तमिलनाडु : नई शिक्षा नीति-2020 और भारतीय भाषाएँ

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। जहां तक संविधान में स्वीकृत हिंदी का सवाल है, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए, विशेष कर उन लोगों द्वारा, जो बार-बार संविधान को देशभर में लिए-लिए फिरते हैं!

प्रेमपाल शर्मा

तमिलनाडु के विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार को बिना देर किए फंड जारी कर देना चाहिए। वैसे भी यह कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है। भारत की पूरी अर्थव्यवस्था में तमिलनाडु का अच्छा योगदान है। ऐसी कड़वाहट से केंद्र और राज्य दोनों का नुकसान होगा। तीसरी बात, त्रिभाषा फॉर्मूला का विचार राधाकृष्णन कमिशन ने दिया था, जिसे 1967 में मुख्यमंत्रियों की सहमति से 1968 की शिक्षा नीति में शामिल किया गया था, लेकिन 1986, यशपाल कमेटी 1992, एनसीएफ 2005.. यूपीए के बावजूद व्यवहार में तमिलनाडु में तमिल और अंग्रेजी ही ज्यादा चलती रही है, जैसे उत्तर भारत में दक्षिण की कोई भाषा उस फार्मूले में सुझाव के अनुसार कभी नहीं पढ़ाई और बढ़ाई गई।

लेकिन तमिलनाडु की शिक्षा व्यवस्था कम से कम उत्तर भारत से तो बेहतर स्थिति में बनी हुई है और इसमें उनकी अपनी भाषाओं तमिल में शिक्षा का भी कम योगदान नहीं है। वैसे भी शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। जहां तक संविधान में स्वीकृत हिंदी का सवाल है, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए, विशेष कर उन लोगों द्वारा, जो बार-बार संविधान को देशभर में लिए-लिए फिरते हैं।

तमिल सरकार और राजनीति भी उसी का हिस्सा है। और हकीकत यह है कि तमिलनाडु की जनता/नई पीढ़ी दक्षिण के अन्य राज्यों की तरह हिंदी को आवश्यकता के हिसाब से सीख रही है और अच्छी खासी संख्या में, क्योंकि उन्हें पता है कि देश के किसी भी हिस्से में जाने पर, वह चाहे पड़ोस के राज्य हों, मुंबई कोलकाता हो या दिल्ली, आम बोल-चाल की हिंदी के बिना उनका काम नहीं चलता। इसलिए राजनीतिक नेता अपनी कुर्सी के लिए कुछ भी करें, जनता के बीच हिंदी या कहें हिंदुस्तानी, उसके गीत-संगीत-फिल्में बेहतर रूप से आगे बढ़ रही है।

सत्ता के लिए तो मैक्यावली के दर्शन की राह पर केंद्र सरकार भी राजनीति करती है और राज्य सरकारें भी करती हैं और यह राजनीति का धर्म है। भाषा का मामला बहुत संवेदनशील है और इसके आगे महाबली नेहरू की कांग्रेस भी 60 के दशक में घुटने टेक चुकी है और तब से अब तक वह दोबारा सत्ता में नहीं आ पाई।

विश्व व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए हमें इस महादेश के किसी भी कोने में असंतोष को नहीं बढ़ने देना चाहिए वरना दुनिया भर की ताकतें हमारा खेल खराब कर सकती है। याद कीजिए, 2019 में दूसरी बार जब केंद्र में यह सरकार आई थी, तो पहले दिन ही भाषा के मसले पर दक्षिण ने आवाज उठाई थी और केंद्र सरकार ने मामले की संजीदगी को देखते हुए तुरंत अपना फैसला तमिलनाडु सरकार के अनुसार मान लिया था।

उत्तर भारत के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और लेखकों को भी समझना चाहिए कि अपने राज्यों में तमिलनाडु की तरह (तमिल) अपनी भाषा यानि हिंदी और हिंदुस्तानी को अपनी शिक्षा व्यवस्था प्रशासन और रोजाना के जीवन में शामिल करें। यहां तो आप अंग्रेजी के लिए मारे-मारे फिरते हैं, अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल और विश्वविद्यालय में अंग्रेजी रटाते हैं, लेकिन दक्षिण में हिंदी का बाजा बजाते हो! पहले अपने आचरण/जीवन में उन बातों को लाइए, दूसरों को उपदेश देने से पहले! तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था/अच्छा शासन-प्रशासन में तमिल का यानि उनकी अपनी भाषाओं का अच्छा योगदान है। इस झगड़े से उत्तर भारत के लोग कुछ सीख ले लें, तो यह भी राष्ट्रीय हित में रहेगा! #PrempalSharma