संस्थागत ढ़ाल बनाम व्यक्तिगत जवाबदेही: कोर्ट से टीटीई को सजा और यूनियन की मांगों का आलोचनात्मक विश्लेषण
मुंबई मंडल, मध्य रेलवे में हाल ही में सामने आए न्यायिक फैसलों, आंतरिक अनुशासनात्मक आदेशों और यूनियन के विरोध प्रदर्शनों ने सार्वजनिक सेवा में जवाबदेही, ऑन-ड्यूटी व्यक्तिगत व्यवहार और कर्मचारी यूनियनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह रिपोर्ट इस बात का विश्लेषण करती है कि कैसे एक कर्मचारी संगठन “टार्गेट और स्टाफ उत्पीड़न” की आड़ में कथित तौर पर उन पदाधिकारियों और कर्मचारियों को बचाने का प्रयास कर रहा है जो गंभीर अपराधों और दुर्व्यवहार के दोषी पाए गए हैं।
1. न्यायिक निर्णय: रामचन्द्र खटपे को एक साल की सजा
विशेष अदालत के विशेष न्यायाधीश एस. वी. सहारे ने 4 मई 2026 को टीटीई और यूनियन के प्रमुख पदाधिकारी — कार्याध्यक्ष — रामचन्द्र खटपे के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
- अपराध और सजा: खटपे को एक 17 वर्षीय छात्रा की गरिमा को ठेस पहुँचाने (IPC की धारा 509) के लिए एक साल के सश्रम कारावास की कड़ी सजा सुनाई गई।
- अदालत की टिप्पणी: विशेष न्यायाधीश एस. वी. सहारे ने स्पष्ट किया कि रेलवे कर्मचारी जनता की सेवा और मदद के लिए हैं, न कि उन्हें धमकाने, डराने या उनके लिए अश्लील शब्दों का प्रयोग करने के लिए।
- भ्रष्टाचार का संदर्भ: अदालत ने पाया कि रसीद देने से इनकार करना, यात्रियों के पैसे “हड़पने” की मंशा को दर्शाता है, जो बाद में विवाद और दुर्व्यवहार का कारण बना।
2. आंतरिक अनुशासन: जगदीश कृष्णा का मामला
यूनियन की वर्तमान मांगों को जगदीश कृष्णा (TTI, CSMT) के खिलाफ जारी अनुशासनिक आदेश (आदेश संख्या BB.C.DAR.MAJOR.2024.10, दिनांक 4 नवंबर 2025) के भी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
- आरोप और निष्कासन: आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने पाया कि जगदीश कृष्णा ने महिला सहयोगी कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न, जातिवादी टिप्पणी और अपमानजनक व्यवहार किया था।
- सजा: अनुशासनिक अधिकारी ने उन्हें “तत्काल प्रभाव से सेवा से हटाने” (रिमूव फ्रॉम सर्विस) का कठोर दंड दिया।
- ताजा स्थिति: जगदीश कृष्णा की पहली अपील एडीआरएम स्तर से खारिज हो चुकी है और दूसरी अपील पीसीसीएम स्तर पर लंबित है। जहां विभिन्न माध्यमों से सेवा में वापस लेने का दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
- यूनियन का रुख: रिपोर्टों के अनुसार, यूनियनें इन गंभीर आरोपों के बावजूद उन्हें सेवा में वापस लाने के लिए सक्रिय रूप से दबाव बना रही हैं, इससे कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर बड़ा प्रश्न उठाता है।
3. ‘धड़क मोर्चा’ और यूनियन की मांगों का विश्लेषण
यूनियन के प्रमुख पदाधिकारी रामचंद्र खटपे की सजा के ठीक तीन दिन बाद, 7 मई 2026 को सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ (#CRMS) ने एक विरोध प्रदर्शन किया। उल्लेखनीय है कि खटपे को यूनियन ने तब अपना कार्याध्यक्ष बनाया था जब वह धारा 509 (IPC) और पोक्सो जैसे गंभीर आरोपों से घिरा था। यूनियन की मांगों का आलोचनात्मक विवरण नीचे दिया गया है:
- पूरी कानूनी सहायता की मांग: यूनियन “झूठे मुकदमों” के खिलाफ प्रशासन से कानूनी सहायता मांग रही है।
