भारतीय रेल में बार-बार सुलगते कोच: पैसेंजर सेफ्टी पर बड़ा संकट या मेंटेनेंस में घोर लापरवाही?

दो गंभीर हादसों के संदर्भ और पूर्व मैकेनिकल एक्सपर्ट शुभ्रांशु के तकनीकी विश्लेषण पर आधारित एक विशेष आलोचनात्मक रिपोर्ट

भारतीय रेल में पिछले कुछ दिनों के भीतर कोचों में आग लगने की बैक-टू-बैक घटनाओं ने यात्रियों की सुरक्षा और संरक्षा (#Safety & #Security) पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। केवल 48 घंटों के भीतर दो बड़ी प्रीमियम और स्पेशल ट्रेनों के एसी (AC) कोचों में आग लगने की घटनाओं ने रेलवे के मेंटेनेंस प्रोटोकॉल और जमीनी सुरक्षा मानकों की पोल रख दी है। यदि समय रहते रेल चालकों, गार्ड और सुरक्षा बलों द्वारा त्वरित कार्रवाई न की जाती, तो यह घटनाएं सैकड़ों निर्दोष यात्रियों के लिए काल बन सकती थीं। लाखों रेल यात्रियों की जान-माल से जुड़ी इस गंभीर समस्या पर गहरी तकनीकी और प्रशासनिक जवाबदेही तय करना अब अनिवार्य हो गया है।

एक वरिष्ठ रिटायर्ड आईआरटीएस अधिकारी सी.बी.के. सिंह ने तिरुवनंतपुरम राजधानी एक्सप्रेस में आग की घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा, “CSO/NR के तौर पर मेरे कार्यकाल के दौरान, अमृतसर गरीब रथ के एक एसी कोच में इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट के कारण से आग लग गई थी, जिसकी पुष्टि जाँच समिति ने स्पष्ट रूप से की थी। फिर भी, बोर्ड (तत्कालीन मेंबर इलेक्ट्रिकल) ने इन निष्कर्षों से सहमति नहीं जताई और इसका सारा दोष ‘ट्रैफिक’ पर मढ़ दिया कि उन्होंने यात्रियों को धूम्रपान करने से नहीं रोका!” यह विभागवाद (डिपार्टमेंटलिज्म) रेलवे में आज भी लगातार जारी है!

Advertisements

Fire engulfs Tatanagar-Ernakulam Express coaches in Andhra Pradesh; one deadFive months after the incident, responsibility is yet to be fixed after CRS Inquiry. No wonder… history keeps repeating.

दोनों घटनाओं का विवरण और तुलनात्मक विश्लेषण

अगर हाल ही में हुई कोचों में आग लगने की दोनों गंभीर घटनाओं का गहराई से विश्लेषण करें, तो रेलवे के सेफ्टी नेट में कई बड़े लूपहोल्स नजर आते हैं। पहली घटना 17 मई 2026 को प्रातः 05:15 बजे की है, जब गाड़ी संख्या 12431 तिरुवनंतपुरम–निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस नागदा–कोटा रेल खंड से गुजर रही थी। लुनी रिच्छा और विक्रमगढ़ आलोट के मध्य किलोमीटर 729/02 पर डाउन दिशा में इसके थ्री-टियर एसी कोच बी-1 और उससे संलग्न एसएलआर (SLR) में अचानक भीषण आग लग गई। इस प्रभावित बी-1 कोच में कुल 68 यात्री सवार थे, जिन्हें रेल कर्मियों की सतर्कता की वजह से 15 मिनट के भीतर सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई। रेल प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रभावित कोच को मुख्य रेक से काटकर अलग किया, ओएचई (OHE) की बिजली आपूर्ति बंद की और बाद में कोटा स्टेशन पर एक अतिरिक्त कोच जोड़कर यात्रियों को आगे के सफर पर भेजा।

ठीक इसी तरह की एक और डरावनी घटना इससे दो दिन पहले, यानि 15 मई 2026 को हैदराबाद (नामपल्ली) रेलवे स्टेशन पर सामने आई। यहाँ हैदराबाद से जयपुर जाने वाली स्पेशल ट्रेन (गाड़ी संख्या 07020) के रवाना होने से ठीक कुछ मिनट पहले उसके दो थ्री-टियर एसी कोचों—बी-1 और बी-2—में अचानक आग भड़क उठी। चूंकि ट्रेन प्लेटफॉर्म पर ही खड़ी थी और प्रस्थान में थोड़ा समय शेष था, इसलिए समय रहते दोनों कोचों को पूरी तरह खाली करा लिया गया और कोई यात्री हताहत नहीं हुआ। इस हादसे के दौरान स्टेशन पर तुरंत 3 दमकल गाड़ियां बुलानी पड़ीं, जिनकी मदद से कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया और एक बहुत बड़ा हादसा होने से टल गया।

कोचों में आग लगने के मुख्य तकनीकी कारण

सेवानिवृत्त वरिष्ठ मैकेनिकल अधिकारी और रेलवे के विशेषज्ञ शुभ्रांशु (पूर्व पीसीएमई, आईसीएफ) ने अपने तकनीकी साक्षात्कारों और विश्लेषणों में भारतीय रेल के कोचों (विशेष रूप से एलएचबी और एसी कोचों) में आग लगने के जिन बुनियादी और छिपे हुए (अदृश्य) कारणों का उल्लेख किया है, वे इस प्रकार हैं:

