सेंट्रल रेलवे: गार्डों का बेल विरोध—मोटा वेतन, लेकिन जनहित और जवाबदेही शून्य! भाग-1
कैसे मुंबई के सबसे अधिक वेतन पाने वाले रेलकर्मी एक घंटी के लिए शहर को बंधक बनाते हैं और प्रशासन को ब्लैकमेल करते हैं?
हेली मोमैया केवल उन्नीस वर्ष की थीं। 6 नवंबर 2025 को, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (#CSMT) और सैंडहर्स्ट रोड के बीच, पटरी पर चलते समय सेंट्रल रेलवे की एक लोकल ट्रेन की चपेट में आने से उनकी मौत हो गई। उन्होंने पटरियों पर चलना खुद नहीं चुना था। उस शाम मेन लाइन की दर्जनों अन्य ट्रेनों की तरह उनकी ट्रेन भी बीच रास्ते में ही रुक गई थी, क्योंकि CSMT में एक यूनियन ने शाम करीब 4.30 बजे मोटरमैन लॉबी के गेट बंद करके उसके सामने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया था जिसके चलते मोटरमैन वहां से निकलकर अपनी गाड़ी तक नहीं पहुंच सके थे।
जून में हुए मुंब्रा हादसे—जिसमें पटरी के नए बदले गए हिस्से की ठीक से वेल्डिंग न होने और रेल लाइन के असमान संरेखण के कारण पांच यात्रियों की मौत हो गई थी—के मामले में मध्य रेलवे के दो इंजीनियरों के खिलाफ दर्ज एफआईआर के विरोध में सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ (#CRMS) द्वारा अचानक हड़ताल (फ्लैश स्ट्राइक) बुलाई गई थी।
हेली—जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं था—ने इसकी पूरी कीमत अपनी जान देकर चुकाई। उनके बगल में एक अज्ञात व्यक्ति की भी मौत हो गई। तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए — याफिसा चोगले (62), खुशबू मोमैया (45) और कैफ चोगले (22)। शाम 5.52 बजे रवाना होने वाली कल्याण लोकल आखिरकार शाम 6.40 बजे CSMT से निकल सकी। तब तक जे जे अस्पताल के मुर्दाघर में शव पहुंच चुके थे।
छह महीने बाद: वही लाइन, वही यूनियन और एक छोटा सा बहाना
छह महीने बाद, वही यूनियन, उसी लाइन पर फिर से अड़ गई है। इस बार उकसावे की वजह इतनी छोटी है कि इस वाक्य को लिखते समय भी झिझक होती है। 7 मई 2026 को, सेंट्रल रेलवे मुख्यालय ने सुरक्षा परिपत्र संख्या 15 (Safety Circular No. 15) जारी किया। यह सहायक नियम 4.51-1(B)(1) को अपडेट करता है और ट्रेन मैनेजरों — जिन्हें हममें से अधिकांश लोग अभी भी गार्ड ही कहते हैं और वे वास्तव में गार्ड ही हैं, मैनेजर नहीं) — और मोटरमैनों के बीच बेल-कोड (घंटी कोड) प्रक्रिया में ‘नोट 4’ जोड़ता है। निर्देश इस प्रकार है:
“ट्रेन के निर्धारित ठहराव (स्टॉप) पर पहुंचने से पहले, पीछे के केबिन में समय सारणी (टाइमटेबल) सामने रखकर बैठा गार्ड—मोटरमैन को एक बार घंटी बजाएगा। यदि ट्रेन अभी भी साफ-सुथरे तरीके से रुकने के लिए बहुत तेज चल रही है, तो गार्ड खुद ब्रेक लगाएगा।”

