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मेट्रो रेलवे के लिए अपरिहार्य हैं डॉ. रुद्रेंदु भट्टाचार्य?    ||    संरक्षा में मैन पॉवर की कमी राष्ट्रद्रोह है!    ||    रेलमंत्री द्वारा बंगलौर सिटी रेलवे स्टेशन का औचक निरीक्षण    ||    पेशेवर रेल बजट, परंतु बेहतर मॉनिटरिंग की जरुरत    ||    बुलेट ट्रेन या हवाई जहाज? बहस होनी चाहिए!    ||    छुक-छुक से थोड़ी तेज चली गौड़ा की रेल    ||    भारतीय रेल को बदहाली से उबरने वाला रेल बजट    ||    भारतीय रेल पर टीवी चैनलों का ‘रूदाली’ स्वरूप, किसकी उम्मीद है बुलेट ट्रेन?    ||    रेल बजट में रेलकर्मियों की अनदेखी, कैसे सुनिश्चित होगी सेफ्टी?    ||    रेलवे की सेफ्टी सुनिश्चित करने में कितनी कारगर हैं सेफ्टी डिवाइस?    ||    यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और समयपालन सर्वोपरि है – आर. के. गुप्ता    ||    संरक्षा और रेल यात्रियों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता -महाप्रबंधक/उ.म.रे.    ||    महाप्रबंधक/प.म.रे. द्वारा भोपाल स्टेशन का गहन निरीक्षण    ||    उत्तर मध्य रेलवे की ‘गो इंडिया स्मार्ट कार्ड योजना’    ||    राजभाषा विभाग राजभाषा प्रगति हेतु सक्रियता कायम रखे -पी.के.श्रीवास्‍तव    ||    क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति की 33वीं बैठक सम्पन्न    ||    नौकरशाही की लगाम कसे बिना रेलवे का उद्धार संभव नहीं    ||    कौन करता है रेल किराए में वृद्धि का विरोध?    ||    सरकार को करनी चाहिए रेलवे को अत्याधुनिक बनाने की पहल    ||    वाह री इस देश की जनता !

Suresh Tripathi, Editor, 105, Doctor House, 1st Floor, Raheja Complex, Kalyan (West) - 421301. Distt. Thane (Maharashtra). Contact : 09869256875. Email : railwaysamachar@gmail.com

मेट्रो रेलवे के लिए अपरिहार्य हैं डॉ. रुद्रेंदु भट्टाचार्य?    ||    संरक्षा में मैन पॉवर की कमी राष्ट्रद्रोह है!    ||    रेलमंत्री द्वारा बंगलौर सिटी रेलवे स्टेशन का औचक निरीक्षण    ||    एनसीआरपीओए की दो दिवसीय वार्षिक सर्वसाधारण बैठक संपन्न    ||    पेशेवर रेल बजट, परंतु बेहतर मॉनिटरिंग की जरुरत    ||    बुलेट ट्रेन या हवाई जहाज? बहस होनी चाहिए!    ||    छुक-छुक से थोड़ी तेज चली गौड़ा की रेल    ||    भारतीय रेल को बदहाली से उबरने वाला रेल बजट    ||    भारतीय रेल पर टीवी चैनलों का ‘रूदाली’ स्वरूप, किसकी उम्मीद है बुलेट ट्रेन?    ||    रेल बजट में रेलकर्मियों की अनदेखी, कैसे सुनिश्चित होगी सेफ्टी?    ||    रेलवे की सेफ्टी सुनिश्चित करने में कितनी कारगर हैं सेफ्टी डिवाइस?    ||    यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और समयपालन सर्वोपरि है – आर. के. गुप्ता    ||    संरक्षा और रेल यात्रियों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता -महाप्रबंधक/उ.म.रे.    ||    महाप्रबंधक/प.म.रे. द्वारा भोपाल स्टेशन का गहन निरीक्षण    ||    उत्तर मध्य रेलवे की ‘गो इंडिया स्मार्ट कार्ड योजना’    ||    राजभाषा विभाग राजभाषा प्रगति हेतु सक्रियता कायम रखे -पी.के.श्रीवास्‍तव    ||    क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति की 33वीं बैठक सम्पन्न    ||    नौकरशाही की लगाम कसे बिना रेलवे का उद्धार संभव नहीं    ||    कौन करता है रेल किराए में वृद्धि का विरोध?    ||    सरकार को करनी चाहिए रेलवे को अत्याधुनिक बनाने की पहल

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मेट्रो रेलवे के लिए अपरिहार्य हैं डॉ. रुद्रेंदु भट्टाचार्य?

‘डॉ. रुद्रेंदु भट्टाचार्य मेट्रो रेलवे, कोलकाता के लिए अपरिहार्य (इंडिस्पेंसेबल) हैं, उन्हें फिलहाल उनकी वर्तमान पोस्ट से अन्यत्र रिलीव नहीं किया जा सकता है.’ कुछ इसी प्रकार की चिट्ठी मेट्रो रेल प्रशासन ने गत सप्ताह रेलवे बोर्ड को लिख भेजी है. परंतु पूर्व रेलवे और मेट्रो रेलवे के सभी डॉक्टर प्रशासन द्वारा इस प्रकार एक संदिग्ध विश्वसनीयता (डाउटफुल इंटीग्रिटी) वाले डॉक्टर को फेवर किए जाने से अत्यंत आश्चर्य चकित हैं. उनकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि डॉ. रुद्रेंदु भट्टाचार्य प्रशासन अथवा मेट्रो के लिए किस प्रकार से अपरिहार्य हैं? जबकि सीवीसी और रेलवे बोर्ड विजिलेंस द्वारा किया गया उनका यह तीसरा ट्रांसफर है.

उल्लेखनीय है कि डॉ. भट्टाचार्य का तबादला 23 जून को मेट्रो रेलवे से जमालपुर रेलवे हॉस्पिटल में सीएमएस की पोस्ट पर किया गया था. पहले उन्होंने अपने करप्ट पॉवर का इस्तेमाल करके 30 जून तक खुद को रिलीव नहीं होने दिया और इसी बीच 28 जून से 4 जुलाई तक एक फर्जी निरीक्षण कार्यक्रम बनाकर कोई फालतू निरीक्षण करने चले गए थे, जबकि अंडर-ट्रांसफर होने पर उनके कथित निरीक्षण कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि 30 जून के बाद मेट्रो का अतिरिक्त चार्ज उनके पुराने सरपरस्त को मिल गया.

