आग से खिलवाड़: रेल भवन की चहेती पोस्टिंग व्यवस्था कैसे बन रही है हादसों की वजह
हाल ही में पुरी और बंडामुंडा में सामने आई खतरनाक घटनाओं में बालासोर जैसे भीषण हादसे की पूरी आशंका मौजूद थी। अगर कोई बड़ी तबाही नहीं हुई, तो इसका श्रेय किसी बेहतरीन रखरखाव या सुरक्षा मानकों के कड़े अनुपालन को नहीं, बल्कि मात्र भाग्य को दिया जा सकता है।
ये कोई छिटपुट या सामान्य तकनीकी गड़बड़ियाँ नहीं हैं। यह सीधे तौर पर शीर्ष स्तर पर सड़ चुकी प्रशासनिक व्यवस्था का दुष्परिणाम है—एक ऐसी पोस्टिंग और ट्रांसफर नीति जो भारतीय रेल की तकनीकी आवश्यकताओं के बजाय अफसरों की निजी सुविधाओं और सत्ता के गलियारों में उनकी नजदीकी साधने के लिए चलाई जा रही है।
मामूली गड़बड़ियाँ नहीं, बड़े हादसों के टलने का सिलसिला
इन दोनों क्षेत्रों में दर्ज विफलताओं की गंभीरता पर गौर करें:
- ओवरहेड इक्विपमेंट (OHE) तार पिघलकर दौड़ती ट्रेनों और रेल पटरियों पर आ गिरे।
- यात्री और मालगाड़ी—दोनों सेवाओं में ट्रेन पार्टिंग (डिब्बों का अलग होना) की घटनाएं हुईं।
- डिब्बों और वैगनों में भीषण ब्रेक बाइंडिंग की वजह से पहिए जाम हो गए और ब्रेक पैड्स में आग लग गई।
- प्राइमरी स्प्रिंग टूटने, फायर एंड स्मोक डिटेक्शन सिस्टम (FSDS) के फेल होने और पहियों में लगातार गड़बड़ियाँ आने के मामले सामने आए।
इनमें से हर एक गड़बड़ी तेज गति में गाड़ी के पटरी से उतरने या उसमें आग लगने का कारण बन सकती है। यह सामान्य शिकायतों की सूची नहीं, बल्कि बाल-बाल बचे बड़े हादसों का कच्चा चिट्ठा है। सुरक्षा का दायरा इतना सिमट चुका है कि अब सब कुछ केवल भाग्य के भरोसे चल रहा है।
रेल भवन की विफलता: दो दशकों की घोर निष्क्रियता
जब रेलमंत्री को रेलवे बोर्ड को दरकिनार कर 3 सितंबर को जनरल मैनेजरों (GMs) और डिवीजन स्तर पर डिवीजनल रेलवे मैनेजरों (#DRMs) की सीधी क्लास लेनी पड़े, तो यह साफ स्वीकारोक्ति है कि शीर्ष प्रबंधन पूरी तरह विफल हो चुका है। जिस बोर्ड को बाईपास करना पड़ जाए, वह अपनी प्रशासनिक प्रासंगिकता पहले ही खो चुका है।
मंत्री जी की इस समीक्षा बैठक का मुख्य मुद्दा बंडामुंडा और पुरी में सिग्नल इंटरलॉकिंग से जुड़ी विफलताएं थीं। विडंबना यह है कि इस विषय पर आरडीएसओ (#RDSO) की अनुशंसाओं के आधार पर रेलवे बोर्ड के स्पष्ट दिशा-निर्देश 2006 में ही जारी हो चुके थे, जो जून 2005 में हुए रेल हादसों की जांच से निकले थे।
आज बीस साल बीत चुके हैं। पिछले दस वर्षों से बजट, पूंजीगत व्यय या आधुनिक तकनीक की कोई कमी नहीं रही है। फिर भी, दो दशक बाद भी प्रशासन 2006 के बुनियादी इंटरलॉकिंग सुरक्षा मानकों को धरातल पर लागू करने के लिए जूझ रहा है। यदि बीस साल और रिकॉर्ड बजट के बावजूद बुनियादी दिशा-निर्देश अमल में नहीं लाए जा सके, तो यह विफलता वित्तीय नहीं, बल्कि पूरी तरह संस्थागत है।
दिल्ली का मोह: चाटुकारिता को योग्यता समझने की भूल
इस सड़ांध की शुरुआत उस संस्कृति से होती है जहां दिल्ली में बने रहने को ही अफसरों की योग्यता मान लिया जाता है।
रेलवे बोर्ड के हर एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (ED) और प्रिंसिपल एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर से यह कड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए:
उन्होंने अपने करियर के कितने साल रेल भवन और दिल्ली के दायरे में बिताए हैं? दिल्ली में कुर्सी तोड़ना ओएचई, कैरिज एंड वैगन (C&W) या व्हील डायनेमिक्स की विशेषज्ञता की गारंटी नहीं देता; यह मात्र सत्ता के गलियारों में टिके रहने की कला को दर्शाता है।