लगभग 4,000 यात्रियों को ले जाने वाली 12-कोच की लोकल ट्रेन वहीं रुके जहां उसे निर्धारित रूप से रुकना चाहिए, यह सुनिश्चित करने के लिए दो जोड़ी आंखें और दो जोड़ी हाथ का यह सुधार इसलिए लागू किया गया, क्योंकि 17 मार्च को कल्याण जाने वाली एक एसी लोकल भांडुप प्लेटफॉर्म से दो डिब्बे आगे निकल गई थी। विक्रोली में भी ऐसा ही ओवरशूट हुआ था। वेस्टर्न रेलवे के गार्ड पहले से ही इसके जैसा ही कुछ करते हैं। इसमें कुछ भी अनोखा सा विशेष रूप से कठिन नहीं है।
इसके जवाब में CSMT पर गार्डों द्वारा ‘नियमानुसार काम’ (वर्क-टू-रूल) आंदोलन शुरू कर दिया गया। 13 मई की शाम के व्यस्त समय (पीक आवर्स) में सेवाएं ठप हो गईं। शाम 5.15 से 5.45 के बीच तीन लोकल ट्रेनें रद्द कर दी गईं। सेंट्रल रेलवे प्रशासन ने उसी शाम यह कहकर घुटने टेक दिए: “परिपत्र (सर्कुलर) को स्थगित कर दिया गया है।”
तत्पश्चात यूनियन ने 18 मई की बैठक तक आंदोलन को स्थगित कर दिया, और चेतावनी दी है कि यदि परिपत्र वापस नहीं लिया गया तो वे यह आंदोलन फिर से शुरू करेंगे। लोकल ट्रेनों के बार-बार प्लेटफॉर्म से आगे निकलकर रुकने की घटनाओं को रोकने के लिए जारी किया गया एक सुरक्षा (#Safety) आदेश केवल इसलिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, क्योंकि इसे लागू करने वाले कर्मचारियों को एक घंटी बजाना अपनी शान के खिलाफ लगा।
टैक्सपेयर्स के पैसों पर पलने वाला सबसे अकरमी कैडर
यहाँ चौंकाने वाली विसंगति को समझने के लिए, यात्रियों — नागरिकों और करदाताओं — को यह जानने की नितांत आवश्यकता है कि उनके साथ ऐसा व्यवहार कौन कर रहा है, और किन शर्तों पर कर रहा है?
भारतीय रेल का रनिंग स्टाफ केंद्र सरकार के सबसे उदार वेतन और भत्ते के ढ़ांचों में से एक के तहत काम करता है। 1981 के नियमों का एक सेट, जिसे हर अगले वेतन आयोग द्वारा दोहराया गया है, उनके मूल वेतन के 30% हिस्से को ‘रनिंग अलाउंस में पे एलिमेंट’ के रूप में नामित करता है।
- वह 30% हिस्सा महंगाई भत्ते (#DA), मकान किराया भत्ते (#HRA), छुट्टी के वेतन, बच्चों की शिक्षा सहायता, पास पात्रता और किसी गैर-रनिंग (स्टेशनरी) पद पर ट्रांसफर होने की स्थिति में वेतन निर्धारण के लिए मूल वेतन से ऊपर और अलग माना जाता है।
- पेंशन और सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी के लिए, यह गणना बढ़कर 55% हो जाती है।
- जब प्राकृतिक आपदाओं या कोयले की कमी के कारण ट्रेनें रुक जाती हैं, तब भी यह 30% मिलता रहता है।
- जब रनिंग ड्यूटी से हटा दिया जाता है, तब भी यह 30% बना रहता है।
इन सबके ऊपर आता है किलोमीटर भत्ता (Kilometreage Allowance) — प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलने वाला भुगतान—न्यूनतम 120 किलोमीटर। नाइट-ड्यूटी भत्ते और ओवरटाइम के साथ मिलकर यह भत्ता मुंबई के एक वरिष्ठ रनिंग स्टाफ की कुल मासिक कमाई को आसानी से डेढ़ लाख से दो लाख रुपये के पार पहुंचा देता है। इस वजह से वे अक्सर अपने ऊपर के ब्रांच अफसरों (आईआरटीएस/आईआरएसईई अधिकारियों) से भी अधिक कमा रहे होते हैं। इसका एक-एक पैसा करदाताओं द्वारा वित्तपोषित है — जिसमें हेली मोमैया के माता-पिता द्वारा दिया गया टैक्स भी शामिल है।
