मोदी जी ने बड़े काम किए, लेकिन रेल के बाबू उनकी पकड़ में नहीं आए!

#मोदीराज में रेल मंत्रालय को ऐतिहासिक निवेश मिला, लेकिन इसकी ब्यूरोक्रेसी को नकेल डालने में सरकार पूरी तरह से विफल रही!

कई कॉन्ट्रैक्टर्स के फोन आए, बताया कि यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ सारी भारतीय रेल में चल रही नॉन-इंटरलॉकिंग रोक दी गई है। जब कंस्ट्रक्शन के अधिकारियों से कंफर्म किया, तो पता चला कि हाँ, ये बात सही है।

इस साल बारिश का मौसम थोड़ा लंबा खिंच गया था, इसलिए रेल के इंफ्रास्ट्रक्चर के काम करने का समय भी कम मिला। नॉन-इंटरलॉकिंग में ट्रैफिक निश्चित रूप से बाधित होता है। लेकिन यह निर्णय साल के शुरू में ही कांट्रैक्टर्स को स्पष्टता से बताना चाहिए।

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कॉन्ट्रैक्टर्स की कई लाख लेबर पूरी भारतीय रेल में हजारों वर्क साइट पर लगी है, जब काम नहीं होगा तो उनके पेमेंट में स्वाभाविक रूप से अड़चन आएगी, इसके साथ ही सैकड़ों कॉन्ट्रैक्टर और लाखों लेबर दोनों की जीविका भी प्रभावित होगी, इससे अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सरकार ने करीब 20 लाख करोड़ रेल में अपने 12 साल के कार्यकाल में निवेश किया है, ये खर्च स्टेशन डेवलपमेंट, वंदेभारत/अमृतभारत जैसी नई ट्रेनें, बड़ी संख्या में कोच निर्माण, ब्रिज निर्माण, यार्ड रिमॉडलिंग, सिग्नलिंग अपग्रेडेशन, कवच, नई रेल लाइनों और दोहरीकरण इत्यादि पर हुआ है। ऐसे में पंक्चुअलिटी की बात करना न केवल एक बड़ा मजाक है, बल्कि ये सिस्टम में शॉर्टकट को बढ़ावा देता है। तथापि साल की आख़िरी तिमाही में इस तरह चलते हुए कामों पर ब्रेक लगाना अनुचित है।

लेकिन जब एक तिहाई से अधिक महाप्रबंधकों के पद महीनों खाली रहेंगे, बोर्ड मेंबर्स में उछलकूद चलेगी और “तू चल मैं आया” के हिसाब से काम होगा, तो इनके बीच सामंजस्य बैठना असंभव है। रेल मंत्रालय को ऐतिहासिक निवेश मिला है, लेकिन इसकी ब्यूरोक्रेसी को नकेल डालने में सरकार पूरी तरह से विफल रही है। जैसा कि लोग मजाक में कहते हैं, “मोदी जी ने धारा 370 हटाने जैसे कई बड़े अविस्मरणीय काम कर दिए, लेकिन रेल के बाबू उनकी पकड़ में नहीं आए!”