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उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन    ||    मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !    ||    वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..    ||    सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !    ||    मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?    ||    बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..    ||    सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत    ||    टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध    ||    आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी    ||    रेलवे को सुधारने के एजेंडे को अपने तरीके से लागू करेंगे सुरेश प्रभु    ||    नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ और ‘श्रमेव जयते’    ||    उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाए -डी.पी.पांडेय, एमटी/रे.बो.    ||    सूचना प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल से कदाचार को रोकने में बड़ी सहायता मिल सकती है -आर. के. गुप्ता, जीएम/पू.रे.    ||    प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेलवे में पारदर्शिता बढ़ेगी - न्‍यायमूर्ति वी. के. चतुर्वेदी    ||    ध्यान बंटाने के लिए किया गया था मनोज कुमार सिंह को निलंबित    ||    भारतीय रेल को सुधारने और इसकी आय बढ़ाने हेतु ‘रेलवे समाचार’ के कुछ सुझाव    ||    डॉ. देबरॉय कमेटी में रेलवे साइड से कोई सक्षम रेल अधिकारी नहीं    ||    कमी रेलवे के वर्तमान ढ़ांचे में नहीं, बल्कि नाकाबिल लोगों को प्रमोट किए जाने में है    ||    डीओपीटी ने जीएम पैनल वापस भेजा, डीआरएम की पोस्टिंग में भी पंगा कायम    ||    सीनियर डीसीएम मनोज कुमार सिंह के निलंबन का कोई औचित्य नहीं था !

Suresh Tripathi, Editor, 105, Doctor House, 1st Floor, Raheja Complex, Kalyan (West) - 421301. Distt. Thane (Maharashtra). Contact:+919869256875 Email : editor@railsamachar.com, railwaysamachar@gmail.com

उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन    ||    मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !    ||    वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..    ||    सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !    ||    मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?    ||    बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..    ||    सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत    ||    टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध    ||    आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी    ||    रेलवे को सुधारने के एजेंडे को अपने तरीके से लागू करेंगे सुरेश प्रभु    ||    नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ और ‘श्रमेव जयते’    ||    उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाए -डी.पी.पांडेय, एमटी/रे.बो.    ||    सूचना प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल से कदाचार को रोकने में बड़ी सहायता मिल सकती है -आर. के. गुप्ता, जीएम/पू.रे.    ||    प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेलवे में पारदर्शिता बढ़ेगी - न्‍यायमूर्ति वी. के. चतुर्वेदी    ||    ध्यान बंटाने के लिए किया गया था मनोज कुमार सिंह को निलंबित    ||    भारतीय रेल को सुधारने और इसकी आय बढ़ाने हेतु ‘रेलवे समाचार’ के कुछ सुझाव    ||    डॉ. देबरॉय कमेटी में रेलवे साइड से कोई सक्षम रेल अधिकारी नहीं    ||    कमी रेलवे के वर्तमान ढ़ांचे में नहीं, बल्कि नाकाबिल लोगों को प्रमोट किए जाने में है    ||    डीओपीटी ने जीएम पैनल वापस भेजा, डीआरएम की पोस्टिंग में भी पंगा कायम    ||    सीनियर डीसीएम मनोज कुमार सिंह के निलंबन का कोई औचित्य नहीं था !

Headlines :
उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन

दवा कंपनियों, दवा दलालों और मेडिकल अधिकारियों का अनैतिक एवं भ्रष्ट गठजोड़
मेडिकल अधिकारियों का समयबद्ध ट्रांसफर सुनिश्चित नहीं किए जाने का दुष्परिणाम

उत्तर पश्चिम रेलवे के जयपुर स्थित केंद्रीय रेलवे अस्पताल (सेंट्रल हॉस्पिटल) द्वारा रेल कर्मचारियों और अधिकारियों को एक्सपायरी डेट वाली दवाईयां दी जा रही हैं. इस बारे में उत्तर पश्चिम रेलवे के कई कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा पिछले कई दिनों से ‘रेलवे समाचार’ को लिखित और मुंहजबानी शिकायतें भेजी गई हैं. कर्मचारियों और अधिकारियों ने अंततः मांग किए जाने पर उन्हें केंद्रीय रेलवे अस्पताल, जयपुर द्वारा दी गई दवाईयों की फोटो भी ‘रेलवे समाचार’ को भेजी हैं. यहां प्रस्तुत फोटो में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि इन दवाईयों पर 11/2014 की एक्सपायरी डेट छपी हुई है. इसमें पैकिंग डेट 6/2013 और बैच नंबर 15363 के साथ ‘स्ट्रिक्टली नॉट फॉर सेल’ भी छपा हुआ है.

उत्तर पश्चिम रेलवे के जयपुर स्थित केंद्रीय रेलवे अस्पताल द्वारा एक रेल अधिकारी को दी गई दवाईयां

उत्तर पश्चिम रेलवे मुख्यालय और जयपुर मंडल के कई अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बताया कि ऐसी दवाईयां उन्हें काफी दिनों से दी जा रही हैं. उनका कहना है कि इस बारे में शिकायत करने पर अस्पताल प्रशासन द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. उन्होंने बताया कि वास्तव में रेलवे द्वारा एक्सपायरी डेट की अथवा एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुकी दवाईयां खरीदी जाती हैं, जिनको खाने से रेल कर्मचारियों को फायदा होने के बजाय नुकसान ज्यादा हो रहा है. उनका यह भी कहना है कि कुछ मेडिकल अधिकारियों की मिलीभगत से दवाईयां सप्लाई करने वाली कंपनियां एक्सपायरी डेट वाली अथवा एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुकी दवाईयां सप्लाई की जा रही हैं.

मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !

‘जेतना अंधरऊ बरत जाएं, वोतना पड़वुनू चबात जाएं’
यही है मध्य रेलवे के अकर्मण्य अधिकारियों का रवैया
मध्य रेल की परफोर्मेंस से रेल मंत्रालय ने कई बार अप्रसन्नता भी व्यक्त की है
पानी नाक के ऊपर चले जाने के बाद स्थिति सुधारने हेतु सक्रिय हुए महाप्रबंधक

सुरेश त्रिपाठी

मध्य रेलवे रोजाना चालीस लाख से ज्यादा दैनिक उपनगरीय यात्रियों को उनके गंतव्य तक लाने-लेजाने का विश्व में सबसे जटिल सबर्बन रेल नेटवर्क का संचालन करती है. इतनी बड़ी संख्या में दैनिक यात्रियों को सेवा देने का दबाव दुनिया की किसी भी रेल सर्विस में नहीं है. यह सत्य है, और इसके लिए कुछ काबिल रेल अधिकारी बधाई के पात्र भी हैं. मगर यहां स्थिति यह है कि ‘जेतना अंधरऊ बरत जाएं, वोतना पड़वुनू चबात जाएं’ यानि रेल मंत्रालय (भारत सरकार) जितनी कोशिश स्थिति में सुधार लाने और भरपाई करने की करता जा रहा है, मध्य रेलवे के अकर्मण्य अधिकारी और उनका अकुशल नेतृत्व उसकी इस कोशिश को पलीता लगाता जाता है.


पिछले करीब एक वर्ष के दौरान मध्य रेल की कार्य-प्रणाली और कार्य-निष्पादन के तौर-तरीकों तथा इसके चलते कार्य-कुशलता में आई भारी गिरावट को देखते हुए मध्य रेलवे की परफोर्मेंस से रेल मंत्रालय ने कई बार अप्रसन्नता भी व्यक्त की है. अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि न सिर्फ महाप्रबंधक को इसे सुधारने हेतु सक्रिय होना पड़ा है, बल्कि उन्हें रेलवे बोर्ड से इसके लिए 2000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त फंड अविलंब जारी किए जाने की गुहार भी लगानी पड़ी है. उनकी इस गुहार के प्रत्युत्तर में रेलवे बोर्ड ने भी कमाई बढ़ाने की हिदायत देते हुए ऊंट के मुंह में जीरे की भांति मात्र 60 करोड़ रुपए की राशि विशेष पैकेज के रूप में मध्य रेलवे को दिए जाने का आश्वासन दिया है.