संरक्षा में मैन पॉवर की कमी राष्ट्रद्रोह है!
यदि आंकड़े निकालें जाएं तो सर्वाधिक दुर्घटनाएं स्टेशन सीमा में ही होती हैं. ऐसा क्यों है? इसकी सच्चाई जानने का कभी प्रयास ही नहीं किया गया. इन दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण जीएंडएसआर का नियम 4.2 है. इस नियम को 100 वर्ष पूर्व तब बनाया गया था, जब सब कुछ मैन्युअल होता था और गाडिय़ों की संख्या बेहद कम थी. यानी संरक्षा काफी कम थी और 24 घंटे में स्टेशन से 2-4 गाडिय़ां ही गुजरती थीं. वर्तमान में हर स्टेशन के होम से एडवांस स्टार्टर तक सिग्नलों का जाल बिछा है, जिससे कन्फ्यूजन अधिक होता है. यार्ड, लूप की अनेक लाइनें उनमें खड़ी गाड़ियां, अधिकांश स्टेशनों पर कर्वेचर हैं, जिससे चालक को अपनी वास्तविक लाइन स्पष्ट नहीं होती. अपोजिट लाइन से गुजरती गाडिय़ां, लाइनों पर घूमते यात्री, जानवर, हॉकर्स कितनी भयावय स्थिति बना देते हैं. उस पर 105-140 की गति से चल रही गाड़ी में यह सब संभाला जाए या फिर सिग्नल एक्सचेंज किया जाए? जैसे ही स्टेशन आने को होता है चालक, सहायक चालक किसी कोने में, गड्ढे में बने या फिर ऊंचाई पर टंगे खड़े स्टेशन मास्टर तथा प्वाइंट्समैन को ढूंढना चालू करता है और उनके द्वारा दिखाए जाने वाले सिग्नल को ढूंढता है.
 
इस सबके चलते उसका ध्यान उपरोक्त वर्णित विषमतम परिस्थितियों से चूकता है और वो जिस दुर्घटना को अपनी तत्काल सूझबूझ से बचा या मिनिमाइज कर सकता है, नहीं कर पाता है. अत: इस पर गंभीर विचार कर वर्तमान में चल रहे सिग्नल एक्सचेंजिंग सिस्टम को तुरंत बंद कर उसे नए रूप में शुरू किया जाए. जो इस प्रकार होना चाहिए - प्रत्येक लोको में बाहर की सतह पर हरी बत्ती स्थाई तौर पर लगी हो तथा अंदर एक स्विच हो, जैसे ही स्टेशन सीमा में गाड़ी आए तो चालक अंदर लगे स्विच को ऑन कर दे. जिससे बाहर लगी हरी बत्ती जलने-बुझने लगेगी तथा चालक द्वारा बनाई जानेवाली विशेष प्रकार की सीटी चालक के चौकन्ना होने का संकेत देगी.
रेलमंत्री द्वारा बंगलौर सिटी रेलवे स्टेशन का औचक निरीक्षण

रेलमंत्री श्री डी. वी. सदानंद गौड़ा ने हाल ही में बंगलौर सिटी रेलवे स्टेशन का औचक निरीक्षण किया. उन्होंने स्टेशन पर उपलब्ध टिकट बुकिंग कार्यालय, पानी के नल, एस्केलेटर्स, फ़ूड प्लाजा, डारमेट्री, पेड लाउन्ज, टॉयलेट्स, इमरजेंसी मेडिकल सेंटर, आरक्षण कार्यालय सहित कई खानपान स्टालों आदि तमाम यात्री सुविधाओं का गहन निरीक्षण किया. इसके अलावा उन्होंने स्टेशन पर साफ-सफाई एवं अन्य सुविधाओं का भी निरीक्षण किया.

इसके साथ ही उन्होंने कई यात्रियों से इस संबंध में बातचीत भी की और कुछ जरुरी सुधार किए जाने का भी सुझाव दिया. उनके साथ इस अवसर पर उपस्थित बंगलौर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री अनिल कुमार अग्रवाल ने रेलमंत्री द्वारा दिए गए सभी सुझाओं को नोट करते हुए उन पर तुरंत संज्ञान लेने की बात कही है.

बंगलौर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री अनिल कुमार अग्रवाल एवं अन्य रेल अधिकारियों के साथ बंगलौर सिटी रेलवे का पहले बाहर और बाद में अंदर का निरीक्षण करते हुए रेलमंत्री श्री सदानंद गौड़ा.

एनसीआरपीओए की दो दिवसीय वार्षिक सर्वसाधारण बैठक संपन्न

उत्‍तर मध्‍य रेलवे पदोन्‍नत अधिकारी संघ (एनसीआरपीओए) की दो दिवसीय वार्षिक सर्वसाधारण बैठक 17 जुलाई को रेलवे अधिकारी क्लब, इलाहाबाद में संघ के अध्‍यक्ष श्री एस. एस. सिंह महासचिव श्री एस. एस. पाराशर की उपस्थिति में संपन्न हुई. अपने सम्‍बोधन में अध्‍यक्ष श्री एस. एस. सिंह ने उत्‍तर मध्‍य रेलवे के मुख्‍यालय, तीनों मण्‍डलों एवं कारखानों से आये सभी प्रतिनिधियों का स्‍वागत किया. इस दौरान उन्‍होने विभिन्‍न मुददों एवं रेल के समक्ष आ रही नई चुनौतियों पर चर्चा की.

उत्‍तर मध्‍य रेलवे पदोन्‍नत अधिकारी संघ की दो दिवसीय वार्षिक सर्वसाधारण बैठक को संबोधित करते हुए महासचिव श्री एस. एस. पारासर. उनके साथ हैं संघ के अध्यक्ष श्री एस. एस. सिंह एवं उपाध्यक्ष श्री एम. एन. सिंह.

इस अवसर पर संघ के महासचिव श्री एस. एस. पाराशर ने अपने सम्‍बोधन में पदोन्‍नत अधिकारियों के समक्ष आने वाली कठिनाईयों और चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि हम सबको रेल की कार्य प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करना होता है. इस हेतु हमें भारतीय रेल के सम्‍मानित ग्राहकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिये निरंतर कठिन परिश्रम से कार्य करना होता है. साथ ही हम सब को अपने अधिकारों और हितों के प्रति सचेत रहने की भी आवश्‍यकता है.

