रनिंग रूम की भोजन व्यवस्था में व्याप्त अनियमितताएँ एवं भोजन पर्चियों के माध्यम से संभावित वित्तीय भ्रष्टाचार

भारतीय रेल के लोको रनिंग स्टाफ को रनिंग रूम में उपलब्ध कराए जाने वाले सब्सिडाइज्ड मील (रियायती भोजन) एवं कच्चे राशन से तैयार भोजन/नाश्ते के भुगतान की वर्तमान व्यवस्था में लंबे समय से गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। विशेष रूप से ऐसे रनिंग स्टाफ, जिन्होंने वास्तविक रूप से भोजन अथवा नाश्ते का उपभोग नहीं किया है, उनके नाम से मैनुअल भोजन पर्चियाँ/टोकन तैयार कर ठेकेदार द्वारा भुगतान प्राप्त किए जाने की संभावना इस व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

1. वर्तमान मैनुअल व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव

आज जब रेलवे की अधिकांश व्यवस्थाओं में ऑनलाइन मॉनिटरिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, QR कोड तथा मोबाइल आधारित प्रणालियों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है, वहीं रनिंग रूम में रनिंग स्टाफ द्वारा वास्तव में उपभोग किए जाने वाले सब्सिडाइज्ड मील अथवा कच्चे राशन से तैयार भोजन/नाश्ते के भुगतान की व्यवस्था अभी भी मुख्य रूप से मैनुअल पर्चियों और टोकनों पर निर्भर है।

इस व्यवस्था में जिस कर्मचारी के नाम से भोजन की पर्ची काटी जाती है, उसके द्वारा वास्तव में भोजन का उपभोग किया गया अथवा नहीं—इसका स्वतंत्र एवं विश्वसनीय डिजिटल सत्यापन वर्तमान व्यवस्था में संभव नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप, ऐसे कर्मचारियों के नाम पर भी भोजन की पर्चियाँ तैयार किए जाने की पूरी संभावना बनी रहती है जिन्होंने वास्तव में भोजन किया ही नहीं होता है।

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इस प्रकार, वास्तविक उपभोग और रेलवे द्वारा किए गए भुगतान के बीच उत्पन्न होने वाले अंतर की स्वतंत्र रूप से जाँच किए बिना वर्तमान व्यवस्था में वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना कठिन है।

2. शिकायतकर्ता रनिंग स्टाफ पर प्रशासनिक दबाव

इस व्यवस्था का दूसरा सबसे गंभीर पहलू यह है कि रनिंग रूम में भोजन की गुणवत्ता अथवा व्यवस्था से संबंधित शिकायत करने वाले रनिंग स्टाफ को कई बार एक सजग शिकायतकर्ता के रूप में संरक्षण मिलने के बजाय अनुचित प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

शिकायत करने वाले रनिंग स्टाफ को बुक ऑफ करना, अधिकारी के कार्यालय के बाहर कई-कई दिनों तक घंटों बैठाए रखना, चार्जशीट देना, कार्य में कमियाँ निकालना अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी देना—जैसी परिस्थितियों का सामना करने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में ठेकेदार के कर्मचारियों के माध्यम से रनिंग स्टाफ के विरुद्ध शिकायत करवाकर दबाव बनवाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।

यदि शिकायतकर्ता कर्मचारी को ही अपनी वास्तविक शिकायत दर्ज कराने के बाद प्रशासनिक उत्पीड़न का सामना करना पड़े, तो इससे रनिंग स्टाफ के बीच भय का वातावरण बनता है और वास्तविक समस्याएँ दबकर रह जाती हैं।