मध्य रेलवे को अपने उपनगरीय क्षेत्र में 24 कोच के प्लेटफार्म बनाने के लिए करीब 72 करोड़, विद्युतीकरण के लिए लगभग 122 करोड़, डिजिटल एक्सेल काउंटर लगाने के लिए 11 करोड़, लेवल क्रासिंग्स पर रोड ओवर ब्रिज बनाने हेतु 53 करोड़, कुछ उपनगरीय स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज (एफओबी) बनाने के लिए 15 करोड़, लगभग इतने ही उपनगरीय स्टेशनों पर प्लेटफार्म छत (सीओपी) लगाने के लिए 5.5 करोड़, रोड सेफ्टी, एसएंडटी वर्क एवं स्टाफ की जरूरतों के लिए 130 करोड़ और बंद दरवाजों वाली लोकल गाड़ियों के लिए 600 करोड़ तथा लंबी दूरी की ट्रेनों के हाल्ट बढ़ाने के लिए 58 करोड़ सहित पूरी मध्य रेलवे के लिए 2000 करोड़ रुपए चाहिए. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मध्य रेलवे ने वर्ष 2012-13 और 2013-14 में प्रतिवर्ष 727 करोड़ रुपए (कुल करीब 1454 करोड़ रुपए) का घाटा होने की बात कही है. यह घाटा सीजन पास में की जाने वाली वृद्धि को वापस लिए जाने सहित कुछ अन्य कारणों से हुआ, ऐसा बताया गया है.

वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..

सुरेश त्रिपाठी

नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने अपना पदभार ग्रहण करने के पहले ही दिन से जिस तरह और जिस तेजी से रेलवे की चीजों को लेना शुरू किया है, उससे न सिर्फ यह कहने का मन कर रहा है कि वाह प्रभू.. आपने तो कमाल कर दिया, आपने पहले ही दिन यह भी संकेत दिया है कि भारतीय रेल अब एक मजबूत इरादों वाले व्यक्ति के हाथों में है और अब इसमें तेजी से सुधार की प्रक्रिया शुरू होने वाली है. श्री प्रभु ने पहले ही दिन यात्री संतुष्टि, रेल परिचालन में संरक्षा की स्थिति और देश की अर्थव्यवस्था के विकास में रेलवे की भूमिका आदि विषयों पर अधिकारियों के साथ चर्चा और समीक्षा भी की. इसके अलावा पहले दिन से ही उन्होंने रेलवे बोर्ड और रेलवे के पीएसयू के प्रमुखों तथा मान्यताप्राप्त रेल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ भी बैठकें करके रेलवे की और उनकी समस्याओं को सुना एवं समझा है. उन्होंने विभिन्न रेल परियोजनाओं पर पूरी पारदर्शिता और कुशलता के साथ अमल किए जाने का निर्देश दिया है.

10 नवंबर को रेल भवन, नई दिल्ली में अपना कार्यभार संभालते हुए नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु

श्री प्रभु ने सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया है कि अबसे कोई भी टेंडर रेलमंत्री के स्तर पर तय नहीं किया जाएगा, बल्कि इसके अधिकार अब जोनों में जीएम स्तर पर बहाल किए जाएंगे, जिससे न सिर्फ उनको समय से जारी किया जाएगा, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी तय की जा सकेगी. इसके साथ ही श्री प्रभु ने रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग और हाल ही में एमडी/दिल्ली मेट्रो से अवकाश ग्रहण किए श्री ई. श्रीधरन को पुनः रेलवे से जोड़ लिया है. उन्होंने श्रीधरन की अक्षुण्य प्रतिभा का इस्तेमाल करने के लिए उनके नेतृत्व में एक सदस्यीय समिति का गठन इस बात के लिए किया है कि जिससे वाणिज्यिक निर्णय लेने में जीएम स्तर पर टेंडरिंग सहित जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व तथा पारदर्शिता की प्रक्रिया को सुनिश्चित किया जा सके, यह सुझाव यह एक सदस्यीय समिति देगी.

सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !

गौड़ा ने की थी वर्तमान सीआरबी को छह महीने का एक्सटेंशन देने की सिफारिश
प्रधानमंत्री को लग चुकी थी सीआरबी और गौड़ा के अनैतिक गठजोड़ की भनक
अकर्मण्य और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ बिना संज्ञान लिए ही क्या भारतीय रेल में तीव्र सुधार की प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी?

सुरेश त्रिपाठी

केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार से करीब 15-20 दिन पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लगे थे और रेलवे बोर्ड में भी यह चर्चा खूब गरम रही कि रेलमंत्री पद से डी. वी. सदनाद गौड़ा की छुट्टी होने जा रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी जगह किसी और को रेलमंत्री बनाने जा रहे हैं. इसके साथ ही यह भी सर्वविदित रहा है कि वर्तमान चेयरमैन, रेलवे बोर्ड अरुणेंद्र कुमार को प्रधानमंत्री पसंद नहीं करते हैं. हालांकि इसके साथ यह भी चर्चा रही कि प्रधानमंत्री तो सदानंद गौड़ा को काफी हद तक पसंद नहीं करते हैं. यह तमाम अटकलें और चर्चाएं तब फलीभूत हो गईं जब वास्तव में सदानंद गौड़ा को रेल मंत्रालय से हटा दिया गया. रेलवे के तमाम अधिकारियों और राजनीतिक क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि श्री गौड़ा को हटाए जाने का प्रमुख कारण अरुणेंद्र कुमार ही रहे हैं. इसके अलावा श्री गौड़ा की धीमी कार्य-शैली और तेजी से निर्णय नहीं ले पाने की उनकी अक्षमता भी उनके विपरीत रही है. तथापि उन्हें रेलमंत्री पद से मात्र छह महीनों में ही हटा दिए जाने का प्रमुख कारण अरुणेंद्र को ही माना जा रहा है.

रेल भवन में जीएम और डीआरएम की ऐतिहासिक मीटिंग को संबोधित करते हुए पूर्व रेलमंत्री डी. वी. सदानंद गौड़ा.

चूंकि रेलवे में तीव्र सुधार के लिए प्रधानमंत्री की कसौटी पर सदानंद गौड़ा खरे नहीं उतर पाए, रेलवे बोर्ड के कई अधिकारियों का यह मानना भी बहुत हद तक सही है, रेलमंत्री का पदभार संभालने के तुरंत बाद जब श्री गौड़ा ने भारतीय रेल के इतिहास में सर्वथा पहली बार जीएम और डीआरएम की एक साथ बैठक रेल भवन में बुलाई थी, तब ऐसा लगा था कि रेलवे में सुधार की गति में भूचाल आने वाला है. परंतु उनकी यह शुरुआत कुछ ही दिनों बाद कहां फुस्स हो गई, किसी को पता भी नहीं चल पाया. इन छह महीनों में यह भी देखने को मिला कि अन्य रेलमंत्रियों की ही तरह रेलवे की स्थिति में सुधार करने के बजाय श्री गौड़ा का भी पूरा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र बंगलुरु तक ही सीमित होकर रह गया था. उनका हर कार्यक्रम बंगलुरु में ही बैठकर तय हो रहा था. बाकी देश से और वहां की रेल समस्याओं से उनका कोई जुड़ाव नहीं हो पाया था.

मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?

मंडल परिचालन प्रबंधकों के बीच समन्वय को घोर आभाव
हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं बढ़ी रेलवे की आय
यात्री गाड़ियों की गति नहीं बढ़ी, कई-कई दिनों तक अटकी रहती हैं मालगाड़ियां

विजय शंकर श्रीवास्तव, ब्यूरो प्रमुख/एनईआर

‘मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?’ यह सवाल बड़ा मौजूं है, क्योंकि इसकी चर्चा उसी दिन से पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय, गोरखपुर में हो रही है, जिस दिन मेंबर ट्रैफिक गोरखपुर स्टेशन पर उतरे थे. इसके दो कारण प्रमुखता से चर्चा में हैं, वह यह कि हजारों करोड़ रुपए खर्च करके पूर्वोत्तर रेलवे की प्रमुख मेन लाईनों का दोहरीकरण काफी समय पहले पूरा हो जाने के बावजूद इसका बढ़ी हुई लाइन कैपेसिटी का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है. और दूसरा यह कि कुछ ऑपरेटिंग अधिकारियों की आपसी खींचतान अथवा टसल के कारण माल गाड़ियों का निकास समय से न हो पाने से रेलवे को अपेक्षित आय नहीं मिल पा रही है. इसके अलावा करीब 25 करोड़ रुपए की लागत से गोरखपुर स्टेशन यार्ड की हाल ही में हुई रि-मॉडलिंग का पूरा लाभ न तो यात्रियों को मिल पा रहा है, और न ही इससे अब तक रेलवे की छवि में कोई सुधार आया है.

पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय, गोरखपुर में 9 नवंबर को उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे और पूर्व मध्य रेलवे के वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों के साथ समन्वय/समीक्षा बैठक करते हुए मेंबर ट्रैफिक, रेलवे बोर्ड डी. पी. पांडेय और एडिशनल मेंबर ट्रैफिक ए. के. मैत्रा.

पहचान उजागर न करने की शर्त पर पूर्वोत्तर रेलवे के कुछ अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र की तीनों रेलों - उत्तर रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे - के मंडल स्तरीय परिचालन अधिकारियों के बीच आपसी तालमेल की कमी के कारण दोहरीकरण के बावजूद न तो लाइन कैपेसिटी का पूरा उपयोग हो पा रहा है, और न ही यात्री एवं माल गाड़ियों को समय से चलाया जा पा रहा है. इसी कारण रेलवे को इससे अपेक्षित आय भी नहीं मिल पा रही है. उनका कहना है कि स्थिति यह है कि लखनऊ के दोनों मंडलों, इज्जतनगर, वाराणसी और समस्तीपुर एवं सोनपुर आदि मंडलों से होकर पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे अथवा अन्य किसी दूर-दराज स्थानों को जाने वाली माल गाड़ियां पूर्वोत्तर रेलवे के दायरे में 2-4 दिन से लेकर एकाध हफ्ते तक भी अटकी रहती हैं, जिससे माल ढुलाई में देरी हो रही है और पार्टियों का माल भी निर्धारित समय से उनके गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच पा रहा है.

बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..

अंधा बांटे रेवड़ी, पुनि-पुनि अपनो को दे. अंधेर नगरी, चौपट राजा, टका सेर जेई, टका सेर एसएसई

रेलवे बोर्ड (रेल मंत्रालय) के पत्र संख्या पीसी-3/2013/सीआरसी/4, आरबीई संख्या 102/2013, दि. 8.10.2013 के आदेश के तहत वर्तमान में इंजीनियरिंग कैडर के एनेक्सचर-सी में अंकित तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को रिस्ट्रक्चरिंग के तहत पदोन्नति दी जा रही है. इस आदेश में अत्यंत त्रुटिपूर्ण व्यवस्था दी गई है, जिससे रेलवे ट्रैक के दिन-प्रतिदिन का रखरखाव (मेंटेनेंस) करवाने वाले पद जैसे रेलवे मिस्त्री / सुपरवाइजर आदि के पद समाप्त हो गए हैं. इसके बजाय अच्छा तो यह होता कि राष्ट्र और रेल हित में तमाम रेल अधिकारी अपने बंगले और अपने बच्चों-रिश्तेदारों और अन्य दूसरे ब्रांच अधिकारी की सेवा में लगाए गए इंजीनियरिग विभाग के सैकड़ों कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर दिया होता. यह महत्पूर्ण पद हैं, जिनका उल्लेख ब्रिटिशकाल से अब तक रेलवे इंजीनियरिंग मैन्युअल के क्रम संख्या 146 और 147 में वर्णित है और साथ ही अग्रिम शुद्धि पत्र संख्या 118, रेलवे बोर्ड पत्र संख्या 2009/सीई/II/सीएस/I, दि..30.07.2010 में लिखित है तथा दैनिक ट्रैक मेंटेनेंस की जिम्मेदारी शुद्धिपत्र के साथ भी बार-बार रेलवे बोर्ड (रेल मंत्रालय) द्वारा भी  पदनाम पर दी गई है.

इन पदों को समाप्त करने वाले अधिकारी भविष्य में इन पदों की कमी के चलते होने वाली घटनाओं या दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी नहीं लेंगे. तब तो कहेंगे कि पीडब्ल्यूआई जिम्मेदार है, लेकिन उन्हें इस बात का भी जबाब देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि ट्रैक मेंटेनेंस कौन करेगा? क्योंकि अब तो सभी को सीनियर सेक्शन इंजीनियर बना दिया गया है. यहां वह कहावत एकदम सटीक बैठ रही है कि अंधा बांटे रेवड़ी, पुनि-पुनि अपनो को दे. अंधेर नगरी, चौपट राजा, टका सेर जेई, टका सेर एसएसई. इस तरह के आदेश से भारतीय रेल के इंजीनियरिग डिपार्टमेंट में सभी डिप्लोमा और डिग्रीधारी सिविल इंजीनियर में  घोर असंतोष व्याप्त है. साथ ही सीनियर - जूनियर की गरिमा भी समाप्त हो गई है. सभी लोहार-बढ़ई सीनियर सेक्शन इंजीनियर (एसएसई) बना दिए गए हैं. वह भी बिना किसी तकनीकी डिग्री/डिप्लोमा के ही. जबकि नियमानुसार ऐसे किसी एक पद पर कम से कम अगली पदोन्नति होने से पूर्व तीन सेवा आवश्यक मानी जाती थी, सबको दरकिनार कर दिया गया है. इस तरह की पदोन्नति के हो  रहे फैसले के बारे में किसी जानकारी को प्रशासन द्वारा प्रचारित नहीं किया जाता है. यदि ऐसा होता तो कर्मचारी उसी समय न्यायालय की शरण में चले जाते. वैसे अब वह न्यायालय की शरण में सामूहिक रूप से जा रहे हैं. पूर्व में पी-वे मिस्त्री/सुपरवाइजर के पक्ष में एक फैसला भी हुआ है. तथापि पदोन्नति के मामले में इंजीनियर बिना तकनीकी डिग्री वाले  को बनाने के लिए तो उसके लिए पूर्व से इंजीनियर डिग्री वाले सेलेक्शन पद पर योग्यता को दरकिनार नहीं किया जा सकता है.

इसके साथ ही सभी सीनियर/जूनियर की गरिमा समाप्त हो गई है. स्थिति यह है कि रेलवे में कार्यरत सभी पूर्व लोहार/बढ़ई अब सीनियर सेक्शन इंजीनियर बना दिए गए हैं, जबकि यह सेलेक्शन पद है और इस पद पर रेलवे भर्ती बोर्ड से या डिपार्टमेंटल सेलेक्शन और वरीयता के आधार ही भर्ती की जाती है. यह वैसा ही जैसे बिना आवश्यक मेडिकल डिग्री के ही किसी को डॉक्टर और बिना क़ानूनी डिग्री के किसी को जज बना दिया जाए. रेलवे में भी वैसा ही हो रहा है. यहां बिना तकनीकी डिप्लोमा अथवा इंजीनियरिंग डिग्री लिए ही किसी भी सामान्य मैट्रिक या इंटरमीडियट पास अधीनस्थ और गैर-तकनीकी कर्मचारी को बैक डेट से पदोन्नति देते हुए एसएसई बना दिया गया है. ऐसे में क्या रिजल्ट आएगा, इस बारे में सरकार और न्यायलय को ही अब विचार करना चाहिए. बिना तकनीकी डिग्रीधारी कर्मचारी को तकनीकी पद पर तभी पदोन्नति दी जा सकती है, जब वह एक पद पर कम से काम अगली पदोन्नति होने से पहले 3 साल की सेवा के साथ आवश्यक जेडटीआई ट्रेनिंग कोर्स को पास कर ले. परंतु यहां इस सब आवश्यकता को दरकिनार कर दिया गया है.

सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत

सतर्कता संगठन, पूर्व मध्य रेलवे द्वारा 16वां सतर्कता बुलेटिन निकालने के लिए बधाई. परंतु इसके साथ ही जमीनी स्तर पर सभी नियमों का पालन सुनिश्चित भी करना होगा. मगर यह कब होगा, क्योंकि तीन साल से ज्यादा समय से एक ही जगह/पद पर पदस्थापित अधिकारियों और निरीक्षकों का स्थानांतरण न होने अथवा न किए जाने और स्थानांतरण आदेश हो जाने के बाद भी स्पेयर नहीं किए जाने से तो कोई प्रशासनिक सुधार होने वाला नहीं है. सतर्कता संगठन में नियुक्ति पर किसे लेना है, यह निर्णय खुद सतर्कता संगठन का होना चाहिए, न कि किसी अन्य अधिकारी का. फील्ड में काम करने वाले अधिकारी नहीं चाहते हैं, यह आधार किसी सफल कर्मचारी को नहीं लिए जाने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए. क्योंकि ऐसे में सतर्कता संगठन की कोई हैसियत नहीं रह जाएगी.

प्रशासन आखिर इतना कमजोर क्यों हो जाता है? यह सब रेल हित में पूर्व मध्य रेलवे में बंद होना चाहिए. प्रशासनिक हित में स्थानीय अधिकारियों का पूर्व मध्य रेलवे से बाहर स्थानांतरण किया जाना चाहिए ताकि जातिगत ग्रुपिज्म के तहत अन्य जाति के लोगों को मानसिक प्रतारणा से मुक्ति मिल सके. महाप्रबंधक और अन्य पुरस्कार प्राप्त करने का भी जातिगत जुगाड़ या शिष्टाचार के तहत ठेकेदार को कितनी मदद कर सकते हैं, यह आधार होता है. जबकि यहां स्थिति यह है कि सत्यमेव जयते की बात करने वाले को ही दंड सहना पड़ता है. सत्य है कि अगर उच्च पद पर बिहार से बाहर प्रदेशों के कुछ न्यायप्रिय अधिकारियों की पदस्थापना नहीं होती, तो कुछ सामंती मानसिकता के अधिकारी इस रेलवे का नामोनिशान मिटा कर केवल अपनी जाति और सेवकों के नाम कर देते.

यहां टेंडर भी एडवांस में कर दिया जाता है, जबकि कार्य दो से पांच वर्ष बाद होना है. यही नहीं, अपने लोगों के फायदे के लिए सिंगल टेंडर, लिमिटेड टेंडर, अधिकतम दर पर वर्क, इमरजेंसी दिखाकर और इसके साथ ही मार्केट रेट भी अधिकतर फर्जी लगाया जाता है. टेंडर दिया जाता है जबकि वास्तविकता में ओपेन टेंडर और पुनः ओपेन टेंडर के लिए पर्याप्त समय होता है. तमाम मेटेरियल सरप्लस पड़ा हुआ है, मिटटी का कार्य प्रारम्भ होना है या हुआ है. स्थानांतरण नहीं हो, इसके लिए 10 साल से भी अधिक समय से कार्य निरीक्षक / रेलपथ निरीक्षक/निर्माण जबरन भंडार रखे हुए हैं, जबकि उस भंडार का रेलवे को कोई फायदा नहीं है.

टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध

इंटरनेट के माध्यम से बढ़ रही रेल टिकट बुकिंग का असर रेल आरक्षण केंद्रों (पीआरएस - पब्लिक रिजर्वेशन सिस्टम) के कार्यरत आरक्षण-कम-पूछताछ क्लर्कों (ईसीआरसी) पर दिखाई देने लगा है, क्योंकि रेल प्रशासन द्वारा उन्हें अब पब्लिक एनाउंसमेंट्स, फेस-टू-फेस जनरल इन्क्वारी, प्रोटोकॉल ड्यूटी, कोचों और प्लेटफॉर्म्स पर आरक्षण चार्ट लगाने, कोच गाइडेंस की डाटा फीडिंग, जीएम/सीसीएम को दैनिक अपडेट देने, रिटायरिंग रूम्स का एलाटमेंट और कोच नंबरिंग जैसे ईसीआरसी से इतर कार्यों पर जबरदस्ती लगाया जा रहा है. पश्चिम रेलवे, मुंबई सेंट्रल डिवीजन ने इस बारे में बकायदे 28 अगस्त 2014 को एक पत्र (संख्या सी-549/16/5 जनरल एंड मिस्लेनिअस) जारी किया है. इसके खिलाफ 13 नवंबर को पश्चिम रेलवे के समस्त ईसीआरसी स्टाफ ने काला फीता बांधकर अपना विरोध जताते हुए पूरा दिन काम किया.

पश्चिम रेलवे मुंबई मंडल के एक आरक्षण केंद्र में काला फीता बांधकर अपनी ड्यूटी करते आरक्षण कर्मचारी.

रेल प्रशासन की इस नई व्यवस्था की खिलाफत न सिर्फ पश्चिम रेलवे का समस्त ईसीआरसी स्टाफ कर रहा है, बल्कि उनके साथ पश्चिम रेलवे के दोनों मान्यताप्राप्त संगठन, वेस्टर्न रेलवे मजदूर संघ (डब्ल्यूआरएमएस) एवं वेस्टर्न रेलवे एम्प्लाइज यूनियन (डब्ल्यूआरईयू), भी कर रहे हैं. उनका कहना है कि रेल प्रशासन अपनी मनमानी करने पर अड़ा हुआ है. इस संबंध में संपर्क किए जाने पर डब्ल्यूआरएमएस के महामंत्री जे. जी. माहुरकर और मुंबई मंडल के मंडल सचिव अजय सिंह ने ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि इस समस्या पर उन्होंने प्रशासन को कई पत्र लिखे हैं और डीआरएम से कई बार उनकी बैठक हो चुकी है, हर बार उनका यही आश्वासन होता है कि समस्या का समाधान किया जा रहा है. श्री सिंह ने यह भी कहा कि प्रशासन की यह मनमानी वह किसी भी तरह चलने नहीं देंगे, यदि जरुरत पड़ी तो वह इसके लिए किसी भी हद तक जाकर प्रशासन का विरोध करेंगे.

उधर डब्ल्यूआरईयू के विवेक गुप्ते और आर. के. गुप्ता का कहना है कि इस मामले में प्रशासन वास्तव में अपनी मनमानी करने पर तुला हुआ है. उन्होंने बताया कि आज भी मंडल में चल रही पीएनएम मीटिंग में उनका यह एजेंडा है. परंतु प्रशासन कोई पुख्ता और स्थाई हल नहीं निकाल रहा है. श्री गुप्ते ने बताया कि डब्ल्यूआरईयू और एआईआरएफ ने भी रेल प्रशासन को इस बारे में कई पत्र लिखे हैं. परंतु प्रशासन की लापरवाही के चलते आज मुंबई मंडल के सभी आरक्षण कर्मियों को प्रशासन के खिलाफ काला फीता लगाकर अपना विरोध जताने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी

अब नई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के साथ-साथ रेलवे क्रासिंग्स पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) और रोड अंडर ब्रिज (आरयूबी) का निर्माण किया जाएगा, जिसका पूरा खर्च भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा उठाया जाएगा, जबकि अब तक दोनों मंत्रालयों द्वारा इनका आधा-आधा खर्च उठाया जाता था. इन पुलों के निर्माण के लिए अब रेलवे से मंजूरी लेने की भी पाबंदी नहीं होगी. इस संबंध में सोमवार, 10 नवंबर को ही रेलमंत्री का पदभार संभालने के तुरंत बाद रेलमंत्री सुरेश प्रभु और भूतल परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गड़करी की उपस्थिति में दोनों मंत्रालयों के बीच सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इस सहमति पत्र के अनुसार इस योजना के तहत एक पोर्टल शुरू किया जाएगा, जिसमें रेलवे रोड ओवर एवं अंडर ब्रिज के ड्राइंग/डिजाइन उपलब्ध रहेंगे. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो काम दो-ढ़ाई साल में शुरू हो पाता था, वह मात्र दो-ढ़ाई महीने में शुरू हो सकेगा.

