संरक्षा पर भारी पड़ता ‘भाईचारा’: धनबाद मंडल में सुरक्षा से खिलवाड़ और रेल प्रशासन की रहस्यमयी खामोशी
भारतीय रेल में यात्रियों की सुरक्षा को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता इन दावों के बिल्कुल उलट और बेहद खतरनाक परिदृश्य प्रस्तुत करती है। पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) के धनबाद मंडल में हाल ही में घटी घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि जब सार्वजनिक सुरक्षा पर प्रशासनिक ‘भाईचारा’, जातिगत समीकरण और पक्षपात हावी हो जाते हैं, तो किस तरह यात्रियों के जान-माल को जोखिम में डाल दिया जाता है। संरक्षा के प्रति बरती जा रही यह आपराधिक लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अपनों को बचाने का खेल—रेल सुरक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ताजा मामला धनबाद मंडल के गोमो स्टेशन के पास का है, जहां 29 जुलाई 2026 को ट्रेन संख्या 12988 अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस ट्रैक पर पड़े रेलवे स्लीपर से टकरा गई। इतनी बड़ी लापरवाही ऐसे समय में सैकड़ों यात्रियों की जान ले सकती थी, क्योंकि यह एक बहुत बड़ा ‘सेफ्टी ब्रीच’ था। लेकिन इस गंभीर हादसे के बाद जो हुआ, वह और भी अधिक चौंकाने वाला है। रेल प्रशासन ने जांच कराने और कड़े कदम उठाने के बजाय पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया। घटना को दबाने के लिए जिस तरह प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हुआ, उससे यह साफ हो दिया कि विभागीय जिम्मेदारी तय करने के बजाय अपने चहेतों और ‘बिरादरीगत समीकरणों’ को बचाना अधिकारियों की पहली प्राथमिकता बन चुका है।
धनबाद मंडल में संरक्षा के साथ खिलवाड़ का यह कोई पहला या इकलौता मामला नहीं है। अभी महज एक सप्ताह पहले ही पहाड़पुर में देश की प्रीमियम ट्रेन राजधानी एक्सप्रेस एक मोटरसाइकिल से टकरा गई थी। मामला चेयरमैन/रेलवे बोर्ड (सीआरबी) के तक पहुंचा, लेकिन वहां भी जांच और सख्त कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती देखने को मिली। सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक के बावजूद आरोपियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के बजाय ‘भाईचारे’ और आपसी संबंधों की आड़ में मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्रशासन के इस दोहरे रवैये की पोल तब और खुल जाती है जब इसकी तुलना पूर्व में हुई ऐसी ही घटनाओं से की जाती है। कुछ महीने पहले दानापुर मंडल में जब एक प्रशासनिक चूक सामने आई थी, तब आनन-फानन में सेक्शनल सीनियर डीईएन-3 को दोषी ठहराते हुए उनका असमय तबादला बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (#BLW), वाराणसी कर दिया गया था। एक जगह नियमों का चाबुक तुरंत चला दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ धनबाद मंडल में बार-बार हो रही जानलेवा लापरवाहियों पर वरिष्ठ अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। यह दोहरा मानदंड स्पष्ट दर्शाता है कि रेलवे में जवाबदेही अब नियम-पुस्तिका से नहीं, बल्कि प्रशासनिक कृपा, बैकवर्ड-फॉरवर्ड समीकरण और निजी संबंधों से तय हो रही है।
रेलवे जैसे संवेदनशील और जन-सुरक्षा से जुड़े विभाग में पक्षपात और लापरवाही की यह संस्कृति अत्यंत घातक है। जब सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर निजी निष्ठा और आपसी संबंधों को वरीयता दी जाती है, तब व्यवस्था से आम रेल यात्री का भरोसा टूटता है। रेलवे बोर्ड को इस प्रशासनिक शिथिलता और पक्षपात का तत्काल कड़ा संज्ञान लेना चाहिए। संरक्षा से समझौता करने वाले चाहे कितने ही प्रभावशाली, उच्च पदस्थ या ‘पहुंच वाले’ क्यों न हों, उनके खिलाफ बिना किसी रियायत के कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश दिया जा सके कि यात्रियों की जान से बढ़कर कोई ‘भाईचारा’ नहीं हो सकता।