बेबस मुंबईकर और अनुत्तरित प्रश्न
इस सिद्धांत से कोई विवाद नहीं है कि मुंबई के उपनगरीय रेल नेटवर्क (लोकल सिस्टम) में ट्रेन चलाना एक कठिन काम है। यह वाकई कठिन है। हालांकि, समस्या उस राजनीति से है, जो लगातार और अधिक की मांग करती है, परंतु जवाबदेही से इनकार करती है, और एक लिखित आदेश द्वारा केवल एक घंटी बजाने के लिए कहे जाने पर काम ठप कर देती है।
यूनियनें जानती हैं कि मुंबई के 80 लाख से अधिक दैनिक लोकल यात्री पलटवार नहीं कर सकते।
- उस महिला के लिए कोई उपभोक्ता फोरम नहीं है जिसे डायलिसिस के लिए सायन अस्पताल पहुंचने के लिए कुर्ला से 6.42 की ट्रेन पकड़नी होती है।
- उस दैनिक वेतनभोगी मजदूर के लिए कोई मुआवजा नहीं है जिसकी गुरुवार की कमाई कल्याण लाइन ठप होने पर गायब हो जाती है।
हालांकि, नवंबर की वो खौफनाक यादें अभी भी हर उपनगरीय यात्री के मन में ताजा हैं। उस शाम अपनी बेटी की शादी के कार्ड लेकर भायखला जा रही मंगला झिंगाड़े नाम की महिला ने यात्रियों को पटरियों पर कूदते देखा था, क्योंकि उनकी फंसी हुई ट्रेन से बाहर निकलने का कोई और उपाय नहीं था। उन्होंने एक रिपोर्टर के सामने पूछा था कि अगर किसी को चोट लगी या जान चली गई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? छह महीने बाद, दो लोगों को दफनाया जा चुका है, पर उनका प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। और हम फिर से उसी शाम की भीड़भाड़ वाले समय में, उसी लाइन पर, उसी अंजाम को चुनौती दे रहे हैं — इस बार केवल एक घंटी के लिए!
काम के बोझ (वर्कलोड) को लेकर अपनी बात साबित करने के लिए लाखों उपनगरीय यात्रियों की जान जोखिम में डालने और रेल प्रशासन को ब्लैकमेल करने का एक बहाना है, खासकर तब जब वह तर्क पिछली सर्दियों में दो लोगों की जान लेने वाले लगभग इसी तरह के विरोध प्रदर्शन द्वारा पहले ही गलत साबित हो चुका हो, और जब सुरक्षा के लिए मांगा गया काम हर स्टॉप पर केवल एक बार घंटी बजाना हो!
यह आंदोलन नहीं, आपराधिक लापरवाही है!
इसे ‘आंदोलन’ नहीं कहा जा सकता, न ही ‘असंतोष’ या ‘औद्योगिक कार्रवाई’। यह श्रम उग्रवाद (लेबर मिलिटेंसी) के चोले में छिपी भीषण अपराधिक लापरवाही (criminal recklessness) है। इसे भारतीय रेल के सबसे लाड़ले मगर अकरमी और विशेषाधिकार प्राप्त रनिंग कैडर द्वारा उस शहर की संपूर्ण परिवहन प्रणाली ठप कर देने की कीमत पर अंजाम दिया जा रहा है, जो उनका वेतन, उनका तीस प्रतिशत पे एलिमेंट, उनका किलोमीटर भत्ता और उनकी पेंशन चुकाता है।
अफसोस की बात यह है कि इस बात को इस तरह समझाना पड़ रहा है। मुंबई को इस धरती के वंचितों या मजलूमों द्वारा नहीं, बल्कि गार्ड जैसे पेट भरे और संपन्न लोगों द्वारा बंधक बनाया जा रहा है। इससे पहले कि अगली घंटी अनसुनी रह जाए, अगला प्लेटफॉर्म ओवरशूट हो जाए, और जे जे अस्पताल के बोर्ड पर नामों की अगली सूची आ जाए, किसी न किसी को तो यह सच खुलकर कहना ही होगा। क्रमशः…