रेल मंत्रालय और भूतल परिवहन एवं महामार्ग मंत्रालय के बीच रेलवे लाईनों पर रोड ओवर ब्रिज और रोड अंडर ब्रिज बनाए जाने को लेकर हुए सहमति/समझौते पर हस्ताक्षर के अवसर पर 10 नवंबर को नई दिल्ली में दोनों मंत्रालयों के अधिकारियों को संबोधित करते हुए नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु. उनके साथ हैं भूतल परिवहन, जहाजरानी एवं महामार्ग मंत्री नितिन गड़करी और रेल राज्यमंत्री मनोज कुमार सिन्हा.

रेलवे को सुधारने के एजेंडे को अपने तरीके से लागू करेंगे सुरेश प्रभु

नए रेलमंत्री सुरेश प्रभु की हाई प्रोफाइल प्रतिभा की परीक्षा अब रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) को सुधारने में होने वाली है. श्री प्रभु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास विश्वासपात्र हैं, मगर मिले संकेतों के अनुसार वह श्री मोदी के रेलवे को सुधारने के एजेंडे को अपने तरीके से लागू करने वाले हैं. यह लगभग स्पष्ट है और इसकी उन्हें श्री मोदी से छूट भी मिली है. श्री प्रभु ने अगले एक वर्ष में किए जाने वाले प्रमुख कार्यों का खाका भी तैयार कर लिया है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री प्रभु ने रेलवे संबंधी श्री मोदी के विजन को लागू करने के लिए फिलहाल तीन प्रमुख लक्ष्य तय किए हैं. इनमें रेलवे बोर्ड का पुनर्गठन सबसे प्रमुख है. इसके अलावा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश से वित्त-पोषित होने वाली रेल परियोजनाओं की अड़चनों को दूर करने और हाई स्पीड रेल कॉरिडोर प्रोजेक्ट को समयबद्ध तरीके से पूरा करना शामिल है.

बतौर रेलमंत्री लगभग नाकारा साबित हुए सदानंद गौड़ा की जगह रेलमंत्री बनाए गए श्री प्रभु ने सोमवार, 10 नवंबर को रेल भवन पहुंचकर अपना पदभार संभालने के बाद कहा कि रेल यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और सुविधाएं बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी. उन्होंने कहा कि रेलवे में चुनौतियां बहुत हैं, खासकर यहां यात्री सुरक्षा, संरक्षा और ग्राहक संतुष्टि जैसे मामलों में बहुत सुधार किए जाने की जरुरत है.

नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ और ‘श्रमेव जयते’

नरसिंह कुमार*

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के साथ ही देश को तरक्की के रास्ते पर चलाने के नारे, ‘सबका साथ सबका विकास’ पर तीव्रता दिखाते हुए अपनी प्रशासकीय क्षमता का दुनिया को अहसास कराने के उद्देश्य से एक के बाद एक लगातार चीन, जापान और अमेरिका की यात्रा करके दुनिया के व्यापारियों, पूंजीपतियों को भारत आकर कारोबार करने का आमंत्रण दे रहे हैं कि आओ, भारत में व्यापार करो, आपकी राह में जो भी बाधाएं होंगी, वह दूर कर दी जाएंगी. इसी कड़ी में देशी और विदेशी पूंजीपतियों को श्रमिकों का मनमानी शोषण करने के लिए 30 जुलाई को केंद्रीय कैबिनेट ने श्रम कानूनों में 54 संशोधनों को पास कर दिया, जिसके तहत मुख्य रूप से फैक्ट्री एक्ट 1948, अप्रेंटिस एक्ट 1961 और लेबर एक्ट 1988 जैसे श्रम कानून शामिल हैं.

केंद्र में भाजपा सरकार द्वारा पिछले पांच-छह माह में दो बड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए. एक, मेक इन इंडिया और दूसरा श्रमेव जयते. दोनों ही कार्यक्रमों में कहा गया कि कार्य-कुशल मजदूरों, श्रमिकों से ही देश का विकास और देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित किया जा सकता है. परन्तु इसका दुखद पहलू यह है कि इन दोनों कार्यक्रमों में मजदूरों और मजदूर संघों के किसी भी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया. दोनों ही कार्यक्रम भारत के बड़े उद्योग समूहों के मालिकों एवं उनके प्रतिनिधियों का बड़ा जमावड़ा बन कर रह गए.

श्रमेव जयते के नाम पर शुरू हुए कार्यक्रम में सारे फैसले उद्योग समूहों के पक्ष में तथा श्रमिक विरोधी ही किए गए. इससे राजग समर्थित भाजपा सरकार का असली चेहरा उजागर हो गया. चुनाव से पहले अपनी सभाओं में भाजपा के नेता जो कहते फिरते थे, कि हम देश के किसानों, मजदूरों एवं मेहनतकश जनता के जरूरी सवालों को हल करेगें, भुखमरी एवं गरीबी से देश की जनता को निजात दिलाएंगे. परन्तु विज्ञान भवन में उद्योगपतियों के साथ बैठकर मेक इन इंडिया और श्रमेव जयते नाम के कार्यक्रमों में देश के मजदूरों और किसानों के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश रची गई.

उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाए -डी.पी.पांडेय, एमटी/रे.बो.

उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे एवं पूर्व मध्य रेलवे की समीक्षा बैठक गोरखपुर में संपन्न

मेंबर ट्रैफिक, रेलवे बोर्ड डी. पी. पांडेय ने 9 नवंबर को महाप्रबंधक बैठक कक्ष, गोरखपुर में उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे एवं पूर्व मध्य रेलवे के अधिकारियों के साथ संरक्षा, सुरक्षा, समय पालन, आय एवं यात्री सुविधाओं पर समीक्षा बैठक को सम्बोधित किया. इस अवसर पर अपर सदस्य/यातायात, रेलवे बोर्ड ए. के. मोइत्रा, मुख्य परिचालन प्रबंधक, उत्तर रेलवे मोहम्मद जमशेद, मुख्य परिचालन प्रबंधक, पूर्व मध्य रेलवे दीपक नाथ, मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे अरविन्द कुमार, मुख्य परिचालन प्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे, ज्ञान दत्त पांडेय, कार्यकारी निदेशक/टीटी(एफ) मनोज अखौरी तथा मंडल रेल प्रबंधक, लखनऊ अनूप कुमार एवं मंडल रेल प्रबंधक, इज्जतनगर चन्द्र मोहन जिन्दल सहित मंडलों एवं मुख्यालय के वरिष्ठ रेल अधिकारी उपस्थित थे.


समीक्षा बैठक को सम्बोधित करते हुए मेंबर ट्रैफिक डी. पी. पांडेय ने कहा कि रेल बजट में पूर्वोत्तर रेलवे पर अनेक परियोजनाओं की मंजूरी दी गई है. इन परियोजनाओं को विभिन्न चरणों में पूरा किया जाना है. श्री पांडेय ने उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए कम खर्च में अधिकतम कार्य करने का निर्देश दिया.

उन्होंने कहा कि दिन-प्रतिदिन गाड़ियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, यह अच्छी बात है, परन्तु इसके सापेक्ष आय में भी अपेक्षित वृद्धि होनी चाहिए. उन्होंने ड्राइवर एवं गार्ड की कमी होने पर उनकी भर्ती करने का निर्देश दिया. श्री पांडेय ने यह भी निर्देश दिया कि मालगाड़ियां बिना रुके चलाई जाएं, जिससे लाइनों का ब्लाकेज कम हो तथा मालगाड़ियां कम समय में गंतव्य पर पहुंच सकें. इससे आय में भी बढ़ोत्तरी होगी. उन्होंने कहा कि उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे एवं पूर्व मध्य रेलवे के अधिकारी आपसी सांमजस्य से परिचालनिक बाधाओं को दूर करें.

सूचना प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल से कदाचार को रोकने में बड़ी सहायता मिल सकती है -आर. के. गुप्ता, जीएम/पू.रे.

सभी रेलों में सतर्कता जागरूकता सप्ताह मनाया गया. इस अवसर पर पूर्व रेलवे, दक्षिण पूर्व रेलवे और मेट्रो रेलवे द्वारा संयुक्त रूप से ईस्टर्न रेलवे ऑफिसर्स क्लब, बेल्वेडेरे पार्क, कोलकाता में 31 अक्टूबर को ‘भ्रष्टाचार के उन्मूलन में प्रोद्योगिकी का संबल’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया. इस अवसर पर बड़ी संख्या में तीनों रेलों के रेल अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे.