- आलोचना: खटपे जैसे मामले में, जहाँ अदालत ने “झूठे आरोप” के दावे को खारिज कर दिया है, सार्वजनिक धन का उपयोग अपराधी के बचाव में करना अनुचित और अनैतिक है।
- “व्यक्तिगत व्यवहार” के लिए सुरक्षा: यूनियन स्टाफ पर पड़ने वाले “दबाव” और “उत्पीड़न” का दावा कर रही है।
- आलोचना: ‘ड्यूटी’ और ‘अपराधिक दुर्व्यवहार’ के बीच एक स्पष्ट रेखा होनी चाहिए। यूनियन का यह रुख स्टाफ को जवाबदेही से बचने के लिए एक कवच (Shield) प्रदान करने जैसा प्रतीत होता है।
- लक्ष्यों (Targets) में ढ़ील: यूनियन का कहना है कि ऊँचे राजस्व लक्ष्यों के कारण स्टाफ दबाव में रहता है।
- आलोचना: हालांकि व्यावहारिक लक्ष्य आवश्यक हैं, लेकिन इसे यात्रियों से अवैध वसूली या रसीद न देने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
4. यूनियन के रुख में विरोधाभास
यह विश्लेषण यूनियन के व्यवहार में एक स्पष्ट विरोधाभास को उजागर करता है:
- एक ओर यूनियन स्टाफ के “उत्पीड़न” की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर वह उन पदाधिकारियों (खटपे) का समर्थन करती है जो स्वयं जनता और महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार के दोषी पाए गए हैं।
- साथी महिला स्पोर्ट्स स्टाफ का यौन उत्पीड़न करने वाले कर्मचारी (जगदीश कृष्णा) की सेवा में बहाली का समर्थन करना यह दर्शाता है कि यूनियनों का “धरना-मोर्चा” करना सामान्य स्टाफ के हितों के बजाय विशिष्ट “हित समूहों” की रक्षा के लिए है।
5. प्रशासनिक और नीतिगत सुधार के लिए सुझाव
- बॉडी-वॉर्न कैमरा का अनिवार्य उपयोग: टिकट चेकिंग स्टाफ को कैमरों से लैस किया जाना चाहिए, ताकि यात्रियों और स्टाफ के बीच की बातचीत का पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध हो। यह स्टाफ को झूठे आरोपों से बचाएगा और अपराधियों को बेनकाब करेगा।
- कानूनी सहायता की स्पष्ट नीति: प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि धारा 509 (IPC), पोक्सो या यौन उत्पीड़न (POSH Act) जैसे आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाने पर प्रशासन कोई कानूनी सहायता नहीं देगा और पहले से खर्च की गई राशि की वसूली भी करेगा।
- यूनियन पदाधिकारियों की जवाबदेही: यूनियन में नेतृत्व के पद पर बैठे व्यक्तियों के लिए नैतिक आचरण के उच्च मानक होने चाहिए। अपराधिक मामलों में सजा मिलने पर उनकी यूनियन सदस्यता और प्रशासनिक सुरक्षा तत्काल समाप्त होनी चाहिए।
- डिजिटल रसीद प्रणाली: नकदी वसूली और “बिना रसीद” के लेन-देन को पूरी तरह समाप्त करने के लिए 100% डिजिटल रसीद अनिवार्य की जानी चाहिए।
निष्कर्ष:
रेलवे यूनियनों का कार्य कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें कानून से ऊपर रखना। जब कोई संगठन रामचंद्र खटपे और जगदीश कृष्णा जैसे व्यक्तियों (स्टाफ मेंबर्स) का बचाव करता है, तो वह न केवल रेलवे की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है, बल्कि सुरक्षित यात्रा के लिए यात्रियों के अधिकार का भी हनन करता है। इसके अलावा, संगठन नेतृत्व को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके द्वारा इसके पहले किए गए अनाधिकृत विरोध प्रदर्शनों—विशेष रूप से नवंबर 2025 में—के कारण, ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, जिनमें यात्रियों की मौतें भी शामिल हैं।