पेशेवर रेल बजट, परंतु बेहतर मॉनिटरिंग की जरुरत

सुरेश त्रिपाठी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के पहले रेल बजट को यात्री उन्मुख और पेशेवर रेल बजट की संज्ञा दी जा सकती है. रेलमंत्री सदानंद गौड़ा द्वारा संसद में 8 जुलाई को पेश किए गए इस रेल बजट का विस्तृत अध्ययन करने से पता चलता है कि इसमें भारतीय रेल को नौकरशाही की जकड़न से निकालकर इसे आधुनिक और पेशेवर बनाने की पहल की गई है. मोदी ने जिस तरह से रेलवे बोर्ड की नौकरशाही को दरकिनार करके अपनी देखरेख में रेलवे का यह बजट तैयार करवाया है, उसकी साफ झलक इसमें दिखाई दे रही है. इसके अलावा भी बजट के पहले और बाद में जिस तरह रेलवे बोर्ड की नौकरशाही को दुम हिलाते देखा गया, उससे भी जाहिर है कि मोदी के नेतृत्व में इस पर काफी हद तक लगाम कसी जाएगी और रेलवे को राजनीतिक दोहन तथा नौकरशाही के कुचक्र से उबारकर यात्री एवं विकासोन्मुख बनाया जाएगा.

अभी हाल ही में जब मोदी सरकार ने यात्री किराए और माल भाड़े में समुचित वृद्धि की घोषणा की थी, तब ऐसा लगा था कि जरुर सरकार द्वारा लोकलुभावन रेल बजट लाने की तैयारी की जा रही है. ऐसा पहले भी होता रहा है. मगर इस रेल बजट में ऐसी किसी कोशिश से पूरी तरह बचा गया है. इस बजट में न ही किसी प्रदेश विशेष पर अतिरिक्त मेहरबानी दिखाई गई है, और न ही ऐसी किसी हवाई योजनाओं की घोषणा की गई है, जैसा कि पहले के रेल बजटों में और अब तक किया जाता रहा है.

इस रेल बजट में हवाई योजनाओं की घोषणा के बजाय पुरानी लंबित पड़ी रेल परियोजनाओं को पूरा करने का संकल्प व्यक्त किया गया है, जो कि मोदी सरकार के काम करके दिखाने के वादे को दर्शाता है. इस रेल बजट में पहली बार काफी ठोस, परिणामी और व्यावहारिक बातें कही गई हैं. क्योंकि इधर काफी अर्से से जिस तरह रेलवे को लेकर यात्रियों का मोह भंग होता जा रहा था, उसे देखते हुए रेलवे पर उनके विश्वास और भरोसे को बनाए रखने के लिए यह अत्यंत जरुरी था कि रेल बजट में सरकार द्वारा इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता. इस रेल बजट में यह भरोसा दिलाया गया है कि यात्रा के समय उन्हें साफ-सुथरे कोच, गुणवत्तापूर्ण खाना और अन्य बेहतर यात्री सेवाएं मिलेंगी. अब उन्हें तमाम तरह के कष्ट नहीं झेलना पड़ेगा.

बुलेट ट्रेन या हवाई जहाज? बहस होनी चाहिए!

वर्तमान में 9 कोच की बुलेट ट्रेन की लागत 60 हजार करोड़ रुपए है, जबकि 17 कोच की राजधानी एक्सप्रेस की लागत 75 करोड़ रुपए है. इसका मतलब यह है कि एक बुलेट ट्रेन के बदले 800 राजधानी एक्सप्रेस चलाई जा सकती हैं. 8 जुलाई को संसद में रेल बजट पेश होने के बाद यह वार्तालाप सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्सएप पर खूब शेयर किया गया है. इसमें आगे यह सवाल उठाया गया है कि तेज रफ्तार किसे चाहिए, और किसलिए चाहिए, अगर चाहिए भी तो क्यों? क्योंकि वर्तमान में जिस दूरी के लिए बुलेट ट्रेन चलाए जाने की योजना बनाई जा रही है, बुलेट ट्रेन के सफर में उतनी दूरी के लिए चीन में 7500 रुपए लगते हैं. इसका मतलब यह है कि बुलेट ट्रेन का किराया हवाई जहाज के किराए से भी ज्यादा है. जिस दिन यह बुलेट ट्रेन धरातल पर आएगी, उस दिन के इसके किराए की तो बात ही छोड़ दें, क्योंकि उसकी कल्पना आज कर पाना मुश्किल है. परंतु आज इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस बुलेट ट्रेन में वह लोग ही सफर करेंगे, जो आज हवाई जहाज में सफर कर रहे हैं.

अब बात उठती है बुलेट ट्रेन की लागत और इसके इंतजाम की. तो यहां सवाल यह उठता है कि सिर्फ बुलेट ट्रेन के मिर्माण के लिए 60 हजार करोड़ रुपए कहां से आएंगे? हालांकि इसके लिए रेल बजट में इसकी फंडिंग विदेशी पूंजी निवेश और पीपीपी के जरिए किए जाने की बात गई है, मगर क्या इसके सफल हो जाने पे प्रति सरकार पूरी तरह से सुनिश्चित है? लोगों का यह भी कहना है कि जब प्रस्तावित बुलेट ट्रेन का उपयोग देश का एक ख़ास तबका ही करेगा, तो जापान से इसके निर्माण हेतु लिए जाने वाले कर्ज का भार ख़ास तबका ही उठाए, पूरा देश क्यों?