सतर्कता जागरूकता सप्ताह के अवसर पर ‘भ्रष्टाचार के उन्मूलन में प्रोद्योगिकी का संबल’ विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक श्री आर. के. गुप्ता. मंच पर उपस्थित हैं पूर्व रेलवे के अपर महाप्रबंधक बी. के. पटेल, फाल्टा सेज के डेवलपमेंट कमिश्नर संजीव नंदवानी और पूर्व रेलवे के एसडीजीएम/सीवीओ यू. के. बल एवं द.पू.रे. की एसडीजीएम/सीवीओ तथा मेट्रो रेलवे की सीवीओ श्रीमती पी. लाहिरी.

पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक आर. के. गुप्ता ने इस मौके पर उपस्थित रेल अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी सरकारी संगठन से भ्रष्टाचार को समाप्त करने में उसके कर्मचारियों की दक्षता और निष्पक्षता की बहुत बड़ी भूमिका होती है. उन्होंने कहा कि सूचना तकनीक एवं प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल से भ्रष्ट गतिविधियों और कदाचार को रोकने तथा मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम करने में बड़ी सहायता मिल सकती है. उन्होंने इस मौके पर इस बात का भी उल्लेख किया कि पूर्व रेलवे ने इस प्रकार की विभिन्न गतिविधियों को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पहले ही सूचना तकनीक और प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.

प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेलवे में पारदर्शिता बढ़ेगी - न्‍यायमूर्ति वी. के. चतुर्वेदी

उत्‍तर मध्‍य रेलवे में सतर्कता जागरूकता सप्‍ताह मनाया गया

सरदार बल्‍लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर उत्‍तर मध्‍य रेलवे द्वारा 27 ओक्टोबर से 1 नवंबर तक सतर्कता जागरूकता सप्‍ताह मनाया गया. सतर्कता जागरूकता सप्‍ताह के अन्‍तर्गत 28 अक्टूबर को उत्‍तर मध्‍य रेलवे मुख्‍यालय में ‘भ्रष्‍टाचार से संघर्ष - प्रौद्योगिकी की समर्थक भूमिका’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस अवसर पर न्‍यायमूर्ति (से.नि.) इलाहाबाद हाईकोर्ट वी. के. चतुर्वेदी मुख्‍य आतिथि के रूप में उपस्थित थे. कार्यक्रम की अध्‍यक्षता महाप्रबन्‍धक उत्‍तर मध्‍य रेलवे प्रदीप कुमार ने की.

उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय, इलाहाबाद में सतर्कता जागरूकता सप्‍ताह के अवसर पर ‘भ्रष्‍टाचार से संघर्ष - प्रौद्योगिकी की समर्थक भूमिका’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति वी. के. चतुर्वेदी. उनके साथ हैं महाप्रबंधक/उ.म.रे. प्रदीप कुमार और उप महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी/उ.म.रे. संजीव स्वरूप.

संगोष्ठी के दौरान न्‍यायमूर्ति वी. के. चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में कहा कि भ्रष्‍टाचार हमारे समाज के लिए एक दीमक की भांति है, जो हमारे समाज को अन्‍दर ही अन्‍दर खोखला किए जा रहा है. उन्‍होंने कहा कि भ्रष्‍टाचार रोकने के लिए ऊपरी स्‍तर से प्रयास किया जाना अत्‍यधिक प्रभावी सिद्ध होगा. उन्‍होंने उत्‍तर मध्‍य रेलवे द्वारा भ्रष्‍टाचार से लड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों जैसे ई-टेण्‍डरिंग इत्‍यादि की सराहना की. उन्‍होंने कहा कि रेलवे में प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग से रेल उपभोक्‍ताओं एवं रेल प्रशासन के मध्‍य पारदर्शिता बढ़ेगी, इसके साथ ही भ्रष्‍टाचार की सम्‍भावनाएं न्यूनतम होंगी.

ध्यान बंटाने के लिए किया गया था मनोज कुमार सिंह को निलंबित

रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि पांच लाख की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ पकडे गए रेलवे बोर्ड के निदेशक/कोचिंग रवि मोहन शर्मा की घटना से ध्यान बंटाने के लिए लखनऊ मंडल, पूर्वोत्तर रेलवे के सीनियर डीसीएम मनोज कुमार सिंह को रेलवे राशि का गैर-इस्तेमाल करने के कथित आरोप में बिना सोचे-समझे और बिना किसी जांच के निलंबित किया गया था.

जबकि बताते हैं कि 14 अक्टूबर को कोचिंग से निकाली गई पहली 15 लाख की राशि में से 14.25 लाख रुपए 19 अक्टूबर को और 15 अक्टूबर को निकाली गई दूसरी 15 लाख की राशि में से 14.50 लाख रुपए 22 अक्टूबर को रेलवे के खाते में पुनः जमा कर दिए गए थे. बताते हैं कि पहली राशि में से 75,000 रुपए में से 25-25 हजार लेकर तीन अलग-अलग कर्मचारी तीन अलग-अलग स्थानों के लिए दुर्घटना में मृत लोगों को उनके चेक देने गए थे, जबकि दूसरी राशि में से 50,000 रुपए लेकर एक डीसीआई मालदा, पश्चिम बंगाल चेक देने गया हुआ था.

प्राप्त जानकारी के अनुसार इन चारों कर्मचारियों ने भी वापस आकर अपना हिसाब तो दे दिया है, मगर इस बार जांच और पूछताछ के डर से पहले तीन कर्मचारियों में से किसी ने 500 रु. तो किसी ने 1500 रु. ही अपना यात्रा खर्च दिखाया है, जबकि चौथे कर्मचारी ने 50,000 में से एक भी पैसा अपने यात्रा खर्च के तौर पर न दर्शा कर पूरा पैसा जमा कराया है. हालांकि इससे पहले यही कर्मचारी ऐसे मामलों में पचीसों हजार की राशि अपने यात्रा खर्च के तौर पर दर्शाते रहे हैं. इसकी भी जांच किए जाने की मांग की जा रही है.

भारतीय रेल को सुधारने और इसकी आय बढ़ाने हेतु ‘रेलवे समाचार’ के कुछ सुझाव

1. सबसे पहले इसके अफसरों की संख्या को घटाकर एक तिहाई किया जाना जरूरी है, क्योंकि जब पूरे देश को कुल मिलाकर करीब 3,000 से 3,500 आईएएस अफसर चला सकते हैं, तो भारतीय रेल में 18,000 से ज्यादा अफसरों के होने का कोई औचित्य नहीं है. हालत यह है कि भारतीय रेल में हायर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एचएजी) की कुल मिलाकर जहां 191 और सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) की कुल 1211 सेंक्शन पोस्टें हैं, वहीं इन दोनों हायर ग्रेड्स में क्रमशः 400 और 2000 अधिकारी कार्यरत हैं. जबकि इसके नीचे सीनियर स्केल औए जूनियर स्केल में तो स्थिति और भी ख़राब है. सवाल यह है कि मंजूर पदों से ज्यादा पद क्यों, कैसे और किसकी अनुमति से पैदा किए गए, इनकी लिए रेवेन्यु कहां से आ रही है? इससे जाहिर है कि खेत को मेढ़ ही खाए जा रही है.

2. भारतीय रेल में सिर्फ एक ही सर्विस ‘इंडियन रेलवे सर्विस’ लागू की जानी चाहिए, जिससे इसका विभागवाद खत्म होगा, जो कि इसकी बरबादी का प्रमुख कारण है.

3. भारतीय रेल के कमर्शियल विभाग को ट्रैफिक विभाग में, सिगनल एवं टेलीकम्युनिकेशन विभाग को इलेक्ट्रिकल विभाग में और कार्मिक, लेखा एवं भंडार विभाग को समाप्त करके इन्हें सभी संबंधित विभागों के साथ मर्ज कर दिया जाना चाहिए.