अब एक तय ढ़र्रा बन चुका है: किसी तरह सेवा के आखिरी साल दिल्ली में गुजारे जाएं। डीआरएम सीधे रेल भवन से भेजे जाते हैं और कार्यकाल समाप्त होते ही वापस रेल भवन की गोद में लौट आते हैं। रेलवे बोर्ड, आरडीएसओ और प्रोडक्शन यूनिट्स जैसी जगहों पर—जहां गहन तकनीकी ज्ञान और विशेषज्ञता अनिवार्य होनी चाहिए—वहां केवल नियमों की कागजी जानकारी को ही पर्याप्त समझ लिया जाता है। विषय ज्ञान को पूरी तरह किनारे कर दिया गया है।
गंभीर प्रश्न तब भी उठते हैं जब नीतिगत और संवेदनशील पोस्टिंग के फैसले ऐसे शीर्ष अधिकारी लेते हैं जो अपनी सेवानिवृत्ति की कगार पर हों—जैसे 31 अक्टूबर को रिटायर होने वाले मेंबर (ट्रैक्शन एंड रोलिंग स्टॉक) द्वारा विदाई के समय पोस्टिंग तय करना। जब फैसले लेने वाले स्वयं कुछ ही हफ्तों में पद छोड़ रहे हों, तो जमीनी जवाबदेही किसकी तय होगी?
आरडीएसओ की रीढ़ तोड़ना और घरेलू तकनीक का गला घोंटना
यह समझौतावादी व्यवस्था केवल पटरियों की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं कर रही, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता का भी गला घोंट रही है।
आरडीएसओ और रेलवे बोर्ड की महत्वपूर्ण कुर्सियां अक्सर मेरिट के बजाय व्यक्तिगत उपकार और ‘उपहार’ के तौर पर बांटी जाती हैं। जब आरडीएसओ के तकनीकी जांच पदों पर अयोग्य या गैर-जानकार अफसरों को बैठाया जाता है, तो इसका सबसे भारी नुकसान एमएसएमई (MSMEs) और भारतीय तकनीकी कंपनियों को उठाना पड़ता है:
- महत्वपूर्ण सुरक्षा और तकनीकी मंजूरियां अकारण लटक जाती हैं।
- बिना किसी इंजीनियरिंग आधार के तकनीकी स्पेसिफिकेशन्स में मनमाना बदलाव किया जाता है।
- सिद्ध और प्रमाणित उत्पाद बनाने वाली घरेलू कंपनियां सालों-साल मंजूरी के लिए भटकती रहती हैं, जबकि चहेते अफसर उस पद पर लंबे समय तक बैठकर काम की बुनियादी बातें सीखने के नाम पर टाइम पास करते हैं।
जिम्मेदारी का फैसला
ये नियुक्तियां किसी अदृश्य व्यवस्था या काडर सिस्टम की देन नहीं हैं। अधिकारियों को चुनने और मलाईदार पदों पर बनाए रखने का अधिकार सीधे तौर पर दो शीर्ष पदों के पास है: रेल मंत्री और चेयरमैन, रेलवे बोर्ड। जब फैसला इन दो का है, तो उसका नतीजा और जिम्मेदारी भी इन्हीं दो की है।
राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को आज एक तीखे सवाल का सामना करना होगा: क्या इन अफसरों की तैनाती देश और रेल यात्रियों की सुरक्षा के लिए की जा रही है, या फिर चंद चहेतों की सेवा के लिए पूरे देश की रेल व्यवस्था को दांव पर लगाया जा रहा है?
संवेदनशील तकनीकी और प्रशासनिक पदों की हर पोस्टिंग फाइल में दो बातें स्पष्ट तौर पर दर्ज होनी चाहिए:
- संबंधित पद के लिए अधिकारी की वस्तुनिष्ठ तकनीकी योग्यता क्या है?
- योग्य समकक्षों को छोड़कर इसी विशिष्ट अधिकारी को चुने जाने का लिखित कारण क्या है?
यदि तबादले और नियुक्तियां तकनीकी योग्यता के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं, अफसरशाही की गुटबाजी और दिल्ली की सुख-सुविधाओं के आधार पर ही होती रहीं, तो रेलमंत्री की आपातकालीन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगी। यदि इस सड़ांध को तुरंत नहीं रोका गया, तो 2036 और 2046 में भी रेलवे का शीर्ष नेतृत्व ऐसी ही वीसी (VC) कर रहा होगा—उन्हीं पुरानी गड़बड़ियों पर माथा पीटता हुआ, और ईश्वर से यह प्रार्थना करता हुआ कि कृपया इस बार भाग्य धोखा न दे।