छुक-छुक से थोड़ी तेज चली गौड़ा की रेल

यहां से आगे का रास्ता पटरी छोड़कर हवा से बातें करने का है..
भारतीय रेल के साथ अगर भारत सरकार की साख न जुड़ी होती, तो एक बीमार कंपनी घोषित करके न जाने कब का इसमें ताला ठोंक दिया होता
अनुभव बताता है कि सिर्फ ठेकेदारों को छोड़कर अब तक जिसने भी रेलवे के धंधे में पैसा लगाया, उसे पछतावे के सिवा और कुछ हासिल नहीं हुआ
भारतीय रेल की टॉप ब्यूरोक्रेसी को प्रोजेक्ट और प्रॉफिट ओरिएंटेड सोच का आदि बनाना होगा

चंद्रभूषण

सदानंद गौड़ा की ख्याति एक प्रखर वक्ता या किसी विजनरी नेता जैसी कभी नहीं रही है. कर्नाटक में उनकी ताजपोशी येदियुरप्पा के खडाऊं के तौर पर हुई थी. बतौर रेलमंत्री अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे पढ़कर उन्होंने यह साबित किया कि खडाऊं से बेहतर कुछ बनने की जल्दबाजी उनमें आज भी नहीं है. एक नेता के रूप में यह बात शायद बहुत अच्छी न हो, लेकिन रेलमंत्री के रूप में यह मिजाज आगे चलकर उनके लिए काफी काम का साबित होगा. भारत को अभी एक ऐसा रेलमंत्री चाहिए, जो कम से कम तीन-चार साल अपनी महत्वाकांक्षाओं को ताक पर रखकर चुपचाप भारतीय रेल के पुनरुद्धार के लिए काम करता रहे. ऐसा ही मिजाज दो साल पहले दिनेश त्रिवेदी में दिखा था, लेकिन उनकी पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने उनकी अथक मेहनत का सिला यह दिया कि रेलमंत्री के पद से उनका पत्ता उनके रेल बजट भाषण के अगले ही दिन काट दिया था.

घोषणा और सिर्फ घोषणा

इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय रेल के साथ अगर भारत सरकार की साख न जुड़ी होती, तो एक बीमार कंपनी घोषित करके न जाने कब का इसमें ताला ठोंक दिया गया होता. इस बार के रेल बजट भाषण की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें रेलवे की बीमारी की पूरी डायग्नोसिस मौजूद थी. वर्ष 2012 में जिन लोगों ने दिनेश त्रिवेदी का रेल बजट ध्यान से सुना होगा, उन्हें अवश्य याद होगा कि कुछ कम सख्त शब्दों में यह बात वहां भी मौजूद थी. लेकिन सदानंद गौड़ा का रेल बजट भाषण इस मामले में अल्टीमेट कहा जाएगा. पिछली घोषणाओं पर अमल किए जाने की परवाह किए बगैर नई घोषणाएं करते जाने की प्रवृत्ति का खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले 30 वर्षों में 1,57,883 करोड़ रुपए की लागत वाली रेल परियोजनाएं घोषित की गईं थीं, जिनमें आधी से भी कम अब तक पूरी हो पाई हैं. यह भी कि ये अधूरी परियोजनाएं पूरी करने के लिए अभी-भी वर्तमान लागत के मुताबिक 1,82,000 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे.

भारतीय रेल को बदहाली से उबरने वाला रेल बजट

बुलेट युग में प्रवेश के लिए तैयार भारतीय रेल

रेलमंत्री श्री सदानंद गौड़ा ने मंगलवार, 8 जुलाई को संसद में मोदी सरकार का पहला रेल बजट पेश करते हुए नई और लोकलुभावन घोषणाएं करने के बजाय पुरानी और अधूरी पड़ी रेल परियोजनाओं को पूरा करने पर जोर दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि वह तालियां बटोरने के बजाय वास्तविक स्थिति देखकर काम करना चाहते हैं. रेल बजट में उनका पूरा जोर आईटी और नई टेक्नोलॉजी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करके भारतीय रेल को आधुनिक और यात्री उन्मुख बनाने पर रहा है.

रेलमंत्री ने अपने इस बजट में भारत को बुलेट ट्रेन के युग में ले जाने की योजना भी पेश की है. उन्होंने मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन का प्रस्ताव रखा है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि केवल एक बुलेट ट्रेन चलाने के लिए ही 60 हजार करोड़ रुपए की जरुरत होगी. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान देश में बुलेट ट्रेन लाने पर काफी फोकस किया था. बजट प्रस्तुत करते हुए रेलमंत्री ने कहा कि स्वर्णिम चतुर्भुज नेटवर्क को पूरा करने के लिए 9 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की धनराशि की जरुरत होगी. उन्होंने यह भी कहा कि मैं यह धनराशि जुटाने के लिए रेल यात्री किराए और माल भाड़े में वृद्धि तथा सामान्य जनता पर बोझ डालने पर ही निर्भर नहीं कर सकता हूँ? यह सरासर अवास्तविक स्थिति होगी. मुझे इसके लिए संसाधन जुटाने हेतु परंपरागत तरीकों से हटकर कुछ वैकल्पिक तरीके तलाशने होंगे.

भारतीय रेल पर टीवी चैनलों का ‘रूदाली’ स्वरूप, किसकी उम्मीद है बुलेट ट्रेन?

सुरेश त्रिपाठी

पिछले दो-तीन दिनों में टीवी के सामने बैठा दर्शक भारतीय रेल को लेकर पर्याप्त रूप से शर्मिंदा हो चुका होगा. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तमाम रिपोर्टर/एंकर भारतीय रेल के ज़र्रे-ज़र्रे का माखौल उड़ाते दिखे, जैसे ये भारतीय रेल न होकर कोई कबाड़खाना हो. टीवी चैनलों के बंदरछाप रिपोर्टर यह साबित करने में अपनी नीचे से लेकर ऊपर तक की सारी ऊर्जा इस बात पर खर्च करते दिखे कि दुनिया की सबसे गई-गुज़री रेल अगर कोई है, तो वो भारतीय रेल ही है? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रिपोर्टर/एंकर पहले भारतीय पटरियों का मुआयना करने निकले. खाने से लेकर कटी-फटी सीट दिखाकर टीवी स्क्रीन पर छाती पीटने का क्रम जारी रहा. इस बेकार रेल को अगर इंतज़ार है, तो सिर्फ और सिर्फ मोदी का. रेलमंत्री तो संसद में सिर्फ फाइल लेकर बजट पढ़ने जा रहे हैं. चैनलों के सूचना विशेषज्ञों पर मोदी का रेल बजट हावी रहा है, गौड़ा की गाड़ी तो सिर्फ नाम भर की है. अच्छा ही है, प्रधानमंत्री की मुहर लग जाने से फैसले ज्यादा विश्वसनीय हो जाते हैं.