3. इस समस्या के कुछ वास्तविक उदाहरण

  • ECoR का मामला: पूर्व तट रेलवे (#ECoR) में एक लोको पायलट द्वारा रनिंग रूम के भोजन की खराब गुणवत्ता के संबंध में शिकायत किए जाने तथा अन्य साथियों को इससे अवगत कराने के बाद, संबंधित वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता (#SrDEE) द्वारा उसे एक सप्ताह से अधिक समय तक अपने चैंबर के बाहर बुक ऑफ करके रखे जाने की जानकारी सामने आई थी। साथ ही, उसके मंडल स्थानांतरण की तैयारी भी की जा रही थी। बाद में जब यह मामला तत्कालीन चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (#CRB) तक पहुँचा, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध जाँच बैठाई गई और आय से अधिक संपत्ति का मामला भी सामने आया।
  • बिलासपुर में आंदोलन: बिलासपुर में हाल ही में हुए नौ दिवसीय आंदोलन के प्रमुख कारणों में रनिंग रूम के भोजन से जुड़ी अव्यवस्थाएँ भी शामिल थीं। यह तथ्य इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समस्या किसी एक कर्मचारी अथवा किसी एक रनिंग रूम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक है।
  • बिलासपुर में शिकायतकर्ता लोको पायलट के विरुद्ध कार्रवाई: बिलासपुर में एक लोको पायलट द्वारा रनिंग रूम के संबंध में शिकायत किए जाने के बाद, ठेकेदार के एक कर्मचारी द्वारा संबंधित लोको पायलट के साथ अभद्रता एवं गाली-गलौज किए जाने का आरोप लगा। इसके बाद जाँच करने वाले मुख्य लोको निरीक्षक (#CLI) द्वारा लोको पायलट और ठेकेदार के कर्मचारियों के बयान तो दर्ज किए गए, किंतु घटना के समय वहाँ उपस्थित अन्य रनिंग स्टाफ से स्वतंत्र रूप से जानकारी लिए बिना ही लोको पायलट के विरुद्ध जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई।
  • व्यापकता: ऐसी परिस्थितियाँ आज लगभग सभी मंडलों में देखने को मिल रही हैं। इसलिए इसे किसी एक रनिंग रूम या एक ठेकेदार की समस्या मानने के बजाय संपूर्ण व्यवस्था की निगरानी और पारदर्शिता से जुड़ा विषय मानकर इसकी गहन जाँच आवश्यक है।

4. रनिंग रूम के भोजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रनिंग स्टाफ को रनिंग रूम में उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन की वर्तमान व्यवस्था को गहराई से समझने के लिए इसके वित्तीय एवं प्रशासनिक इतिहास पर नजर डालना आवश्यक है।
भल्ला कमेटी की वर्ष 1980 की रिपोर्ट में रनिंग भत्ते के फॉर्मूले के संबंध में यह व्यवस्था स्पष्ट की गई थी कि रनिंग स्टाफ के यात्रा भत्ते (#TravellingAllowance) की गणना 26 दिनों के स्थान पर 20 दिनों के आधार पर की जाएगी। इसका प्रमुख कारण यह था कि छह दिनों के यात्रा भत्ते के समतुल्य राशि को रनिंग रूम में उपलब्ध कराई जाने वाली बेडशीट, भोजन हेतु ईंधन/सिलेंडर तथा रसोइया (कुक) के व्यय आदि के लिए प्रारंभ में ही समायोजित कर लिया गया था।

इस व्यवस्था के तहत रनिंग स्टाफ अपने भोजन के लिए आवश्यक कच्चा राशन स्वयं वहन करता था। अतः रनिंग रूम में मिलने वाला भोजन रेलवे द्वारा कर्मचारियों पर किया गया कोई अतिरिक्त उपकार या सामान्य सुविधा नहीं था, बल्कि रनिंग स्टाफ से पूर्व में ही समायोजित की गई राशि के आधार पर विकसित की गई एक अनुमत व्यवस्था थी।

बाद में रेलवे ने इस व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए विभागीय कर्मचारियों को कुक के कार्य में लगाने तथा अंततः ठेकेदारी प्रणाली के माध्यम से भोजन तैयार कराने की व्यवस्था लागू की। इसके बाद कच्चे राशन से भोजन तैयार कराने और रेडीमेड भोजन के लिए अतिरिक्त भुगतान जैसी व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आईं, जिन्हें आगे चलकर ‘सब्सिडाइज्ड मील’ के रूप में जाना गया।

रेलवे बोर्ड के संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुसार कच्चे राशन तथा सब्सिडाइज्ड मील का विकल्प पूरी तरह रनिंग स्टाफ के विवेक पर छोड़ा गया था। अतः यह मूल रूप से रनिंग स्टाफ की स्वैच्छिक भोजन व्यवस्था है, न कि कोई ऐसा अनिवार्य भुगतान जिसे कर्मचारी द्वारा भोजन न किए जाने की स्थिति में भी उसके नाम पर उठाया जा सके।