4. भारतीय रेल के जोनों की संख्या या तो 17 से घटाकर 7 की जानी चाहिए या फिर सभी जोनो को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि सारे नीतिगत निर्णय जब रेलवे बोर्ड से ही होते हैं और जोनो के स्तर पर कोई नीतिगत निर्णय लिया ही नहीं जाता है, तो ऐसे में 17 जोन रखने और इन पर हजारों करोड़ रुपए सालाना खर्च करने का कोई औचित्य नहीं है.

5. इसी प्रकार भारतीय रेल के करीब 68 डिवीजनों की संख्या को भी कम किए जाने की आवश्यकता है. इससे एक-एक विभाग में जो 7-7, 8-8 जे. ए. ग्रेड अधिकारी बैठे हैं, उनकी संख्या कम की जा सकेगी.

6. भारतीय रेल के 20-22 उपक्रमों - निगमों को भी समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि एक तो कुछेक को छोड़कर इनमें से ज्यादातर उपक्रम - निगम लाभ अर्जित नहीं कर रहे हैं और दूसरे यह सभी निगम एक्सेस रेल अधिकारियों के पुनर्वास का सिर्फ घोसला बनकर रह गए हैं.

डॉ. देबरॉय कमेटी में रेलवे साइड से कोई सक्षम रेल अधिकारी नहीं

रेल परियोजनाओं के लिए वित्तीय स्रोतों और रेल मंत्रालय एवं रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन पर सुझाव देने हेतु अर्थशास्त्री डॉ. बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में विशेषज्ञ कमेटी के गठन का नोटिफिकेशन (संख्या ईआरबी-1/2014/23/39) 22 सितंबर 2014 को जारी किया गया था. कमेटी के सदस्यों में पूर्व कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर, प्रॉक्टर एंड गैम्बल (पीएंडजी) इंडिया के पूर्व सीएमडी गुरुचरन दास, सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च (सीपीआर) के सीनियर फेलो प्रोफेसर पार्थ मुखोपाध्याय, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व एमडी रवि नारायण, पूर्व एफसी/रेलवेज राजेंद्र कश्यप हैं. इसमें अभी वित्त मंत्रालय के एक सदस्य का नामांकन किया जाना बाकी है. जबकि कमेटी के पदेन सचिव ईडीएमई(डब्ल्यू) रेलवे बोर्ड संजय चड्ढा को रखा गया है.

इस ‘पुनर्गठन विशेषज्ञ कमेटी’ के गठन के चार प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं. 1. रेलवे बोर्ड और इसके साथ ही इसके विभागों का पुनर्गठन किया जाना, जिससे नीति निर्माण और रेल परिचालन को अलग-अलग किया जा सके. 2. रेलवे और अन्य केंद्रीय विभागों के अधिकारियों की एक-दूसरे के यहां प्रतिनियुक्ति को बढ़ावा देना. 3. अंदरूनी और बाहरी दोनों स्रोतों से रेलवे की वित्तीय जरूरतों को पूरा किए जाने के उपाय सुझाना और रेलवे की वित्तीय जरूरतों का अनुमान लगाना. 4. रेल टैरिफ अथॉरिटी के गठन पर कैबिनेट के निर्णय का परिक्षण और इसके अमल के तौर-तरीकों का सुझाव.

कमी रेलवे के वर्तमान ढ़ांचे में नहीं, बल्कि नाकाबिल लोगों को प्रमोट किए जाने में है

रेलवे बोर्ड पुनर्गठन कमेटी की पहली बैठक संपन्न
अधिकारी-कर्मचारी संगठनों ने रेलवे बोर्ड के आमूलचूल ढांचागत बदलाव पर जताया विरोध
राजनीतिक कारणों से बीमार हुई रेलवे की अर्थव्यवस्था राजनीतिक स्तर पर ही सुधारी जाए

बड़ी रेल परियोजनाओं के लिए वित्तीय स्रोतों और रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) के पुनर्गठन पर सुझाव देने हेतु डॉ. बिबेक देबरॉय कमेटी की पहली बैठक बुधवार, 29 अक्टूबर को रेल भवन में संपन्न हुई. इस बैठक में शामिल हुए रेलवे के चार मान्यताप्राप्त संगठनों ने रेलवे बोर्ड के आमूलचूल ढांचागत बदलाव का विरोध करते हुए कहा है कि राजनीतिक कारणों से बीमार हुई भारतीय रेल की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए राजनीतिक उपाय ही किए जाने चाहिए. इस बैठक में ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के महामंत्री कॉ. शिवगोपाल मिश्रा, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन (एनएफआईआर) के महामंत्री एम. राघवैया, फेडरेशन ऑफ रेलवे ऑफिसर्स एसोसिएशन्स (एफआरओए) के महासचिव आर. आर. प्रसाद और इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के महामंत्री रमन कुमार शर्मा शामिल थे.

रेलवे के इन मान्यताप्राप्त संगठनों का मानना है कि रेल मंत्रालय और रेलवे बोर्ड के संगठनात्मक ढ़ांचे में संपूर्ण बदलाव किया जाना अविवेकपूर्ण होगा. उन्होंने यह भी कहा है कि इस बारे में कोई भी अंतिम निर्णय उन्हें विश्वास में लिए बिना नहीं लिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि रेलवे का पिछड़ापन और इसकी अर्थव्यवस्था खराब होने का कारण प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है. इसलिए इसका समाधान भी राजनीतिक स्तर पर ही किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपए की लागत वाली तमाम रेल परियोजनाएं वर्षों से लंबित हैं, लेकिन राजनीतिक कारणों के चलते वाणिज्यिक दृष्टि से पूरी तरह अव्यावहारिक इन रेल परियोजनाओं को समाप्त करने की हिम्मत कोई भी रेलमंत्री नहीं दिखा पा रहा है.

एआईआरएफ के महामंत्री कॉ. शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि हम सभी कर्मचारी और अधिकारी संगठनों की यह सर्वसम्मत राय है कि पिछले करीब डेढ़ सौ वर्षों में भारतीय रेल ने वर्तमान ढ़ांचे में ही बहुत प्रगति की है, इसकी अर्थव्यवस्था राजनीतिक कारणों से ही पिछड़ी है, इसलिए इन कारणों को राजनीतिक स्तर पर ही समझकर इनका समाधान किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था ख़राब होने का यह मतलब नहीं है कि पूरी रेलवे को ही बदलने की घातक प्रक्रिया अपनाई जाए. उन्होंने कहा कि रेलवे के लोगों को रेलवे की समस्याओं और उनके समाधान का पूरा ज्ञान एवं अनुभव है. अर्थव्यवस्था में सुधार और धन जुटाने के उपायों पर भी रेलवे संगठन अपनी राय दे सकते हैं, लेकिन यदि सरकार बिना रेल संगठनों से बात किए अपने स्तर पर इस मामले में आगे बढ़ेगी, तो रेल संगठन सरकार के इस प्रयास का पुरजोर विरोध करेंगे. उन्होंने लगभग चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि अगर सरकार उनकी बात नहीं मानती है, तो रेल संगठन अपनी बात मनवाने के लिए और कड़े कदम उठा सकते हैं.

डीओपीटी ने जीएम पैनल वापस भेजा, डीआरएम की पोस्टिंग में भी पंगा कायम

जीएम, डीआरएम की पोस्टिंग में अनिश्चितता कायम

एक अधिकारी के भयानक कदाचार और भीषण जोड़तोड़ तथा बाकी बोर्ड मेंबर्स के पूरी तरह निष्क्रिय हो जाने के चलते लगभग पूरा रेलवे बोर्ड नपुंशक होकर रह गया है. इसके परिणामस्वरूप अब तक न तो जीएम पैनल फाइनल हो पाया है और न ही दिसंबर 2013 के बाद से डीआरएम पोस्टिंग ही हो पाई हैं. जो जीएम पैनल 1 अप्रैल 2014 को सभी औपचारिकताओं के बाद फाइनली रेलवे बोर्ड के पास होना चाहिए था, वह अब तक रेलवे बोर्ड और डीओपीटी के बीच झूल रहा है और एक बार फिर 26 सितंबर की एसीसी की चिट्ठी के परिप्रेक्ष्य में वापस आ गया है.