परंतु इस प्रक्रिया में हम एक चीज़ नहीं देख पा रहे हैं कि इन मतिभ्रष्ट टीवी चैनलों द्वारा जापान, फ्रांस जैसे अति-विकसित मगर कम आबादी वाले मुल्कों की चंद ट्रेनों को दिखा-दिखाकर रेल के मामले में भारत के साक्षात अनुभवों को ठुकराया जा रहा है. चैनलों द्वारा भारतीय रेल के ट्रैक से लेकर कोच के भीतर तक के हर शॉट को ऐसे पेश किया जा रहा है, जैसे ये ट्रेन चल कैसे रही है, इसे तो अभी पलट जाना चाहिए? यह अभी तक पलट क्यों नहीं गई, यही आश्चर्य उन्हें हो रहा था? रेल बजट के कारण हिंदी-अंग्रेजी के विभिन्न चैनलों का दिव्य दर्शन करने बैठे इस देश के प्रत्येक नागरिक को अचानक यह सदमा अवश्य ही लगा होगा कि वह भारत में क्यों है, फ्रांस-जापान-चीन में क्यों नहीं है? उसे यह भी अहसास हुआ होगा कि रेलवे के मामले में इस देश के सारे अनुभव रद्दी की टोकरी में फेंक देने लायक हैं, स्वर्ग तो जापान में है, और इंद्रलोक बुलेट ट्रेन में!

रेल बजट में रेलकर्मियों की अनदेखी, कैसे सुनिश्चित होगी सेफ्टी?

रेलमंत्री श्री डी. वी. सदानंद गौड़ा को भारतीय जनता पार्टी के पहले रेलमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ है. इससे पहले जब श्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी, तब रेल मंत्रालय दूसरों के हिस्से में चला गया था. लेकिन इस बार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी केंद्र सरकार में रेल मंत्रालय भाजपा के खाते में आया है. भाजपा के रेल मंत्री श्री सदानंद गौड़ा ने 8 जुलाई को संसद में रेल बजट पेश करते हुए अपने दायित्व का निर्वहन किया है. नार्दन रेलवे एम्प्लाईज़ यूनियन (एनआरईयू) के अध्यक्ष एवं इंडियन रेलवे एम्प्लाईज़ फेडरेशन (आईआरईएफ) के उपाध्यक्ष श्री नरसिंह कुमार का कहना है कि रेल बजट का अवलोकन करने से साफ पता चलता है कि प्रधनमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की आकांक्षाओं पर आधारित यह रेल बजट भी पूर्ववर्ती सरकारों के बजट से अलग नहीं है, बल्कि यह अपनी जिम्मेदारियों से दूर होने को प्रमाणित करता प्रतीत होता है, जिसमें रेलवे के तमाम कामों की जिम्मेदारी पीपीपी एवं निजी क्षेत्रों या फिर विदेशी निवेशकों के सहारे पूरा करना तय किया गया है.

श्री नरसिंह कुमार ने ‘रेलवे समाचार’ को भेजी गई अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया में कहा है कि सभी नई सरकारें पूर्ववर्ती सरकार पर तमाम खामियों की जिम्मेदारी थोपकर रेलवे को घाटे में जाने का राग अलापकर कुछ नया करने का दावा करती हैं, जबकि हर तीन माह बाद जारी होने वाले सरकारी आंकड़े बताते हैं कि रेलवे कभी भी घाटे में नहीं रही. लेकिन प्रशासनिक पूंजीवादी नीतियों और निर्णयों के कारण रेलवे को ठेकेदारी प्रथा के दलदल में झोंकने से रेलवे की लूट-खसोट बढ़ी है. ऐसे में सवाल उठता है कि रेल मंत्री श्री सदानन्द गौडा़ इस बजट के माध्यम से क्या कुछ नया कर पाये हैं? यह सच है कि रेलमंत्री गौड़ा को अपना बजट तैयार करने का पर्याप्त समय नहीं मिला, लेकिन नए रेलमंत्री सदानन्द गौड़ा ने भी पूर्ववर्ती सभी रेलमत्रियों की तरह ही 58 नई रेल गाड़ियों की घोषणा करके रेल कर्मचारियों पर और ज्यादा कार्य का बोझ बढ़ा दिया है. जबकि पहले से ही चल रही और इन नई गाड़ियों का सुरक्षित संचालन एवं रखरखाव करने वाले कर्मचारियों की संख्या में कोई भी बढोत्तरी का संकेत नहीं दिया है. उन्होंने 17 हजार आरपीएफ कर्मचारियों की भर्ती की बात जरूर कही है, लेकिन आरपीएफ की सुरक्षा की ड्यूटी केवल ट्रेन के अंदर है, और बाहर यह जिम्मेदारी राज्य सरकार की है.

रेलवे की सेफ्टी सुनिश्चित करने में कितनी कारगर हैं सेफ्टी डिवाइस?

संरक्षा के नाम पर भारतीय रेल में सैकड़ों करोड़ रुपए का प्रतिवर्ष खर्च होते हैं. मगर ऐसा लगता है कि रेलवे में अन्य विभागों की तरह ही सेफ्टी डिपार्टमेंट भी कुछ असंतुष्ट अधिकारियों को साइड लाइन करने का एक विभाग बनकर रह गया है. क्योंकि अक्सर यह देखने में आया है कि चार्जशीटेड अथवा विजिलेंस की जांच के अधीन चल रहे अधिकारियों को सेफ्टी में लगा दिया जाता है. कहने को तो सेफ्टी डिपार्टमेंट के पास बहुत सारे अधिकार हैं, मगर किसी बड़े से बड़े संरक्षा अधिकारी की भी एक पीडब्ल्यूआई के सामने तब कुछ नहीं चल पाती है, जब वह जगह-जगह रेड-फ्लैग लगा देता है. वर्तमान में सेफ्टी के नाम पर लोको में लगी विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस (वीसीडी) तथा ईएमयू में लगे एडवांस वार्निंग सिस्टम (एडब्ल्यूएस) कभी भी सिग्नल पासिंग को नहीं रोक पाते और न ही यह डिवाइस एक्सीडेंट रोकने में कामयाब हैं.

