सेंट्रल रेलवे: गार्डों का बेल विरोध—मोटा वेतन, लेकिन जनहित और जवाबदेही शून्य! भाग-3

अत्यधिक वेतन पाने वालों का विद्रोह: क्या मुंबई की जीवनरेखा गार्ड-स्तर के विशेषाधिकार बोध के कारण दम तोड़ रही है?

मुंबई के उपनगरीय (लोकल) गार्डों द्वारा हाल ही में किया गया “वर्क टू रूल” (नियमानुसार काम) आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है—यह शक्ति का एक सुनियोजित प्रदर्शन है, जो कि रोटेशन के अभाव में रेल प्रशासन में लंबे समय से एक ही जगह बैठे अधिकारियों की कमजोर नस को दबाता है। जहां एक तरफ सेंट्रल रेलवे के 40 लाख से अधिक यात्री अपनी रोजी-रोटी के लिए समय की पाबंदी और सुरक्षा पर निर्भर हैं, वहीं दूसरी तरफ कार्यकारी-स्तर (एग्जीक्यूटिव लेवल) का वेतन पाने वाला एक ऑपरेटिंग कैडर (गार्ड) जवाबदेही से बचने के लिए सुरक्षा नियमावलियों (सेफ्टी मैनुअल) को हथियार बना रहा है और वैधानिक आदेशों को मानने से इंकार कर रहा है।

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गार्ड-रहित क्रांति: गार्ड केबिन अब बीते जमाने की बात है!

पिछले दो दशकों से अधिक समय से, “गार्ड-रहित” (गार्डलेस) ट्रेन संचालन सेंट्रल रेलवे (CR) और वेस्टर्न रेलवे (WR) के लिए दक्षता का सर्वोच्च लक्ष्य रहा है। एक आधुनिक उपनगरीय रेल प्रणाली में, गार्ड — जो ऐतिहासिक रूप से ट्रेन की स्थिति पर नजर रखने (विजुअल चेक) और मैनुअल ब्रेकिंग के लिए आवश्यक थे — अब तेजी से एक अनावश्यक अवशेष बनते जा रहे हैं। अब मेट्रो की तरह ही लोकल ट्रेनों को भी गार्डलेस करने की आवश्यकता है।

  • तकनीक बनाम परंपरा: स्वचालित दरवाजे बंद होने की प्रणाली (ऑटोमैटिक डोर क्लोजर) और सीसीटीवी (CCTV) निगरानी से लैस आधुनिक ट्रेनें (जिनका वर्तमान में सेंट्रल रेलवे की नई गैर-एसी ट्रेनों पर परीक्षण चल रहा है) गार्ड की भौतिक उपस्थिति को अनावश्यक बना देती हैं। वैश्विक रेल प्रणालियों (GoA 3/4) में, “गार्ड” की जगह सेंसर और केंद्रीकृत नियंत्रण (सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल) ने ले ली है।
  • समय की बचत: घंटी के आदान-प्रदान (बेल-एक्सचेंज) की रस्म को खत्म करने और स्टेशनों पर ठहराव को सुव्यवस्थित करने से सैद्धांतिक रूप से व्यस्त समय (पीक आवर्स) के दौरान प्रति घंटे 2 से 4 अतिरिक्त ट्रेन सेवाएं चलाई जा सकती हैं। ट्रेनों के बीच के अंतराल को 3 मिनट से घटाकर 90 सेकंड करने की राह में यह “मानवीय बाधा” (ह्यूमन बॉटलनैक) वर्तमान में सबसे बड़ी रुकावट है।

यूनियनों का वीटो: 20 साल की मजबूत पकड़

गार्ड-रहित परिचालन लागू करने में विफलता कोई तकनीकी कमी नहीं है; यह एक राजनीतिक और ब्यूरोक्रेटिक इच्छाशक्ति की विफलता है। रेल प्रशासन पिछले बीसों साल से लोकल ट्रेनों की दोनों कैब में मोटरमैन रखे जाने की कोशिश कर रहा है, जिससे कि गार्डों और मोटरमैनों की अदला-बदली में लगने वाले समय को बचाकर कुछ अतिरिक्त सेवाएं चलाई जा सकें, परंतु यूनियनों की अड़ंगेबाजी के चलते प्रशासन अपनी इस योजना को मूर्त रूप नहीं दे पा रहा है, जबकि मुंबई की बढ़ती भीड़ को देखते हुए इसकी नितांत आवश्यकता है।

  • नौकरी बचाने की जिद (प्रोटेक्शनिज्म): यूनियनों ने जनता के सामने ऑटोमेशन (स्वचालन) को एक “सुरक्षा जोखिम” के रूप में पेश करने में सफलता पाई है, जबकि वास्तव में यह उनके 1981 के जमाने के वेतन और भत्ते के ढ़ांचे के लिए एक बड़ा जोखिम है।
  • विक्रोली घटना की विडंबना: हाल ही में विक्रोली में एक लोकल ट्रेन द्वारा अपना ठहराव छोड़ने (स्टेशन स्किप करने) के बाद, प्रशासन ने संशोधन पर्ची 15 (Correction Slip 15) के माध्यम से जवाबदेही लागू करने की कोशिश की। यूनियनों की प्रतिक्रिया क्या थी? एक “वर्क टू रूल” विरोध प्रदर्शन, जिसने जानबूझकर हजारों लोगों को न केवल देरी से पहुँचाया, बल्कि भारी परेशानी में डाला। प्लेटफॉर्म से आगे निकलने (ओवरशूटिंग) को रोकने के लिए बनाए गए सुरक्षा नियम का पालन करने से इनकार करके, यूनियनों ने प्रभावी रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि उनकी “सुरक्षा संबंधी चिंताएं” केवल तभी तक मान्य हैं जब तक उनमें अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता न हो।

