लखनऊ जंक्शन पर रेलवे ‘इंजीनियरिंग’ की खुली पोल: मरम्मत के नाम पर करोड़ों का अपव्यय, फिर भी धराशायी हुई पुरानी बिल्डिंग
जर्जर ढ़ांचे को गिराने के बजाय उसे ‘मरम्मत’ के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जाता रहा!
रेलवे की यह पुरानी परंपरा रही है कि मलबे के नीचे अक्सर जवाबदेही दबा दी जाती है!
गोरखपुर ब्यूरो: पूर्वोत्तर रेलवे (#NER) के लखनऊ जंक्शन पर गुरुवार, 14 मई 2026 को एक बड़ा हादसा होते-होते टला। दोपहर करीब 3 से 4 बजे के बीच स्टेशन की एक पुरानी और जर्जर बिल्डिंग की छत भरभरा कर गिर गई। संयोगवश इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इस मलबे के नीचे रेलवे के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की परतें साफ तौर पर दब गई हैं।

यह घटना मात्र एक ‘संयोग’ नहीं है, बल्कि रेलवे की सिविल इंजीनियरिंग की उस विफलता और धन के दुरुपयोग का परिणाम है, जिसे सालों से ‘मरम्मत’ की आड़ में ढ़का जा रहा था। इसकी जवाबदेही तो तय करनी पड़ेगी।
10 साल से जर्जर, फिर भी ‘मरम्मत’ का खेल?
जानकारों का कहना है कि, यह बिल्डिंग पिछले एक दशक से जर्जर अवस्था में थी। इसे बहुत पहले ही ‘अनसेफ’ घोषित कर डिस्मेंटल (ढ़हाने) करने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जब बिल्डिंग ढ़हाने के लायक थी, तो उस पर मरम्मत के नाम पर करोड़ों रुपये क्यों पानी की तरह बहाए गए?
विभागीय सूत्रों का आरोप है कि पूर्व सीनियर डीईएन/समन्वय/लखनऊ मंडल, जिन्होंने लगभग पांच वर्षों तक इस महत्वपूर्ण पद की कमान संभाली, उनकी देखरेख में इस जर्जर ढ़ांचे को बचाने का ‘दिखावा’ किया गया। वर्तमान में वह एसएजी (#SAG) में प्रमोट होकर पूर्वोत्तर रेलवे कंस्ट्रक्शन ऑर्गेनाइजेशन, गोरखपुर में चीफ इंजीनियर/कंस्ट्रक्शन-5 (गतिशक्ति) के रूप में तैनात हैं। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान बिल्डिंग को डिस्मेंटल करने के बजाय इसकी मरम्मत के नाम पर भारी बजट खपाया गया, जो अंततः पूरी तरह विफल साबित हुआ।
लापरवाही या सुनियोजित खेल?
स्टेशन परिसर से प्राप्त ढ़ही हुई छत की तस्वीरें स्थिति की भयावहता को दर्शा रही हैं। मलबे के ढ़ेर, नंगे तार और टूटी हुई दीवारें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि काम कितनी ढ़िलाई से किया जा रहा था। यहां प्रश्न यह है कि यदि यह एक ‘प्लैन्ड वर्क’ (Planned Work) था, तो सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं थे? जर्जर बिल्डिंग की छत का अचानक गिरना यह साबित करता है कि वहां काम कर रहे मजदूरों और पास से गुजरने वाले यात्रियों की जान जोखिम में डाली गई थी।
‘लीपापोती’ और जॉइंट नोट की प्रतीक्षा
घटना के बाद स्टेशन पर अफरा-तफरी का माहौल रहा। डीआरएम सहित सभी संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचे। पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (#CPRO) ने इसे ‘प्लैन्ड कंस्ट्रक्शन’ का हिस्सा बताया और कहा कि कोई जनहानि नहीं हुई है। हालांकि, इस घटना से इंजीनियरिंग विभाग की गंभीर लापरवाही उजागर हुई है, जिसके कारण करोड़ों का सरकारी धन बर्बाद हो गया। अब रेलवे ‘जॉइंट नोट’ बनाने में लगा हुआ है, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह अधिकारी, जिसकी नाक के नीचे यह ‘मरम्मत घोटाला’ फला-फूला, इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा?
जांच के घेरे में वर्तमान चीफ इंजीनियर ‘गतिशक्ति’
जिस अधिकारी की देखरेख में सालों तक लखनऊ मंडल में इस बिल्डिंग को ‘संजीवनी’ देने का नाटक किया गया, वह आज कंस्ट्रक्शन ऑर्गेनाइजेशन में ऊंचे पद पर आसीन है। रेलवे की यह पुरानी परंपरा रही है कि मलबे के नीचे अक्सर जवाबदेही दबा दी जाती है। लेकिन लखनऊ जंक्शन की यह गिरी छत बता रही है कि इंजीनियरिंग विभाग की फाइलों में दर्ज ‘करोड़ों की मरम्मत’ केवल कागजी थी।
जानकारों का कहना है कि समय पर रोटेशन के अभाव में पूरा रेल सिस्टम डम्प हो चुका है। लंबे समय से अधिकारियों के एक ही जगह, एक ही रेलवे में जमे होने के दुष्परिणाम अक्सर सामने आ रहे हैं, तथापि रेल प्रशासन रोटेशन पर कड़ाई करने के बजाय इस पर चुप्पी साधे बैठा है। जबकि इसके परिणाम रेल सिस्टम को और जनसामान्य के साथ-साथ रेलयात्रियों को भुगतने पड़ रहे हैं।
निष्कर्ष:
यह घटना भारतीय रेल के निर्माण विभाग में फैले उस भ्रष्टाचार के कैंसर की ओर स्पष्ट इशारा करती है, जहां जर्जर ढ़ांचे को गिराने के बजाय उसे ‘मरम्मत’ के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जाता है। यदि समय रहते इस ‘इंजीनियरिंग घोटाले’ की उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो अगली बार किस्मत शायद इतनी मेहरबान नहीं होगी और जान-माल का भारी नुकसान तय है।