ईएमयू में लगे एडब्ल्यूएस के वर्किंग में होने के बावजूद मोटरमैन 40 किमी. की गति से (38 से 43 किमी प्रति घंटा) सिग्नल पास करेगा, यानी रेड सिग्नल से करीब 150-200 मीटर तक आगे जाकर गाड़ी रुकेगी. जबकि 400 मीटर की सिग्नलिंग के सबर्बन सेक्शन में गाड़ी रेड सिग्नल से 120 मीटर आगे खड़ी होगी, यानी एक्सीडेंट सुनिश्चित है. या फिर सिग्नल से तुरंत लगे क्रॉस ओवर से कोई अन्य गाड़ी निकल रही होगी, तो उससे टकरा जाएगी. इससे एकदम साफ है कि संरक्षा की दृष्टि से एडब्ल्यूएस एकदम बेकार है. इस पर करोड़ों का खर्च जरुर किया गया है, लेकिन वास्तव में संरक्षा का सारा दारोमदार चालक पर ही होता है. यह रेल प्रशासन भली-भांति जानता है, पर स्वीकार नहीं करता.

यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और समयपालन सर्वोपरि है – आर. के. गुप्ता

‘रेल परिचालन में यात्रियों की सुरक्षा, संरक्षा और गाड़ियों का समयपालन सर्वोपरि है, इस बात का हम सभी को पूरी तरह से ख्याल रखना चाहिए.’ यह बात पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक श्री आर. के गुप्ता ने हाल ही में पूर्व रेलवे मुख्यालय, फेयरली प्लेस में आयोजित ‘प्रेम ग्रुप’ की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कही. इस अवसर पर पूर्व रेल की मान्यताप्राप्त यूनियनों, अधिकारी संगठनों के पदाधिकारी और पूर्व रेलवे के सभी विभाग प्रमुख उपस्थित थे. बैठक में पूर्व रेलवे द्वारा प्राप्त की गई उपलब्धियों और किए जा रहे विकाश कार्यों पर चर्चा की गई. इसके अलावा कर्मचारी प्रतिनिधियों और विभाग प्रमुखों ने इन उपलब्धियों को बढ़ाने पर कई अच्छे सुझाव भी दिए. महाप्रबंधक ने कहा कि उनके सुझावों के अनुसार सम्बंधित विषयों पर गहन परीक्षण एवं अध्ययन के बाद अमल किया जाएगा.

पूर्व रेलवे मुख्यालय, फेयरली प्लेस में ‘प्रेम ग्रुप’ की बैठक को संबोधित करते हुए पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक श्री आर. के गुप्ता. बैठक में उपस्थित मान्यताप्राप्त यूनियनों, अधिकारी संगठनों के पदाधिकारी और पूर्व रेलवे के सभी विभाग प्रमुख.

इस अवसर पर महाप्रबंधक श्री गुप्ता ने सभी उपस्थित कर्मचारी प्रतिनिधियों एवं विभाग प्रमुखों से कहा कि बेहतर और सरल कार्य वातावरण बनाने के लिए सभी लोग आपसी समन्वय कायम करें, जिससे यात्रियों को भी बेहतर सुविधाएं मुहैया कराई जा सकेंगी. उन्होंने इस आपसी समन्वय से मेल/एक्स. और लोकल गाड़ियों के सुरक्षित, संरक्षित एवं समयानुसार परिचालन पर जोर देते हुए कहा कि इससे उपलब्ध स्रोतों एवं संसाधनों से ही हम अपने यात्रियों को और ज्यादा बेहतर सुविधाएं प्रदान कर सकते हैं.

संरक्षा और रेल यात्रियों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता -महाप्रबंधक/उ.म.रे.

उत्‍तर मध्‍य रेलवे के महाप्रबंधक श्री प्रदीप कुमार ने तीनों मंडलों के मंडल रेल प्रबंधकों सहित मुख्‍यालय के सभी विभाग प्रमुखों एवं मंडल के शाखा अधिकारी को हाल ही में टेली कान्‍फ्रेन्सिंग के माध्‍यम से आयोजित समन्‍वय बैठक में 19 जून को रेल मंत्रालय दिल्‍ली में रेलमंत्री श्री सदानन्‍द गौड़ा द्वारा दिए गए निर्देशों से अवगत कराया. श्री प्रदीप कुमार ने कहा कि भारतीय रेल को विश्‍व स्‍तरीय बनाने के लिए हम सबको अपनी कार्य-प्रणाली को और अधिक उत्‍तरदायी बनाने की आवश्‍यकता है. उन्‍होंने यह भी कहा कि रेल परिचालन में संरक्षा और रेल यात्रियों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता के रूप में लेना होगा. उन्‍होंने कहा कि स्‍टेशनों और रेलगाडि़यों में अधिक साफ-सफाई, उच्‍च गुणवत्‍ता वाली खाद्य सामग्री की उपलब्‍धता, स्‍टेशनों पर बेहतर पेयजल व्‍यवस्‍था तथा सभी नीतियों का यात्रियों को ध्‍यान में रखकर निर्माण एवं अनुपालन करना सुनिश्चित करना होगा.

इसके अतिरिक्‍त उन्‍होंने सभी कार्यों को समयबद्ध तरीके से क्रियान्वित करने पर भी जोर दिया. श्री प्रदीप कुमार ने बताया कि मंडल मण्‍डल रेल प्रबंधकों को अधिक अधिकार देने की बात रेलमंत्री ने कही है. उन्होंने कहा कि अधिक अधिकारों के साथ-साथ जिम्‍मेदारियां भी बढ़ेंगी और इसके निर्वहन के लिए हम सभी को तत्‍पर रहना होगा. श्री प्रदीप कुमार ने रेल मंत्रालय की आगामी योजनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि तीव्र गति की रेल गाड़ियों संबंधी योजनाओं पर भी बैठक में गंभीर चर्चा हुई है. उन्होंने अनारक्षित टिकटों की मोबाईल द्वारा बुकिंग की योजना के बारे में बताते हुए कहा कि इस योजना के लागू हो जाने से यात्रियों को आसानी होगी और साथ ही उनके समय की भी बचत होगी. बैठक में उत्‍तर मध्‍य रेलवे मुख्‍यालय के सभी विभागों के विभाग प्रमुख तथा तीनों मंडलों के मंडल रेल प्रबंधक अपने-अपने मंडलों के शाखा अधिकारियों के साथ उपस्थित थे.

