RDSO में गहराता भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पतन: CBI छापों से लेकर वेंडर-अधिकारी नेक्सस तक, रेलवे बोर्ड की चुप्पी पर उठते प्रश्न!
रेलवे बोर्ड का शीर्ष नेतृत्व जानबूझकर यही चाहता, और लगातार इसी प्रयास में लगा रहता है, कि तकनीकी रूप से आरडीएसओ इतना लाचार और कमजोर बना रहे कि बोर्ड बिना किसी तकनीकी चुनौती या प्रतिरोध के अपनी मनमानी चलाता रहे!
रेलवे बोर्ड के मेंबर इंफ्रास्ट्रक्चर (#MInfra) अभी हाल ही में अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (#RDSO), लखनऊ के दो दिवसीय दौरे से लौटे ही थे कि उनके इस तथाकथित ‘प्रेरक दौरे’ के तुरंत बाद संस्थान की साख पर एक और बड़ा बट्टा लग गया। आरडीएसओ के सिविल इंजीनियरिंग डायरेक्टोरेट के एक डिप्टी डायरेक्टर (#DD)और एक सीनियर सेक्शन इंजीनियर (#SSE) को केंद्रीय जांच ब्यूरो (#CBI) ने कोलकाता में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों ट्रैप कर लिया।
आरडीएसओ में भ्रष्टाचार का यह रोग कोई नया नहीं है; यह संस्थान लंबे समय से कुछ जुगाड़ू अधिकारियों और चुनिंदा वेंडरों का पसंदीदा क्रीड़ा-स्थल बना हुआ है। हाल के दिनों में बंडामुंडा (#BNDM) और पुरी जैसी जगहों पर सामने आई गड़बड़ियों से सामान्य लोग भले ही हैरान हों, लेकिन रेलवे के अनुभवी और पुराने अधिकारी इसे स्वाभाविक मानते हुए यही कह रहे हैं कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय।’
तकनीकी और अनुसंधान के इस शीर्ष संस्थान को उबारने के लिए दो बुनियादी सुधारों की कठोर आवश्यकता है। पहली आवश्यकता यह है कि यहाँ केवल अपनी व्यक्तिगत सुविधा और लखनऊ में मलाईदार पोस्टिंग चाहने वालों के बजाय ऐसे योग्य एवं दक्ष अधिकारियों को पदस्थापित किया जाए, जो सही मायने में भारतीय रेल की प्रगति और संरक्षा के लिए समर्पित हों। दूसरा, आरडीएसओ में एक ऐसा पारदर्शी इकोसिस्टम तैयार किया जाए जो संस्थान को विजिलेंस की संदिग्ध गतिविधियों—जैसे हफ्ता वसूली और हिस्सा-बाँट, और वेंडर-अधिकारी के खतरनाक नेक्सस से मुक्त रख सके। यह बदलाव केवल और केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के दम पर ही संभव है, जिसका फिलहाल सर्वथा अभाव दिखता है।
आरडीएसओ की त्रासदी यह रही है कि यहाँ महानिदेशक (DG) स्तर से लेकर निचले सेक्शन ऑफिसर स्तर तक के रेलकर्मी कभी न कभी सीबीआई के हत्थे चढ़ चुके हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि संस्थान के ऑफिसर्स क्लब को जिस तरह से ‘चांदनी बार’ की संस्कृति में परिवर्तित कर दिया गया है, उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि व्यवस्था सुधारने को लेकर न तो राजनीतिक नेतृत्व गंभीर है और न ही रेलवे बोर्ड के सदस्यों की कोई साफ नीयत दिखाई देती है। जब DG/ADG/PED जैसे बड़े अधिकारियों के लिए शराब-शराब और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था ही वेंडर करने लगें, तो कोई जूनियर अधिकारी या सुपरवाइजर उन वेंडरों-सप्लायरों की मनमानी पर कैसे अंकुश लगा सकता है?
MSG और DMG की बैठकों में जिस तरह महंगे उपहारों की उम्मीदें बांधी जाती हैं, उस भ्रष्ट माहौल में रेल संरक्षा और उपकरणों की रिलायबिलिटी (विश्वसनीयता) सुनिश्चित करना पूरी तरह असंभव है। ऐसा लगता है कि सिस्टम को अब सत्यनिष्ठ प्रोफेशनल्स की नहीं, बल्कि केवल ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता रह गई है जो सप्लायरों की ‘गुड बुक्स’ में बने रहें। इस वर्तमान व्यवस्था में यदि कॉन्ट्रैक्ट पर बैठे सीआरबी को देश के विकसित होने तक का सेवा-विस्तार भी दे दिया जाए, तब भी यह पतन रुकेगा नहीं, बल्कि स्थितियां दिन-प्रतिदिन बदतर ही होती जाएंगी।
संस्थान के भीतर चल रही प्रशासनिक अराजकता का वातावरण यह है कि जिस एडीजी (#ADG) के खिलाफ लखनऊ मंडल, IRITM और स्वयं आरडीएसओ में यौन उत्पीड़न तथा भ्रष्टाचार की ढ़ेरों गंभीर शिकायतें दर्ज हैं, महानिदेशक हर नीतिगत फैसले में उसी पर आंख मूंदकर भरोसा जता रहे हैं। वह एडीजी दिन भर डीजी के कमरे से ही पूरा प्रशासनिक तंत्र चलाता दिखता है। स्थिति इतनी हास्यास्पद और अपमानजनक हो चुकी है कि संस्थान के प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स (#PEDs) लेवल के अधिकारी मिलने के लिए बाहर प्रतीक्षा करते-करते थककर लौट जाते हैं, लेकिन डीजी और एडीजी के बीच घंटों चलने वाली अनौपचारिक चर्चाएं यानी आपसी जुगलबंदियां खत्म ही नहीं होतीं। वेंडर्स से जुड़े मामलों में इस एडीजी का सीधा और बेरोकटोक हस्तक्षेप डीजी की गंभीर प्रशासनिक कमजोरी को उजागर करता है, क्योंकि डीजी स्वयं नॉन-टेक्निकल (#IRTS) कैडर से आते हैं। आरडीएसओ का प्रत्येक पीईडी इस अवांछित कार्यशैली से बेहद असंतुष्ट और क्षुब्ध है, लेकिन डीजी पूरी तरह सम्मोहित दिखाई देते हैं।
यह प्रश्न भी व्यवस्था पर गहरा तमाचा है कि आखिर किस नियम के तहत इस एडीजी ने IRITM में अपने सरकारी आवास को अब तक अवैध रूप से रोक रखा है? विजिलेंस मामलों में तीन-तीन बार चार्जशीट होने के बावजूद ‘ठेके वाले सीआरबी’ को इस दागी अधिकारी में ऐसी क्या विशेषता दिखाई दी कि उसे आरडीएसओ जैसी अति-संवेदनशील जगह पर महत्वपूर्ण कुर्सी सौंप दी गई? अंदरूनी गलियारों में यह स्पष्ट माना जा रहा है कि रेलवे बोर्ड का शीर्ष नेतृत्व (CRB, MI, MTRS) जानबूझकर यही चाहता, और लगातार इसी प्रयास में लगा रहता है, कि तकनीकी रूप से आरडीएसओ इतना लाचार और कमजोर बना रहे कि बोर्ड बिना किसी तकनीकी चुनौती या प्रतिरोध के अपनी मनमानी चलाता रहे। बोर्ड की ये सेल्फ-सेंटर्ड मानसिकता पता नहीं भारतीय रेल अब और कितने गहरे गर्त में ले जाएगी!

