शिक्षा में स्वदेशी कब? कब होगा शिक्षा का स्वदेशीकरण?
शिक्षकों का राष्ट्रीय गिरोह विश्वविद्यालय से अब राजनीति की तरफ बढ़ रहा है, और विश्वविद्यालय दुनिया की रैंकिंग में रसातल की तरफ जा रहे हैं, तथा स्कूली शिक्षा के बारे में दूसरी रिपोर्ट भी इतनी ही चिंताजनक है!

अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियों के दृष्टिगत भारतीय राजनीति भी नींद से कुछ जागी है। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के भाषण में और दूसरे मंत्रियों ने भी देश के नागरिकों से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का जोरदार आग्रह किया है। जीएसटी समेत कुछ नीतियों में बदलाव भी आया है, जिससे भारतीय नागरिक अधिक से अधिक अपने देश की चीजों को ही खरीदें। लेकिन आश्चर्य कि इस पूरे “स्वदेशी राग” में शिक्षा में स्वदेशीकरण यानि अपने ही देश में मेडिकल इंजीनियरिंग या दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में अपने ही देश के विश्वविद्यालयों को चुनने और पढ़ने की बात किसी के मुंह से नहीं निकली।
शायद इसका कारण यह भी है कि वर्तमान समय के अधिकांश राजनेता नौकरशाही विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक से लेकर—जो भी थोड़ा बहुत अमीर है—उसने अपने बच्चों को विदेश भेजने का आसान विकल्प चुन लिया है। ऐसा नहीं कि आजादी के बाद विदेश पढ़ने नहीं जाते थे, लेकिन तब न हमारे पास इतने विश्वविद्यालय थे और न दूसरे संसाधन। परंतु वर्तमान में जब हमारे पास 1000 विश्वविद्यालय हैं, हजारों निजी और सरकारी कॉलेज है, पिछले 10 वर्षों में मेडिकल की सीटों की संख्या भी दोगुनी हुई है, लगभग हर राज्य में एम्स जैसे संस्थान भी खोले गए हैं, तब विदेश पढ़ने के लिए भागने के कारण क्या है? इस पर तुरंत गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जा रहा?
आंकड़े बताते हैं कि पिछले पाँच वर्ष में ही विदेश में पढ़ने के लिए जाने वालों की संख्या बढ़ते-बढ़ते दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 15 लाख, जिसमें सबसे अधिक अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड शामिल हैं। भारतीयों के विदेश में पढ़ने की चाहत को देखते हुए यूरोप, सिंगापुर से लेकर कई देशों ने भी तरह-तरह की प्रलोभन नीतिया अपनाई हैं।
विश्वविद्यालय शिक्षा के तीन बिंदुओं पर बात करें, तो लगभग 90 से अधिक देशों में हमारे छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई करने जाते हैं। बांग्लादेश, जॉर्जिया, यूक्रेन से लेकर चीन किर्गिस्तान इत्यादि.. कोविद के दौरान इस पक्ष पर पूरे देश का ध्यान गया और सरकार ने कुछ कदम भी उठाये, लेकिन देश में दुनिया के सबसे अधिक युवा अभी भी मन माफिक मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए भटक रहे हैं। और लाखों गांव कस्बे दूसरी तरफ अच्छे डॉक्टर की तलाश में।
इस बीच में आईआईटी की संख्या भी बढ़कर 23 हो गई है, लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि लगभग 50% फैकल्टी की सीटें खाली हैं, और वे जैसे-तैसे कॉन्ट्रैक्ट के शिक्षकों से काम चला रहे हैं। शिक्षा, पाठ्यक्रम और शोध में इसी गिरावट के चलते ही ये मेधावी युवा विदेश जाने के लिए मजबूर हैं।
लेकिन क्या विदेश में पढ़ना इतना आसान है? इस बढ़ती संख्या को देखते हुए इन सभी देशों ने अपने वीजा और विश्वविद्यालयों की फीस भी लगभग दोगुनी कर दी हैं और प्रति विद्यार्थी एक-दो करोड़ से कम खर्च नहीं आता। जिस देश की 80% जनता को राशन के पाँच किलो गेहूं-चावल पर गुजारा करना पड़ता हो, क्या उनके लिए विदेश जाना संभव है? हां है, उन नौकरशाहों, उन बड़े पदों पर रहने वालों को है, जिनको मोटा वेतन मिलता है, अच्छी-खासी पेंशन मिलती है, वे बजाय शिक्षा और विश्वविद्यालयों में सुधार करने के, अपने बच्चों को और प्रोत्साहित कर रहे हैं और इनकी देशभक्ति पर तो संदेह होता ही नहीं है।