5. सब्सिडाइज्ड मील की गुणवत्ता एवं मेन्यू की समस्या

सब्सिडाइज्ड मील की व्यवस्था लागू होने के बाद भी भोजन की खराब गुणवत्ता को लेकर रनिंग स्टाफ द्वारा लगातार शिकायतें की जाती रही हैं। कई रनिंग रूमों में मेन्यू प्रदर्शित किए जाने के दावे के बावजूद आज भी वहाँ स्थायी एवं स्पष्ट मेन्यू का अभाव साफ देखा जा सकता है।

इससे कर्मचारियों के पास यह जानने का कोई ठोस आधार नहीं रहता कि निर्धारित राशि के एवज में उन्हें किस प्रकार का भोजन मिलना चाहिए तथा दी जा रही मात्रा और गुणवत्ता की तुलना वे किस मानक से करें।

6. मैनुअल टोकन व्यवस्था—वित्तीय अनियमितता की संभावित गुंजाइश

सब्सिडाइज्ड मील के भुगतान के लिए वर्तमान व्यवस्था में भोजन का टोकन या पर्ची तैयार की जाती है। इस टोकन पर भोजन का उपभोग करने वाले कर्मचारी के हस्ताक्षर के लिए स्थान तो होता है, किंतु टोकन की पूरी प्रक्रिया और उसकी कस्टडी मूल रूप से ठेकेदार के नियंत्रण में ही रहती है।

यानी, जिस ठेकेदार को भोजन के आधार पर वित्तीय भुगतान प्राप्त करना होता है, उसी के कर्मचारियों द्वारा टोकन काटने की प्रक्रिया भी संचालित की जाती है। हालांकि, निगरानी के लिए रनिंग रूम में रेलवे के अधिकारी या CLI नियुक्त होते हैं।

यहीं पर सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—

जब भोजन का वास्तविक उपभोग करने वाला कर्मचारी डिजिटल रूप से सत्यापित नहीं होता, टोकन तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह ठेकेदार के नियंत्रण में होती है, और भुगतान वास्तविक उपभोग के नाम पर किया जाता है, तो गैर-उपभोग किए गए भोजन के नाम पर कटने वाले फर्जी टोकनों की स्वतंत्र पहचान और रोकथाम किस प्रकार संभव है?

वर्तमान व्यवस्था में यदि कोई रनिंग स्टाफ रनिंग रूम में पहुँचता है और वह भोजन नहीं करना चाहता—चाहे वह व्रत के कारण हो, अपने साथ घर से भोजन लाने के कारण हो, अथवा किसी अन्य व्यक्तिगत कारण से—तो भी उसके नाम पर भोजन का फर्जी टोकन तैयार हो जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यही वह मुख्य बिंदु है जहाँ वास्तविक उपभोग और भुगतान के बीच वित्तीय अंतर उत्पन्न होता है। यदि ऐसे टोकनों का स्वतंत्र डिजिटल सत्यापन न हो, तो इस अंतर को पकड़ना अत्यंत कठिन हो जाता है।

7. समस्या का सबसे गंभीर पक्ष—हितों का टकराव

यदि किसी ऐसी व्यवस्था में, जहाँ वित्तीय भुगतान सीधे भोजन के उपभोग पर निर्भर करता है, भुगतान की पुष्टि करने वाला मुख्य दस्तावेज उसी एजेंसी या ठेकेदार के नियंत्रण में हो जो स्वयं भुगतान प्राप्त कर रहा है, तो स्वतंत्र सत्यापन की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है।

इसके अतिरिक्त, यदि शिकायत करने वाला रनिंग स्टाफ उसी प्रशासनिक तंत्र के अधीन कार्य करता हो जिसके अधिकारियों के पास उसके विरुद्ध D&AR अथवा अन्य दंडात्मक कार्रवाई करने की शक्ति है, तो शिकायतकर्ता की स्थिति बेहद संवेदनशील और असुरक्षित हो जाती है।

यही कारण है कि किसी भी शिकायतकर्ता कर्मचारी की आवाज को दबाने के बजाय उसकी शिकायत को संपूर्ण भोजन व्यवस्था की निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच का आधार बनाया जाना चाहिए।

8. समाधान उपलब्ध है—CMS/Crew App

इस गंभीर समस्या का सबसे व्यावहारिक और तकनीकी समाधान भारतीय रेल के पास पहले से ही उपलब्ध है।

