले आया गया। उन्होंने लगभग छह महीने तक अपने स्थानांतरण आदेश पर अमल नहीं किया था। जिन पदों को बोर्ड में वापस लाया गया है, उन्हें स्वयं पूर्व रेलमंत्री पीयूष गोयल ने रेल भवन के दायरे से बाहर किया था। इसका तात्पर्य यह है कि नाकड़ा साहब को उपकृत करने के लिए रेलमंत्री और चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के पूर्ववर्ती आदेशों तक को बदल दिया गया।
क्या भारतीय रेल के विद्युत विभाग में योग्य अधिकारियों का अकाल पड़ा है? क्यों पूरा विद्युत कैडर एक स्थान विशेष और एक विशिष्ट लॉबी के नियंत्रण में सिमटा हुआ है? क्यों ओएसडी/इलेक्ट्रिकल आज भी संवेदनशील (सेंसिटिव) कार्य संभाल रहे हैं? डायरेक्टर भी वहीं, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर भी वहीं, और पदोन्नति भी वहीं की वहीं हो रही है!
माननीय मंत्री जी, यह आपकी अपनी प्रशासनिक टीम है, इन्हें बुलाकर साक्षात्कार (इंटरव्यू) ले लें और आईबी (IB) से इनकी स्कैनिंग करवा लें। आज आपको जो वाटर टेस्टिंग, डिरेलमेंट साइट्स पर स्वयं जाने और पॉइंट मशीनों की वायरिंग का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करने की आवश्यकता पड़ रही है, वह मूलतः इसी प्रकार के पक्षपातपूर्ण चयन और पदस्थापनाओं का परिणाम है। इस तरह के चयन और पदस्थापनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि अधिकारियों की व्यक्तिगत सुख-सुविधाएं और ऐशो-आराम देश के नागरिकों तथा उनके हितों से कहीं ऊपर रखे जा रहे हैं।
यह गंभीर प्रश्न भी उठ रहा है कि जब अक्टूबर और नवंबर माह में एडिशनल मेंबर ट्रैक्शन (AM/Traction) और मेंबर ट्रैक्शन एंड रोलिंग स्टॉक (MTRS) दोनों ही अधिकारी रिटायर कर रहे हैं, तो ऐसे समय में ये तमाम ट्रांसफर-पोस्टिंग के आदेश-निर्देश क्यों जारी किए जा रहे हैं? यह कहां तक तर्कसंगत है? और ये किस प्रकार से प्रशासनिक शुचिता के दायरे में आता है? रेलवे बोर्ड के चेयरमैन सहित जो भी विभाग प्रमुख, जीएम तथा बोर्ड मेंबर अपने रिटायरमेंट के करीब हों, उन्हें ट्रांसफर-पोस्टिंग के साथ-साथ नीतिगत निर्णय लेने से क्यों नहीं रोका जाना चाहिए? इस संदर्भ में #Railwhispers का यह ट्वीट अत्यंत समसामयिक और प्रासंगिक प्रतीत होता है—

निष्कर्ष:
उपरोक्त तथ्यों और विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि रेलवे बोर्ड के विद्युत विभाग में पदस्थापना और स्थानांतरण की प्रक्रियाएं अक्सर प्रशासनिक पारदर्शिता, नीतिगत निरंतरता और मेरिट के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और लॉबी के प्रभाव से संचालित होती हैं। अधिकारियों के बार-बार उन्हीं चुनिंदा कार्यालयों (विशेषकर रेलवे बोर्ड और बड़ौदा हाउस) में चक्रानुक्रम (#Rotation) के नाम पर लौटने से संपूर्ण कैडर की कार्यकुशलता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगते हैं। सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच चुके शीर्ष अधिकारियों द्वारा कार्यकाल के अंतिम चरण में लिए जाने वाले नीतिगत और कार्मिक निर्णय संस्थागत शुचिता के अनुकूल नहीं हैं। अतः रेल प्रशासन में जवाबदेही तय करने, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर अंकुश लगाने तथा सुरक्षा एवं सुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए पारदर्शी मूल्यांकन, सख्त आईबी स्कैनिंग और योग्यता आधारित पदस्थापना प्रणाली का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य हो गया है।