महाप्रबंधक/प.म.रे. द्वारा भोपाल स्टेशन का गहन निरीक्षण

पश्चिम मध्य रेल के महाप्रबंधक श्री रमेश चन्द्रा ने हाल ही में भोपाल रेलवे स्टेशन का गहन निरीक्षण किया. यह रेल मंत्रालय, रेलवे बोर्ड द्वारा रेलवे स्टेशनों एवं रेलवे परिसर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने के निर्देशों के अंतर्गत किया गया है. निरीक्षण के दौरान महाप्रबंधक ने प्लेटफार्मो, वाशेबल एप्रन, पार्किंग, सरकुलेटिंग एरिया तथा जल निकासी व्यवस्था के रख-रखाव एवं सफाई पर विशेष जोर देने के निर्देश दिए. महाप्रबंधक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि रेलवे स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं के रख-रखाव एवं सफाई में लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों एवं अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही की जाए.

निरीक्षण के दौरान श्री चन्द्रा ने भोपाल स्टेशन पर रेल यात्री सुविधाओं जिसमें प्लेटफार्म नम्बर-1 एवं 6ए उच्च श्रेणी प्रतीक्षालय, महिला यात्री प्रतिक्षालय, द्वितीय श्रेणी प्रतीक्षालय तथा विश्रामालयों के रख-रखाव, शौचालयों एवं कुलियों के विश्रामकक्ष का निरीक्षण किया तथा विश्रामालय एवं डोरमेटरी में ठहरे हुये रेल यात्रियों से चर्चा कर उनके सुझाव मांगे. इसी प्रकार महाप्रबंधक ने उच्च श्रेणी यात्री प्रतीक्षालय में प्रतीक्षारत यात्रियों से चर्चा की, जिसमें यात्री प्रतीक्षालयों के रख-रखाव के प्रति संतोष व्यक्त करते हुए उन्होंने इसकी सराहना भी की. इसके साथ ही रेलवे रिफ्रेंशमेन्ट रूम के रख-रखाव, स्वच्छता, खाद्य सामग्री की गुणवत्ता का जायजा लिया तथा कार्यरत कर्मचारियों के मेडिकल कार्ड भी चेक किए.

उत्तर मध्य रेलवे की ‘गो इंडिया स्मार्ट कार्ड योजना’

उत्‍तर मध्‍य रेलवे द्वारा अपने इलाहाबाद एवं कानपुर स्‍टेशनों पर नई दिल्‍ली-हावड़ा सेक्‍टर के हिस्‍से के रूप में ‘गो इण्डिया स्‍मार्ट कार्ड योजना’ को 1जुलाई से लागू किया जा रहा है. इस मल्‍टीपरपज स्‍मार्ट कार्ड (गो इण्डिया) के माध्यम से रेल यात्री बिना लाईन में लगे बड़ी सरलता से अपना टिकट प्राप्त कर सकते हैं.

रेलवे बजट 2011-2012 में घोषित मल्‍टीपरपज स्‍मार्ट कार्ड (गो इण्डिया) के तहत उ.म.रे. द्वारा यह योजना शुरू में दो खंडों में चालू की जा रही है. पहले खंड में नई दिल्ली–हावडा खण्ड में नई दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद, धनबाद,  आसनसोल, हावड़ा तथा दूसरे खंड में नई दिल्‍ली–मुंबई सेंट्रल खण्‍ड में कोटा, बड़ोदरा, रतलाम, सूरत और मुंबई सेंट्रल स्‍टेशनों पर यह सुविधा उपलब्‍ध होगी. इस कार्ड की बिक्री हेतु उपरोक्‍त स्‍टेशनों पर एक विशेष टिकट काउण्‍टर (स्‍मार्ट कार्ड काउंटर) खोले जा रहे हैं. इस कार्ड की कीमत 70 रु. है, जिसमें 50 रु. स्‍मार्ट कार्ड की कीमत एवं 20 रु. इस कार्ड में बैंलेंस के रूप में होगा. इस कार्ड को 50रु. या उसके गुणांक में रिचार्ज किया जा सकता है तथा अधिकतम 10,000 रु. तक का रिचार्ज होगा.

राजभाषा विभाग राजभाषा प्रगति हेतु सक्रियता कायम रखे -पी.के.श्रीवास्‍तव

दक्षिण मध्‍य रेलवे की क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति की 144वीं बैठक की अध्‍यक्षता करते हुए महाप्रबंधक श्री पी. के. श्रीवास्‍तव ने कहा कि इस रेलवे में राजभाषा के क्षेत्र में काफी अच्‍छा कार्य हो रहा है. इसके साथ ही इस रेलवे का राजभाषा संगठन, राजभाषा प्रगति के लिए काफी सक्रिय है. इसे और उत्‍तम बनाने के लिए नियमित रूप से बैठकों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाए, जिससे अधिकारी और कर्मचारी राजभाषा में कार्य करने के प्रति रुचि लें. उन्‍होंने कहा कि प्रत्‍येक विभाग द्वारा अपने-अपने विभाग में प्रयुक्‍त टैम्‍प्‍लेटों का एक संकलन तैयार किया जाए और इसे कंप्‍यूटरों में लोड किया जाए, जिससे कंप्‍यूटर के प्रयोग के प्रति हम सजग होंगे और हमारे कार्यों में गतिशीलता आएगी. उन्‍होंने कहा कि समपार फाटकों में प्रयुक्‍त फाटक संचालन नियम की भाषा का सरलीकरण किया जाए और फाटकों पर कार्यरत रेल कर्मियों को इसके प्रयोग के बारे में उन्‍हें हिंदी में ही समझाया जाए.

महाप्रबंधक ने कहा कि राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अंतर्गत आने वाले कागज़ात को कैलेंडर के रूप में प्रकाशित किया जाए, जिससे अधिकारियों और कर्मचारियों को इस्‍तेमाल करने में सुविधा होगी और इससे हमारी संवैधानिक आवश्‍यकता की पूर्ति हो सकेगी. उन्‍होंने बताया कि रेलवे बोर्ड में दक्षिण मध्‍य रेलवे में किये जा रहे राजभाषा के कार्य को काफी सराहा जाता है, इससे हमारी जि़म्‍मेदारी और भी बढ़ जाती है. कारखानों तथा लोको शेड, जहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यरत हैं,वहां पर उनके कार्य को समझाने वाली संगोष्ठियां आयोजित की जाएं और उनसे सीधे वार्तालाप किया जाए, जिससे उनकी कठिनाईयां दूर की जा सकें.

