विशेष रिपोर्ट: पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय की नाक के नीचे ‘खिलवाड़’—गोरखपुर स्टेशन पर यात्री सुरक्षा और प्रशासनिक विफलता का बड़ा खुलासा
गोरखपुर ब्यूरो: पूर्वोत्तर रेलवे (#NER) का हृदय स्थल गोरखपुर जंक्शन इन दिनों विकास की आड़ में प्रशासनिक लापरवाही और सिविल इंजीनियरिंग की विफलता का जीवित प्रमाण बन गया है। सैकड़ों करोड़ के भारी-भरकम बजट के बावजूद यहाँ चल रहा ‘पुनर्विकास’ यात्रियों के लिए किसी भयावह सपने से कम नहीं है।
कोलाज का कड़वा सच: तस्वीरों का एआई विश्लेषण
स्टेशन परिसर से प्राप्त साक्ष्य सीधे तौर पर पूर्वोत्तर रेलवे की अव्यवस्था को उजागर करते हैं:
- सुरक्षा में बड़ी चूक: यात्री बिना किसी सुरक्षा कवच के, भारी लोहे के ऊँचे ढ़ाँचों (Scaffolding) के नीचे खड़े होने को मजबूर हैं।
- घटिया निर्माण: नए कंक्रीट पिलर्स की खराब फिनिशिंग और ‘हनीकॉम्बिंग’ तकनीकी गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
- दिखावटी निरीक्षण: मलबे और असुरक्षित साइट के बीच अधिकारियों की टीम गुजरती तो है, लेकिन बुनियादी खतरों को नजरअंदाज कर देती है।
- प्लेटफॉर्म पर मलबा: बिखरी हुई निर्माण सामग्री यात्रियों की असुविधा और संभावित दुर्घटनाओं का कारण बन रही है।
ग्राउंड रिपोर्ट: ₹500 करोड़ खर्च, फिर भी काम अधूरा और जान जोखिम में
गोरखपुर जंक्शन पर ‘गति शक्ति’ परियोजना की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है:
- धीमी प्रगति: बताया जा रहा है कि अब तक लगभग ₹500 करोड़ खर्च हो चुके हैं, लेकिन भौतिक कार्य प्रगति मात्र 20% ही हुई है।
- FOB का संकट: बीच का पुराना फुटओवर ब्रिज दो साल से निर्माणाधीन है, जो अब तक केवल फाउंडेशन स्तर से ऊपर उठ सका है।
- भगदड़ की आशंका: 9 प्लेटफॉर्मों को जोड़ने के लिए केवल एक FOB उपलब्ध है। जबकि एक साथ 4-5 ट्रेनें ली जाती हैं, तो गोरखपुर में कभी भी ‘स्टैम्पेड’ (भगदड़) हो सकता है।
प्रशासनिक जड़ता: एक ही कुर्सी पर दशक का ‘डेरा’
प्रोजेक्ट की सुस्त रफ्तार का एक बड़ा कारण अधिकारियों का लंबे समय तक एक ही जगह जमे रहना है:
- #CPM गतिशक्ति: इलेक्ट्रिकल विभाग के वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद, ये पिछले 10 वर्षों से लखनऊ डिवीजन में ही तैनात हैं। प्रशासन की इसी विशेष कृपा के चलते कार्यों की दुर्गति हो रही है, मानो रेलवे को इनके अलावा कोई अन्य योग्य अफसर ही नहीं मिल रहा।
जीएम की प्रशासनिक अयोग्यता और ‘घुन्नापन’
महाप्रबंधक (GM) की संदिग्ध कार्यशैली और विवादित निर्णयों ने मुख्यालय की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं:
- विवादित स्थानांतरण: हाल ही में कार्मिक विभाग (Personnel) के तीन ब्रांच अधिकारियों के ट्रांसफर में जीएम की प्रशासनिक योग्यता की कलई खुल गई। एक अधिकारी पर कैट (CAT) का स्टे लग गया, जबकि दूसरे को जबरन लखनऊ से रिलीज करवाकर बिना किसी पोस्टिंग के ‘खुला’ छोड़ दिया गया है।
- अधिकारियों का खेल: जीएम के ‘घुन्नेपन’ (कपटपूर्ण चुप्पी) के कारण हर PHOD मनमानी कर रहा है। जिस तरह PCPO ने अपने स्वार्थ में उनका उपयोग किया, अब PCOM भी वैसी ही कोशिश में हैं।
- अनुचित व्यवहार: आईआरसीटीसी (IRCTC) के बेस किचन और गोदाम को सिविल एरिया में प्राइवेट जगह पर शिफ्ट करने से प्लेटफार्म पर बिखरी सामग्री के मुद्दे पर, जीएम ने निरीक्षण के दौरान उन अधिकारियों पर भड़ास निकाली जो इसके लिए जिम्मेदार नहीं थे। मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर सटीक टिप्पणी की: “धोबीवा से नहीं जीते तो गदहवा के कान उमेठने लगे!”
