पूर्वोत्तर रेलवे में अंधेरगर्दी: एपीओ के इंटरव्यू पैनल में अनधिकृत रूप से बैठे सीपीओ/आईआर
ट्रांसफर ऑर्डर के छह महीने बाद भी रिलीज नहीं हुए सीपीओ/आईआर
पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर में काफी समय से लंबित #APO के इंटरव्यू में अंधेरगर्दी का खुलकर प्रदर्शन हुआ। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया के बाद रेल को विभागीय जूनियर अफसर मिलने वाले हैं। इंटरव्यू लेने वाले पैनल में तीन PHOD होते हैं। सूत्रों ने बताया कि यहाँ एपीओ के इंटरव्यू पैनल में #PCPO, #PCME और #PFA शामिल थे, लेकिन CPO/IR भी इंटरव्यू में बैठे और सारे प्रश्न भी उन्होंने ही कंडीडेट्स से पूछे। प्रश्न ये उठता है कि इस इंटरव्यू में CPO/IR कैसे बैठ सकते थे? किसने उन्हें यह अनुमति दी?
सूत्रों ने बताया कि चूँकि PCPO की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, उन्हें कई बार यह तक समझ में नहीं आता कि उन्हें बैठना और साइन कहाँ करना है। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि उनको इतने महत्वपूर्ण और गोपनीय कार्य का कन्वीनर क्यों बनाया गया? होना तो यह चाहिए कि उनका मेडिकल बोर्ड बनाया जाए और उन्हें अनफिट घोषित करके घर भेजा जाए। प्रश्न यह भी है कि चीजों को भूल जाने वाले अधिकारी को विभाग प्रमुख के पद पर कैसे बैठाए रखा जा सकता है? प्रश्न यह भी है कि दो #HAG स्तर के अधिकारियों ने इस पर आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई?
उल्लेखनीय है कि #CPO/IR/NER का #ECR में ट्रांसफर हुए 6 महीने बीत गए हैं—मगर उन्हें रिलीज नहीं किया गया। यह भी एक बड़ी अंधेरगर्दी है। बताते हैं कि किसी इंटरव्यू पैनल में नामांकित अधिकारियों का विजिलेंस क्लीयरेंस भी लिया जाता है। मगर सीपीओ/आईआर बिना विजिलेंस क्लीयरेंस और बिना जीएम की अनुमति के #APO के इंटरव्यू पैनल में बैठे और सारे कंडीडेट्स से अपनी डायरी में पहले से ही लिखकर लाए गए प्रश्न भी उन्होंने ही पूछे—कई कंडीडेट्स ने फोन पर “रेलसमाचार” को बताया कि अल्जाइमरग्रस्त #PCPO सहित पैनल के तीनों मेंबर ठूँठ बने बैठे रहे! ये तो सरासर अंधेरगर्दी है! कुछ कंडीडेट्स के इस विषय पर आपस में बातचीत के ऑडियो भी प्राप्त हुए हैं।
भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि सीपीओ/आईआर को पीसीपीओ ने ही अपने साथ इंटरव्यू में बैठाया था। प्रश्न यह है कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद क्या उन्हें और पैनल के अन्य दोनों सदस्यों को इसके नियमों की जानकारी नहीं थी? और चूँकि पीसीपीओ की मानसिक स्थिति से पूर्वोत्तर रेलवे के सभी अधिकारी परिचित हैं, तथापि पैनल के बाकी दोनों सदस्यों द्वारा इस पर आपत्ति क्यों नहीं जताई गई? जबकि यह प्रक्रिया सरासर नियम-विरुद्ध थी।
सूत्रों ने यह भी बताया कि आज ही #AEE का भी इंटरव्यू था, मगर उसमें पीसीईई एवं एक अन्य सदस्य के साथ पीसीपीओ अकेले ही बैठे थे, यदि वास्तव में उन्हें कोई मानसिक समस्या है, तब भी इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने साथ सीपीओ/आईआर को नहीं बैठाया। स्पष्ट है कि यहाँ उनको इस पैनल के अन्य दो सदस्यों द्वारा टोका जा सकता था। जबकि अपने कार्मिक विभाग का ठेका उन्होंने सीपीओ/आईआर को दे रखा है।
उधर सीपीओ/आईआर की दबंगई और ओएस एवं वेलफेयर इंस्पेक्टरों आदि के माध्यम से दयाधार (सीजी) नियुक्ति में कदाचार की बहुत सी कहानियाँ निकलकर सामने आई हैं, मगर अन्य अधिकारियों का कहना है कि इन सबकी अनदेखी के लिए जोनल प्रशासन जिम्मेदार है, क्योंकि पीसीपीओ की मानसिक रुग्णता को देखते हुए सीपीओ/आईआर ही यहां प्रभावी रहे हैं, और आवश्यकता पड़ने पर उनसे ही बात करने की सभी पीएचओडी की भी मजबूरी बना दी गई है।
खबर यह भी है कि पीसीपीओ/ईसीआर का रिटायरमेंट इस महीने 31 अक्टूबर को होगा, तब सीपीओ/आईआर/पूर्वोत्तर रेलवे वहां बतौर सीएचओडी बनकर जाएंगे, इसीलिए इतने लंबे समय से यहां बैठकर पोस्ट खाली होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इस तरह चॉइस पोस्टिंग की जुगाड़बाजी ने ही रेल प्रबंधन का बंटाधार किया है।
याद करें कि #RailSamachar ने तत्कालीन #MOBD सीमा कुमार के ऐसे ही इंटरव्यू को भी उजागर किया था। जब रेलवे बोर्ड में डायरेक्ट सबॉर्डिनेट अपने बॉस का इंटरव्यू ले सकता है और मंत्री एवं सरकार को वह भी ठीक लगता है, तो पूर्वोत्तर रेलवे में आज जो हुआ शायद यह भी ठीक ही होगा। जब उस पर संज्ञान लेना आवश्यक नहीं समझा गया था, तो इस पर भी आँखें मूँद ली जा सकती हैं! और इसीलिए अदने से अधिकारियों की इस पैमाने पर अंधेरगर्दी चल रही है!
आज रेल की अराजक स्थिति का यही कारण है। पश्चिम रेलवे के अहमदाबाद/वड़ोदरा डिवीजन में हुए औद्योगिक स्तर के विभागीय चयन घोटाले को ही लें, उसके मेंटर पहले मंत्री जी के #ED थे और कांड-प्रक्रिया कराकर वापस रेल भवन में बैठ गए हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि #NER/गोरखपुर में यह जो हुआ, वह रेल में पहला मामला नहीं है, रेलवे बोर्ड के #मेंबर, #डीआरएम भी इसी व्यवस्था के सीधे लाभार्थी हैं।

