रेलकर्मियों के बाद अब रेल अधिकारी भी हुए लावारिस

"Rail-Nilayam" Head Quarters of South Central Railway, Secundrabad

जो मेडिकल सुविधा रेलवे बोर्ड से रिटायर्ड बाबू को प्राप्त है, वह जोन से रिटायर होने वाले जीएम को उपलब्ध नहीं

सुरेश त्रिपाठी

प्राप्त जानकारी के अनुसार दक्षिण मध्य रेलवे के सिकंदराबाद स्थित बड़े अस्पताल में जरूरी दवाईयों की सप्लाई महीनों से नहीं आ रही है। सबको कह दिया जाता है कि “बाजार से खरीद लो, बाद में री-इम्बर्समेंट ले लेना।”

री-इम्बर्समेंट की कथा और भी अद्भुत है। रिटायरमेंट के बाद लखनऊ में सेटल हुए एक पूर्व जीएम को जब यही “बाजार से खरीद लो” कहा गया, तो वह अपनी और पत्नी की दवाईयों का तीन माह कोर्स एकसाथ खरीदकर ले आए।

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अब चालू हुआ उनकी यंत्रणा का दौर। उनसे एक बुकलेट टाइप 10 पेज का फाॅर्म भरने को कहा गया, पीपीओ की प्रति लगाओ, आधार कार्ड और पैन कार्ड की काॅपी लगाओ, फोटो लगाओ, यह सब भी उनको सीरीज में बताया गया।

फिर यह सब कागजात लगाकर किसी रेलवे डाॅक्टर से प्रमाणित करवाकर पहले के रेलवे प्रिस्किप्शंस के साथ सब्मिट करने का निर्देश दिया गया।

यह सब लगाकर महीने भर बाद जब वे सिकंदराबाद पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि “आपने शायद ठीक से सुना नहीं, ये सब फाॅर्म और कागजात ट्रिपलीकेट में भरने हैं।” यह सुनकर जीएम महोदय ने अपना माथा पीट लिया।

“मरता क्या न करता” की तर्ज पर ट्रिप्लीकेट में सब कागजात लेकर वे एक सप्ताह बाद जब गए तो उन्हें कहा गया कि “सीएमएस/सीएमडी के प्रति हस्ताक्षर होंगे, आप एक सप्ताह बाद आईये।”

वे जब एक हफ्ता छोड़, दो हफ्ते बाद गए तो उन्हें बताया गया कि आपका काम हो गया है, और एक प्रति अपने पास रखते हुए दो प्रतियां उन्हें दे दी गईं यह कहकर कि “अब आप इसे उस रेलवे को भेज दीजिये जिस रेलवे से आप रिटायर हुए हैं, वहीं से पेमेंट आपके पेंशन खाते में दो-चार महीने में आ जाएगा।”

अब जीएम साहब को समझ आ रहा है कि जमीनी हकीकत क्या होती है, क्योंकि जब तक कुर्सी पर थे, तब तक तो उन्हें इस सब प्रक्रिया की परिक्रमा करने की जरूरत नहीं होती थी, घर-बाहर का सारा काम उनकी एक ‘हूं’ में ही हो जाया करता था। अब उन्हें सामान्य रेलकर्मियों और जनसामान्य की परेशानी सही अर्थों में समझ में आ गई है।

इसी प्रकार के एक अन्य मामले में ऐसा ही कुछ अनुभव रेलवे की कैशलेस ट्रीटमेंट स्कीम इन इमरजेंसी (सीटीएसई) योजना को लेकर रेलटेल के फाउंडर एमडी और रिटायर्ड जीएम/कोर ए. के. चोपड़ा को हुआ।

उन्होंने 7 सितंबर को एक पत्र लिखकर सीआरबी को इस योजना की विसंगतियों और खुद को हुए अनुभव से अवगत कराया है। उन्होंने लिखा है कि रेलवे ने मार्च 2019 में सीटीएसई स्कीम की शुरुआत की थी, जिसके तहत कोई भी रेलकर्मी देश भर में कहीं भी कैशलेस उपचार करा सकता था।

उन्होंने भी ₹30,472 जमा करके दिल्ली मंडल से अपने और अपनी पत्नी के नाम पर यह कार्ड बनवाया था। रेलवे वेबसाइट पर उनके यह दोनों कार्ड “ऑपरेशनल” दर्शाए गए हैं।

उन्होंने लिखा है कि पिछले हफ्ते उन्हें हार्ट संबंधी कुछ परेशानी होने पर अपनी पत्नी को साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अस्पताल ने इमरजेंसी देखकर उनकी पत्नी को तो भर्ती कर लिया परंतु रेलवे से जारी सीटीएसई कार्ड को मान्य करने से इंकार कर दिया।

काफी समझाने-बुझाने के बाद अस्पताल उनका वह मेडिकल कार्ड मान्य करने पर राजी हुआ जो उन्हें उनके रिटायरमेंट के समय रेलवे द्वारा दिया गया था। इसके अलावा उनसे एनआरसीएच से लिखित अनुमति लेकर आने को कहा गया।

चोपड़ा साहब आगे लिखते हैं कि इसके बाद वह खुद एनआरसीएच गए और यह अनुमति लेने में उन्हें चार घंटे लगे तथा उन्हें आठ जगहों से हस्ताक्षर कराने के लिए बार-बार धक्के खाने पड़े। उन्होंने लिखा है कि वह खुद एक हार्ट पेशेंट हैं, ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि उक्त भागदौड़ के लिए उन्हें कितनी परेशानी उठानी पड़ी होगी।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रेलवे में कार्मिकों में भारी भेदभाव की नीति अपनाई गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार रेलवे बोर्ड से रिटायर होने वाले किसी भी स्तर के रेलकर्मी को सीटीएसई और सीजीएचएस दोनों तरह की मेडिकल सुविधाएं प्राप्त हैं, जबकि जोनों/मंडलों से रिटायर होने वाले रेलकर्मियों/अधिकारियों को उक्त दोनों में से केवल एक ही सुविधा दी जा रही है।

यानि रेलवे बोर्ड से रिटायर होने वाले एक सामान्य क्लर्क को जो सुविधा प्राप्त हो रही है, वह किसी जोन/मंडल से रिटायर होने वाले एचओडी/पीएचओडी की तो बात ही क्या, यह जीएम को भी नहीं मिल रही है। जैसा कि चोपड़ा साहब ने भी अपने पत्र में उल्लेख किया है। ऐसे कुछ रिटायर्ड उच्च अधिकारियों ने रेलवे बोर्ड से समान नीति अपनाए जाने की मांग भी की है।

निष्कर्ष यह है कि रेलवे की सिर्फ मेडिकल व्यवस्था ही नहीं, पूरी की पूरी रेलवे मशीनरी चौपट हो चुकी है। कहीं किसी की कोई सुनवाई नहीं है। रेलकर्मी तो लगभग लावारिस हो ही चुके हैं, अब अधिकारियों का भी वही हाल हो रहा है। चोपड़ा साहब ने भी अपने पत्र में कुछ सुझाव दिए हैं, पर वह कब लागू होंगे, होंगे भी या नहीं, यह कोई नहीं जानता!