लोको रनिंग स्टाफ के लिए उपयोग किए जाने वाला CMS (Crew Management System) / Crew App प्रत्येक रनिंग स्टाफ के मोबाइल फोन में मौजूद रहता है और उसमें रनिंग रूम से जुड़ा विकल्प भी पहले से उपलब्ध है। इसके माध्यम से रनिंग स्टाफ के रनिंग रूम में आगमन और भोजन की वास्तविक आवश्यकता अथवा उपभोग को डिजिटल रूप से आसानी से दर्ज किया जा सकता है।

आज जब रेलवे द्वारा FSD तथा VHF जैसे आधुनिक उपकरणों के वितरण में QR कोड आधारित डिजिटल प्रणालियाँ अपनाई जा रही हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि रनिंग स्टाफ द्वारा उपभोग किए जाने वाले भोजन के भुगतान को उनके Crew App से लिंक करने की व्यवस्था अभी तक पूर्ण रूप से क्यों नहीं लागू की गई है।

यदि प्रत्येक रनिंग स्टाफ द्वारा वास्तविक रूप से लिए गए भोजन की प्रविष्टि सीधे उसके मोबाइल/क्रू ऐप पर दर्ज हो और उसके पश्चात उसी पुष्ट डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर ठेकेदार को भुगतान जारी किया जाए, तो इसके निम्नलिखित लाभ होंगे-

  • फर्जी अथवा गैर-उपभोग किए गए भोजन के टोकन जारी होने की संभावना समाप्त होगी;
  • कर्मचारी स्वयं अपने नाम पर दर्ज भोजन की डिजिटल पुष्टि कर सकेगा;
  • वास्तविक उपभोग और किए गए भुगतान का सटीक डिजिटल मिलान संभव हो सकेगा;
  • मंडल तथा जोनल स्तर पर उच्चाधिकारियों द्वारा इसकी ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जा सकेगी;
  • ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत बिलों और वास्तविक उपभोग का पारदर्शी ऑडिट किया जा सकेगा; तथा
  • भविष्य में आने वाली शिकायतों की जाँच पूरी तरह स्वतंत्र और तथ्यात्मक आधार पर हो सकेगी।

9. निष्कर्ष एवं आवश्यक कार्रवाई

वर्तमान मैनुअल व्यवस्था में यदि किसी कर्मचारी ने भोजन नहीं किया हो और उसके नाम पर फर्जी पर्ची तैयार कर भुगतान उठा लिया गया हो, तो उस अनियमितता को वर्षों बाद प्रमाणित करना बेहद कठिन होता है। विशेष रूप से तब, जब संबंधित कर्मचारी उसी प्रशासनिक तंत्र के अधीन हो और उसके पास अपने नाम से काटी गई प्रत्येक पर्ची का कोई स्वतंत्र डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध न हो।

अतः केवल पुराने मैनुअल रिकॉर्ड्स की कागजी जाँच करके इस संभावित वित्तीय अनियमितता का पता लगाना ‘भूसे के ढ़ेर में सुई ढूँढ़ने’ जैसा साबित हो सकता है।

इसलिए, किसी एक अधिकारी या ठेकेदार पर व्यक्तिगत आरोप मढ़ने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि पूरी व्यवस्था को ही पारदर्शी और डिजिटल बनाया जाए।

प्रभावी एवं निष्पक्ष तरीका—

भारतीय रेल के समस्त रनिंग रूम्स में #CrewApp के “#RunningRoom” सेक्शन के माध्यम से भोजन/मील पर्ची की डिजिटल व्यवस्था तत्काल प्रभाव से एक साथ लागू की जाए। इसके साथ ही, पूर्व की अवधि में ठेकेदारों को किए गए भुगतानों और नई डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बाद वास्तविक उपभोग के आधार पर होने वाले भुगतानों का एक तुलनात्मक अध्ययन कराया जाना चाहिए।

यदि डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बाद ‘वास्तविक उपभोग’ और पूर्व में किए गए ‘दावाकृत भुगतानों’ के बीच कोई बड़ा और असामान्य अंतर सामने आता है, तो वह आगे की स्वतंत्र वित्तीय एवं प्रशासनिक जाँच का एक अत्यंत पारदर्शी ठोस आधार बन सकता है।

इस प्रकार, किसी भी रनिंग कर्मचारी, अधिकारी या ठेकेदार को पूर्वाग्रह के आधार पर दोषी ठहराने के बजाय एक ऐसी पारदर्शी प्रणाली स्थापित की जा सकती है जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश न्यूनतम हो और प्रत्येक भोजन का भुगतान वास्तविक उपभोग के आधार पर पूरी तरह सत्यापित हो सके।