IRCTC और यात्री सुविधाओं की बदहाली
स्टेशन एरिया से बेस किचन और गोदाम हटाकर सिविल एरिया में किराए की निजी जगह पर शिफ्ट करने से ट्रेनों में खाने की हाइजीन और गुणवत्ता समाप्त हो गई है। स्टेशन पर कैटरिंग इंस्पेक्टर को दिए गए चार छोटे कमरों में जगह न होने के कारण रेल नीर और अन्य सामग्री प्लेटफॉर्म पर लावारिस बिखरी रहती है।
तकनीकी विफलता और मेंटेनेंस का अभाव
अभी पिछले शनिवार को ही सुबह 3:50 बजे डोमिनगढ़ और जगतबेल स्टेशनों के बीच OHE टूटने से चार घंटे तक ट्रेनें ठप रहीं। भीषण गर्मी में हजारों यात्री फँसे रहे, जो यह प्रमाणित करता है कि ओएचई और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों का मेंटेनेंस केवल कागजों पर हो रहा है।
विशेष अन्वेषण: ‘अमृत’ में भ्रष्टाचार का अंदेशा?
‘रेल समाचार’ इस मामले में रेलवे बोर्ड सतर्कता निदेशालय और NER के SDGM से कड़ी जाँच की मांग करता है:
- सुरक्षा उल्लंघन: प्लेटफॉर्म पर ‘सेफ्टी नेट’ या बैरिकेडिंग का न होना सीधे तौर पर रेलवे सुरक्षा मैन्युअल का उल्लंघन है। क्या सुरक्षा बजट की बंदरबांट हो रही है?
- घटिया इंजीनियरिंग: पिलर्स में ‘हनीकॉम्बिंग’ वित्तीय हेराफेरी और खराब सामग्री के उपयोग का संकेत है। मेजरमेंट बुक (MB) की भौतिक सत्यापन के साथ जाँच होनी चाहिए।
- शाही परेड बनाम निरीक्षण: जीएम और एजीएम का ध्यान केवल गोरखपुर के फोटो-ऑप्स पर है, जबकि गोंडा, मैलानी, कासगंज, छपरा, सीवान और मऊ जैसे स्टेशनों पर कोई झाँकने तक नहीं जाता।
‘रेल समाचार’ की मांगें:
- निर्माण सामग्री का स्वतंत्र लैब टेस्ट कराया जाए।
- सुरक्षा में चूक के बावजूद काम न रुकवाने वाले PHODs की जवाबदेही तय हो।
- सीसीटीवी फुटेज के जरिए बीते 15 दिनों की सुरक्षा व्यवस्था की ऑडिट हो।
निष्कर्ष: गोरखपुर स्टेशन का पुनर्विकास ‘अमृत भारत’ के विजन को पूरा करने के लिए है, न कि कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से तिजोरियां भरने के लिए! यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो भविष्य में होने वाले किसी भी हादसे की पूरी जिम्मेदारी पूर्वोत्तर रेलवे के शीर्ष नेतृत्व की होगी।
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