  • शॉर्ट सर्किट और इलेक्ट्रिकल ओवरलोडिंग (Short Circuit & Wiring Faults): आधुनिक एलएचबी (LHB) कोचों में वायरिंग, जंक्शन बॉक्स और इलेक्ट्रिकल पैनल बेहद जटिल होते हैं। छतों पर लगे एसी यूनिट (RMPU) और अंडर-स्लंग उपकरणों के बीच होने वाले ढ़ीले कनेक्शन (loose connections) के कारण लगातार स्पार्किंग होती है। इसके अलावा, यात्रियों द्वारा मोबाइल, पावर बैंक और अन्य भारी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को चार्ज करने से कोच के सर्किट पर लोड अचानक अनियंत्रित हो जाता है, जो अंततः कैटास्ट्रॉफिक शॉर्ट सर्किट का कारण बनता है।
  • ब्रेक बाइंडिंग और अंडर-गियर घर्षण (Brake Binding & Friction): कई मामलों में ब्रेक शू पहियों से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते, जिसे तकनीकी भाषा में ‘ब्रेक बाइंडिंग’ कहा जाता है। तेज गति में इसके कारण पहियों में अत्यधिक घर्षण और भयानक गर्मी (overheating) पैदा होती है। यदि बोगी के निचले हिस्से (under-gear) में तेल, ग्रीस या सूखा कचरा जमा हो, तो वह इस गर्मी से तुरंत आग पकड़ लेता है और देखते ही देखते लपटें कोच के फर्श को चीरती हुई ऊपर तक आ जाती हैं।
  • घटिया दर्जे की आंतरिक सामग्री (Sub-standard Furnishing Materials): रेलवे के कड़े नियमों के अनुसार कोचों के भीतर उपयोग होने वाले गद्दे, पर्दे, कुशन कवर्स और फर्श की मैटिंग को ‘फायर-रिटार्डेंट’ (आग प्रतिरोधी) और ‘लो-स्मोक’ श्रेणी का होना चाहिए। परंतु वेंडर्स और अधिकारियों के कथित गठजोड़ के कारण कई बार सब-स्टैंडर्ड सामग्री की आपूर्ति की जाती है। यह सामग्री आग लगते ही भयंकर रूप से सुलगती है और जहरीली गैसें छोड़ती है, जिससे यात्रियों की मौत आग से कम और दम घुटने (asphyxiation) से पहले हो जाती है।
  • स्वचालित सुरक्षा प्रणालियों (Fire & Smoke Detection) की विफलता: नए कोचों में स्मोक डिटेक्शन और दमन प्रणालियाँ (suppression systems) लगाई जाती हैं, जो शुरुआती धुएं को पकड़कर स्वतः ब्रेक लगा देती हैं या अलार्म बजाती हैं। यदि मेंटेनेंस डिपो में इन सेंसर्स की नियमित जांच नहीं हो रही है या उन्हें बाईपास कर दिया गया है, तो आग शुरुआती स्तर पर नहीं पकड़ी जाती और भीषण रूप ले लेती है।

क्या यह मेंटेनेंस की विफलता है या प्रशासनिक लापरवाही?

इन दोनों घटनाओं के पैटर्न को देखने से स्पष्ट है कि लापरवाही केवल आकस्मिक नहीं बल्कि प्रणालीगत (systemic) है:

  1. पिट-लाइन और स्टेशन मेंटेनेंस में कोताही: हैदराबाद स्टेशन पर ट्रेन के चलने से ठीक कुछ मिनट पहले आग लगना यह साबित करता है कि स्टेशन पर ट्रेन को प्लेस करने से पहले उसकी प्राथमिक या द्वितीयक (Primary/Secondary) इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल जांच सही ढ़ंग से नहीं की गई थी। मेंटेनेंस स्टाफ द्वारा ‘क्विक टर्नअराउंड’ के चक्कर में गंभीर खामियों को अनदेखा किया जा रहा है।
  2. जवाबदेही का अभाव: रोलिंग स्टॉक और कोचिंग डिपो के प्रभारी अधिकारियों द्वारा जमीनी स्तर पर गहन सुरक्षा ऑडिट को केवल कागजी कार्यवाही बनाकर कागजों तक ही सीमित रखा जा रहा है। अधिकारियों के रोटेशन और पारदर्शिता नीतियों में शिथिलता के कारण ग्राउंड स्टाफ की कार्यशैली में जवाबदेही की कमी देखी जा रही है।

निष्कर्ष एवं सुधारात्मक सुझाव

भारतीय रेल को यदि ‘शून्य दुर्घटना’ (Zero Accident) के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो खोखले दावों से हटकर निम्नलिखित पुख्ता कदम उठाने होंगे:

  • तत्काल फायर सुरक्षा ऑडिट: भारतीय रेल के सभी चालू एसी कोचों और इलेक्ट्रिकल पैनलों का युद्धस्तर पर एक विशेष ‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ किया जाए।
  • सामग्री की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच: कोचों के भीतर उपयोग होने वाले पर्दे और सीट कुशन की गुणवत्ता की जांच स्वतंत्र लैब से कराई जाए, ताकि अनुपयुक्त (सब-स्टैंडर्ड) सामग्री का खेल बंद हो सके।
  • कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई: किसी भी मेंटेनेंस डिपो में लापरवाही पाए जाने पर केवल छोटे कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि संबंधित सीनियर कोचिंग डिपो अधिकारियों (CDO) और मैकेनिकल इंजीनियरों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

यह देश के करोड़ों रेल यात्रियों की सुरक्षा का संवेदनशील प्रश्न है। किसी बड़ी त्रासदी और सैकड़ों निर्दोष मौतें होने की प्रतीक्षा करने के बजाय, रेल प्रशासन को अपनी मेंटेनेंस व्यवस्था में व्याप्त इस प्रशासनिक ‘शॉर्ट सर्किट’ को तुरंत दुरुस्त करना होगा।