हालाँकि सामाजिक आर्थिक पहलू भी बहुत चिंताजनक है। यही हाल राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों की शिक्षा का भी है। एक समय कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज, मुंबई का जेवियर, इलाहाबाद काशी की भी वह स्थिति नहीं रही, जो कुछ दशक तक पहले थी। पिछले कुछ समय से दिल्ली विश्वविद्यालय भी गिरावट की चपेट में आ गया है। केंद्रीय विश्वविद्यालय के दाखिले में पांच साल से कॉमन टेस्ट आरंभ तो किया गया है और इस बीच में नई शिक्षा नीति को भी पांच साल हो गए हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आ रहे। अच्छा हो कोई उच्च स्तरीय कमेटी तुरंत इसे रिव्यु करे।
इसमें कुछ खामियां तो जग-जाहिर हैं, जैसे परीक्षा में अनियमितताएँ, बच्चों को उनका इच्छित विषय नहीं मिलना, कोचिंग में वृद्धि, इसके साथ-साथ लड़कियों की घटती संख्या और राष्ट्रीय स्तर पर पहले की तरह सभी राज्यों के बच्चों का दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से बढ़ती दूरी आदि।
शिक्षकों की भर्ती का प्रश्न पर पूर्व कैबिनेट सचिव टी एस सुब्रमण्यम से लेकर अनेकों प्रशासनिक आयोग और शिक्षाविदों ने बदलाव की अनुशंसा की है कि क्यों नहीं यूपीएससी जैसा कोई शिक्षक भर्ती बोर्ड बनाया जाए, लेकिन जहां छात्रों की भर्ती के लिए तो कई स्तर की परीक्षाएं होती हैं, वहीं शिक्षक-प्रोफेसर की भर्ती-पदोन्नति के लिए एक भी नहीं। जब भी शिक्षकों और शोध की अच्छाई के प्रयास किए जाते हैं, तो सबसे अधिक विरोध यही शिक्षक वर्ग करता है, जो न क्लास लेना चाहता है, न बच्चों की फीडबैक पर भरोसा करता है, और न ही प्राचार्य के वार्षिक मूल्यांकन पर।
एक बुद्धिजीवी के शब्दों में शिक्षकों का यही राष्ट्रीय गिरोह विश्वविद्यालय से अब राजनीति की तरफ लगातार बढ़ रहा है, और विश्वविद्यालय दुनिया की रैंकिंग में रसातल की तरफ जा रहे हैं, तथा स्कूली शिक्षा के बारे में दूसरी रिपोर्ट भी इतनी ही चिंताजनक है।
आखिर रास्ता क्या है? पिछले वर्षों में इन्हीं सब चुनौतियों से जूझते-हारते बच्चे आत्महत्या की तरफ बढ़ रहे हैं। आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों में भी आत्महत्या की घटनाएं किसी का भी दिल दहला देती हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है। कमेटी भी बनाई गई है, लेकिन क्या केवल कमेटी या आयोग बनाने से काम चलेगा? क्या सरकार वर्ष-दो वर्ष की ऐसी कठोर नीति नहीं अपना सकती, जिससे शिक्षा में हो रहे ग्लोबल परिवर्तन भारत में भी लागू किये जा सकें!
इस सरकार ने भारतीय भाषाओं के पक्ष में बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन शोध और दूसरे नवीन वैज्ञानिक पक्षों पर अपेक्षित परिणाम आने बाकी हैं। 21वीं सदी में एक पूर्व मंत्री का एक शिक्षा संस्थान और वह भी स्पेस दिवस पर यह कहना कि सबसे पहले अंतरिक्ष यात्री कोई देवता थे, एक गलत दिशा में जाने का संकेत देता है। नई शिक्षा नीति में तो प्रश्न आकुलता और रचनात्मकता को बढ़ावा देने की बात की गई है। हमें दुनिया के विकसित देश की तरह विज्ञान और धर्म में स्पष्ट रेखा खींचनी होगी।
यह इस देश का सौभाग्य है कि दुनिया के सबसे युवा जनसंख्या हमारे पास है और उनके परिश्रम का लोहा पूरी दुनिया मानती भी है, बशर्ते कि उनको सही दिशा मिले। तो क्या हम जो अपने को विश्व गुरु कहते हैं, शिक्षा में स्वदेशी का प्रण नहीं ले सकते? शिक्षा दुनिया और समाज में परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम होता है और हमें ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है कि जहां धर्म-जाति-गोत्र-क्षेत्र को भूलकर मेरिट योग्यता को स्थान मिले।
यहां फिर 2009 के नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकट रामकृष्ण का कथन याद आता है कि अमेरिकी विश्वविद्यालय शोध और शिक्षा के मामले में न जाति देखते हैं, न धर्म, आप कहां से और किस विश्वविद्यालय से आए हैं, यह भी नहीं पूछा जाता। आपका भावी लक्ष्य क्या है, और वही उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में पिछले 200 सालों से सर्वोच्च बनाए हुए है। हर क्षेत्र में स्वदेशी आ जाएगा, अगर हम शिक्षा में क्रांतिकारी सुधार की तरह कदम उठाएं। वर्तमान सरकार की तीसरी पारी में तो पूरे देश को यही उम्मीद है।
प्रेमपाल शर्मा, शिक्षाविद एवं पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय, भारत सरकार। संपर्क: 99713 99046.