ब्लैकमेल की अर्थव्यवस्था: मोटा वेतन, जिम्मेदारी शून्य

गार्डों के वेतन और आधुनिक रेलवे सुरक्षा में उनके योगदान के बीच की विसंगति अब मुंबईकरों के बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है।

  • मोटी सैलरी का सुरक्षा कवच: अक्सर लगभग ₹1.5 से ₹2 लाख की कुल मासिक कमाई के साथ, इन “गार्डों” को कई आईटी (IT) पेशेवरों या जूनियर आईएएस (IAS) अधिकारियों से भी अधिक वेतन दिया जाता है। फिर भी, वे तर्क देते हैं कि स्टेशन से पहले एक घंटी बजाना उनके काम के बोझ में एक “दंडात्मक” बढ़ोतरी है।
  • बंधक बनाने की रणनीति: प्रशासन का “आत्मसमर्पण” (अक्सर मात्र 15 मिनट के हंगामे के बाद रेल प्रशासन द्वारा परिपत्रों को स्थगित करना या “विचार-विमर्श” का आह्वान करना) पूरी मुंबई के ठप हो जाने के डर से पैदा होता है। यूनियनें जानती हैं कि CSMT पर केवल कुछ मिनट की देरी भी कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर सकती है। वे बातचीत नहीं कर रहे हैं; वे मुंबई की अर्थव्यवस्था को वास्तव में अपनी सुविधा और जिम्मेदारी से बचने के लिए बंधक बना रहे हैं।

इस चक्र को तोड़ना ही आगे की राह है!

यदि रेल प्रशासन को अपना प्रशासनिक वर्चस्व स्थापित करना है और अपने अधिकार को वापस पाना है, तो उसे “बातचीत” के बजाय “कड़े फैसलों” की ओर बढ़ना होगा:

  • सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई: “वर्क टू रूल” के कारण होने वाली देरी के हर एक मिनट के लिए “काम नहीं, तो वेतन नहीं” (डाइस-नॉन / Dies-Non) के सिद्धांत का उपयोग किया जाए।
  • गैर-मुख्य कार्यों का स्वचालन: सभी ट्रेनों को एसी-मानक स्वचालन (AC-standard automation) में बदलने की प्रक्रिया को तेज किया जाए। एक बार जब दरवाजे स्वचालित हो जाएंगे और सिग्नल केबिन-आधारित (कैब-बेस्ड) हो जाएंगे, तो गार्ड की भूमिका “अनिवार्य” से बदलकर केवल “दिखावटी” रह जाएगी, जिससे सेवानिवृत्ति (नेचुरल अट्रिशन) के साथ धीरे-धीरे इस वर्कफोर्स को कम किया जा सकेगा।
  • सार्वजनिक जवाबदेही: सेंट्रल रेलवे और वेस्टर्न रेलवे को आंदोलनों के दौरान देरी का कारण बनने वाले कर्मचारियों के नाम और पदनाम सहित उनके सभी वेतन-भत्ते भी सार्वजनिक करने चाहिए, ताकि करदाताओं को यह पता चल सके कि उनके आवागमन में कौन और क्यों बाधा डाल रहा है।

समीक्षात्मक विश्लेषण: रेल प्रशासन की कमजोरी

रेल प्रशासन की सबसे कमजोर कड़ी “मानवीय हस्तक्षेप” पर उसकी अत्यधिक निर्भरता है। सिग्नलिंग सिस्टम को CBTC (कम्युनिकेशन-बेस्ड ट्रेन कंट्रोल) में अपग्रेड न करके — जो दिल्ली मेट्रो में मानक प्रणाली है — वे अब भी रनिंग स्टाफ की मनमर्जी पर निर्भर हैं। जब तक GoA 3 (ड्राइवरलेस) या GoA 4 (पूर्णतः स्वचालित) तकनीक के माध्यम से मानवीय तत्व को पूरी तरह समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मुंबई के लाखों उपनगरीय यात्री यूनियनों द्वारा खेले जाने वाले इस बड़े खेल में केवल एक मोहरा बने रहेंगे।

क्या इस “मानवीय हस्तक्षेप” की कीमत डेढ़ से दो लाख का भारी-भरकम वेतन और लगातार मिलने वाली देरी की धमकी है, या फिर मुंबई को पूरी तरह से स्वचालित और यूनियन के दबाव से मुक्त एक वैश्विक परिवहन प्रणाली का रास्ता चुनना चाहिए?

मुंबई लोकल के अपग्रेड पर यह वीडियो रिपोर्ट स्वचालित दरवाजा प्रणालियों की शुरुआत का विवरण देती है, जो गार्ड की भूमिका को कम करने और पूरी तरह से स्वचालित, सुरक्षित उपनगरीय रेल नेटवर्क की ओर बढ़ने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।