क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति की 33वीं बैठक सम्पन्न

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री नवीन टंडन की अध्यक्षता एवं रेलवे बोर्ड द्वारा नामित प्रेक्षक सदस्य डॉ. बख्तियार मसूद उस्मानी की उपस्थिति में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति की 33वीं बैठक हाल ही में सम्पन्न हुई. बैठक में सभी विभागों के विभाग प्रमुख, सभी मंडलों के अपर मंडल रेल प्रबंधक तथा दोनों कारखानों के मुख्य कारखाना प्रबंधक एवं उनके प्रतिनिधि शामिल हुए.

बैठक में सर्वप्रथम महाप्रबंधक ने डॉ. उस्मानी का और मुख्य राजभाषा अधिकारी एवं विसमुलेधि श्रीमती अलका मेहरा ने महाप्रबंधक का तथा राजभाषा अधिकारी/रायपुर द्वारा आमंत्रित साहित्यकार श्री खुर्शीद हयात एवं राजभाषा अधिकारी/नागपुर द्वारा रेल रचनाकार श्री नादिर अहमद खान का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया गया. बैठक में द.पू.म.रे. की जोनल हिंदी पत्रिका ‘प्रगति पथ’ के नौवें अंक का विमोचन डॉ. बख्तियार मसूद उस्मानी ने किया.

नौकरशाही की लगाम कसे बिना रेलवे का उद्धार संभव नहीं

पिछले करीब 10-12 साल से प्रत्यक्ष रेल किराए नहीं बढ़ाए जाने से रेलवे की हालत काफी ख़राब हुई है. इसके रख-रखाव पर भारी दबाव पड़ रहा है. रेलवे की लगभग पांच लाख करोड़ की परियोजनाएं अधर में अटकी पड़ी हैं. सेफ्टी जुड़ी काकोड़कर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने के लिए भी रेल मंत्रालय को भारी भरकम फंड की जरुरत है. वित्त मंत्रालय की मदद के बाद भी रेल किराया बढ़ाया जाना जरुरी हो गया था. रेलमंत्री सदानंद गौड़ा का कहना है कि वह पिछले रेलमंत्री के फैसले को लागू करने के लिए मजबूर हैं.

हालांकि उनका यह बयान रेलवे बोर्ड की कुटिल और चालाक नौकरशाही द्वारा दिलाया गया बयान है. तथापि यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि इस देश में रेलवे हमेशा से राजनीतिक तुष्टिकरण का मोहरा रही है. इसके प्रबंधन में पेशेवर रुख अपनाने के बजाय इसका राजनीतिक लाभ के लिए मनमाने तरीके से भारी दोहन किया गया है. केंद्र में गठबंधन की सत्ता-लोलुप राजनीति के चलते क्षेत्रीय पार्टियों को रेलवे को लूटने के लिए दे दिया जाता रहा. यूपीए सरकार ने इसी राजनीति के चलते लम्बे समय तक रेल किरायों में वृद्धि नहीं की. अब तक की कांग्रेस-नीत सरकारों ने अपने तात्कालिक फायदे को देखा, मगर भविष्य का ख्याल तक नहीं किया. इससे रेलवे का घाटा लगातार बढ़ता गया है. लेकिन अब उस असंतुलन को पाटने के लिए रेल यात्री किरायों में की गई 14.2 प्रतिशत और माल भाड़े में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि कतई ज्यादा नहीं कही जा सकती है.

कौन करता है रेल किराए में वृद्धि का विरोध?

रेलगाड़ी में यात्रा करने वाले दो प्रकार के लोग होते हैं. एक तो वे, जो रोज यात्रा करते हैं. दूसरे वे, जो साल में एक, दो, तीन बार कहीं आते जाते हैं. निम्न आय वालों के लिए एक रुपये रोज से भी कम में 100 किमी. तक मासिक टिकट है. रोज यात्रा करने वाले माध्यम आय वर्ग के लिए बेहद रियायती दरों पर मासिक टिकट है. 30 दिन के केवल एक तरफ के किराए के बराबर. अर्थात आधा. जो त्रैमासिक टिकट बनवाने पर और भी अधिक सस्ता हो जाता है. विद्यार्थियों के लिए मासिक किराए में और भी 50 प्रतिशत की छूट है. अब वे लोग, जो शादी-ब्याह, सैर-सपाटे, तीर्थ यात्रा इत्यादि के लिए निकलते हैं. साल में एक, दो या तीन बार. उनकी मानसिकता में कहीं भी किराए के बढ़ने की कोई चिंता तो दिखाई नहीं देती. जो आजकल प्रेस और टीवी में दिखाई जा रही है.

सरकार को करनी चाहिए रेलवे को अत्याधुनिक बनाने की पहल

सरकार द्वारा बढ़ाया गया रेल किराया सर्वथा उचित है. अब ऐसे कड़े फैसले लेने का समय आ गया है और इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरुरत है. जनता और रेल यात्रियों को कुछ आर्थिक तकलीफ अवश्य उठानी पड़ेगी, लेकिन एक कर्ज में डूबे देश के नागरिक कहलाने की शर्मिंदगी आगे चलकर उसे नहीं सहनी पड़ेगी. सरकार को कुछ लोगों के विरोध की परवाह न करते हुए, क्योंकि इन्हें मुफ्तखोरी की लत लगी हुई है, इस देश के सर्वसामान्य नागरिक को उसका आत्मगौरव लौटाने के लिए काम करना चाहिए. इसके लिए यदि कुछ कड़वी दवा भी पिलानी पड़े, तो वह भी पिलाई जानी चाहिए. मगर सरकार को 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' तथा ‘सबका साथ, सबका विकास’ का अपना वादा जरुर पूरा करना चाहिए.

वर्तमान में यदि बांद्रा-मुंबई से फालना की टिकट 330 रु. की है, तो बढ़े हुए 14.5% रेल किराए के बाद यह 375 रु. की हो जाएगी. इसका मतलब 45 रुपए ही प्रत्येक यात्री को ज्यादा चुकाने होंगे. लेकिन यदि रेलवे प्लेटफोर्म पर पहुंचते ही उसको एअरपोर्ट जैसी सुविधा मिलनी शुरू हो जाए, तो उसे यह ज्यादा किराया देना नहीं खलेगा. एकदम साफ-सुथरी एसी ट्रेन में सफ़र कर रहे यात्री को यदि वाई-फाई के साथ इंटरनेट मुहैया करा दिया जाए, तो उसके सफ़र और काम का आनंद चौगुना हो जाएगा.

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