जबकि डीआरएम के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहा मामला रेलवे बोर्ड के गले की हड्डी बन गया है. इस मामले में 30 अक्टूबर को पुनः सुनवाई होने वाली है. इस मामले में रेलवे बोर्ड ने एक तरफ झूठा हलफनामा दाखिल किया तो दूसरी तरह मंत्री को गुमराह करके उससे आईआरएसएसई को डीआरएम की पोस्टिंग से वंचित करने का अप्रूवल भी ले लिया है. जिस पर समस्त आईआरएसएसई अधिकारी न सिर्फ बुरी तरह खफा हैं, बल्कि उन्होंने एकजुट होकर इस अन्याय और जोड़तोड़ के खिलाफ लड़ने की तैयारी कर ली है. बताते हैं कि मंत्री को गुमराह और आईआरएसएसई को डीआरएम की पोस्टिंग से वंचित करने का यह महापाप वर्तमान सीआरबी ने किया है, जिससे पहले से ही सारे अधिकारी उत्पीड़ित हैं और उससे घोर घृणा करने लगे हैं.

जो जीएम पैनल सोशल मीडिया से ‘रेलवे समाचार’ को प्राप्त हुआ है, वह इस प्रकार है..
Sl.  Officre's Name            Cadre       Date of Birth     Date of Superannuation
1.   Mahesh Mangal             IRSSE         21.08.1956        31.08.2016
2.   Alok Dave                     IRSME        02.04.1956        30.04.2016
3.   A. K. Puthia                   IRSME        15.12.1956        31.12.2016
4.   Pankaj Jain                   IRSE           26.06.1956        30.06.2016
5.   A. K. Harit                     IRSE           28.08.1956        31.08.2016
6.   H. K. Kala                     IRSME        26.06.1956        30.06.2016
7.   Rajeev Mishra               IRSME        26.03.1957        31.03.2017
8.   G. C. Agrawal               IRSME        15.02.1957        28.02.2017
9.   Vashishtha Johari          IRSME        30.09.1957        30.09.2017
10. P. K. Agrawal                IRSME        07.06.1956        30.06.2016
11. S. Kabir Ahmed             IRSME        06.03.1956        31.03.2016
12. R. S. Kochak                 IRSME        02.07.1956        31.07.2016
13. S. Mukharjee                IRAS           04.11.1956        30.11.2016
14. A. K. Singhal                 IRSS           16.04.1957        30.04.2017
15. A. K. Mittal                   IRSE            22.07.1957        31.07.2017
16. A. K. Kapur                  IRSEE          09.02.1957        28.02.2017
17. Narottam Das              IRSEE          01.04.1956        31.03.2016
18. A. K. Saxena                IRSSE          26.01.1957        31.01.2017
19. Satyendra Kumar         IRSSE          14.01.1957        31.01.2017
20. S. S. Narayanan           IRSE            14.11.1956        30.11.2016
21. Laj Kumar                    IRSE            17.05.1956        31.05.2016
22. Surinder Kaul                IRSE            13.07.1957        31.07.2017
23. H. K. Jaggi                    IRSE            17.05.1957        31.05.2017
24. A. S. Garud                  IRSE             05.09.1956        30.09.2016
25. K. B. Nanda                  IRAS            22.10.1956        31.10.2016
26. A. K. Varshney             IRSS            06.07.1956        31.07.2016
27. R. P. Nibaria                 IRSEE          12.05.1957        31.05.2017
28. Debabrata Kamila        IRSME          12.03.1956        31.03.2016
29. B. L. Raikwar               IRSME          04.04.1956        30.04.2016

अब तक कुल मिलाकर 7 जीएम की पोस्ट खाली हो चुकी हैं, जिनमें से मेट्रो रेलवे, कोलकाता, रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन, इलाहाबाद, रेलवे व्हील फैक्ट्री, बंगलौर, डीजल लोकोमोटिव वर्कशॉप, वाराणसी, उत्तर रेलवे, दिल्ली, पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर और रेलवे स्टाफ कॉलेज, वड़ोदरा हैं. ज्ञातव्य है कि मेट्रो रेलवे के जीएम की पोस्ट पिछले करीब तीन साल से खाली है और एडहाक पर चल रही है, इसी से रेलवे बोर्ड की कार्य-क्षमता का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है. जबकि 31 दिसंबर तक कुछ एडिशनल मेंबर्स सहित कम से कम 8-10 जीएम की पोस्ट और खाली हो जाने वाली हैं. जबकि अब तक के परिदृश्य से ऐसा नहीं लग रहा है कि रेलवे बोर्ड तब तक जीएम पैनल को भी फाइनल कर पाएगा.

अपॉइंटमेंट कमेटी ऑफ द कैबिनेट (एसीसी) ने 26 सितंबर 2014 को एक पत्र (संख्या 23(5)ईओ/2014(एसीसी)) लिखकर रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) को निर्देश दिया है कि 1. बोर्ड मेंबर्स और जनरल मैनेजर्स की नियुक्ति संबंधी स्कीम/गाइडलाइन्स के फ़ाइनलाइजेशन में तेजी लाई जाए;

सीनियर डीसीएम मनोज कुमार सिंह के निलंबन का कोई औचित्य नहीं था !

सीसीएम को थी मामले की पूरी जानकारी, फिर भी जीएम के समक्ष अपने मातहत का नहीं कर सके बचाव
तीन-चार महीनों तक नहीं दिया जाता रहा है हिसाब, फिर भी कोई निलंबन नहीं हुआ, तो आज क्यों?
जीएम पर पक्षपात करने का आरोप, वस्तुस्थिति जाने बिना किया सीनियर डीसीएम का निलंबन

दिल्ली में डायरेक्टर/कोचिंग, रेलवे बोर्ड रवि मोहन शर्मा को एक टूर ऑपरेटर से पांच लाख की रिश्वत लेते हुए सीबीआई द्वारा 22 अक्टूबर को रंगेहाथ पकडे जाने की दहशत सुदूर पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर के जीएम और सीसीएम पर इतनी ज्यादा हावी हुई कि उन्होंने उसी दिन किसी तर्कसंगत कारण के बिना ही लखनऊ मंडल के सीनियर डीसीएम मनोज कुमार सिंह को रेलवे के 30 लाख रुपए की कथित हेराफेरी के आरोप में निलंबित करके उनकी तमाम इज्जत को कुछ ही पलों में मिट्टी में मिला दिया. जबकि दुर्घटनाग्रस्तों को आपातकालीन मदद के लिए रेलवे कोचिंग से निकाला गया उक्त पैसा रेलवे के खाते में वापस जमा हो चुका था. सीसीएम तो अपने मातहत का बचाव कर नहीं पाए, जबकि कथित तत्परता दिखाने वाले जीएम को वस्तुस्थिति जानने की कुछ नहीं पड़ी थी. ऐसे में बिना वस्तुस्थिति जाने सीनियर डीसीएम के निलंबन का कोई औचित्य नहीं था. यह प्रशासनिक मनमानी और उत्तरदायित्वविहीनता का सबसे ज्वलंत उदाहरण है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही में हुई दुर्घटना के घायलों और मृतकों के आश्रितों को अनुदान और मदद के लिए यह राशि रेलवे कोचिंग से निकलने का आदेश सीनियर डीसीएम मनोज सिंह ने उच्चाधिकारियों की सहमति से तब दिया था, जब रेल राज्यमंत्री हाल ही में लखनऊ आए थे. पता चला है कि मृतकों में से चार के आश्रितों को अब तक मदद नहीं पहुंच पाई थी, क्योंकि उनकी पहचान काफी देर से हुई थी. मंत्री के एयरपोर्ट निकलते ही एक डीसीआई ने करीब 15 लाख रुपए तुरंत रेलवे के खाते में जमा कर दिए थे, जबकि दूसरे डीसीआई की ड्यूटी मंत्री के प्रोटोकॉल में लगी होने और उसके तुरंत बाद एक मृतक के आश्रितों को चेक देने पश्चिम बंगाल चले जाने से उसके पास का हिसाब दो दिन बाद जमा हुआ. मगर किसी प्रकार भी एक पैसे की कोई हेराफेरी नहीं हुई है. मनोज कुमार सिंह के निलंबन को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इस बात की पुष्टि खुद कई अधिकारियों ने की है.

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