Editorial : “वन नेशन, वन बजट”

    केंद्रीय बजट में रेल बजट के समाहित होने से समाप्त हुई रेलवे की पारदर्शिता

    खत्म हुई 92 साल पुरानी व्यवस्था, अब बढ़ेगा नौकरशाही का रुतबा और दबदबा

    सुरेश त्रिपाठी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार, 21 सितंबर को 92 साल पुरानी व्यवस्था को समाप्त करते हुए रेल बजट को केंद्रीय सामान्य बजट में समाहित किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इसका मतलब यह है कि अब रेल बजट अलग से नहीं, बल्कि सामान्य बजट के साथ संसद में प्रस्तुत किया जाएगा. सरकार के इस कथित रिफार्म को ‘वन नेशन, वन बजट’ की संज्ञा देकर सोशल मीडिया पर पूरे दिन इसे प्रचारित करने की सरकारी मुहिम चलाई गई. इसके लिए रेलवे के पूरे महकमे के साथ केंद्र और भाजपाई राज्य सरकारों ने भी इसे कुछ इस तरह से प्रचारित किया जैसे मोदी सरकार ने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया हो. इस तरह कश्मीर के उरी में हुई आतंकवादी घटना से देश का पूरा ध्यान हटाने में सरकार उसी तरह कामयाब रही, जिस तरह गत सप्ताह रेलवे में नौ दिन के सफाई अभियान की बहु-प्रचारित योजना की शुरुआत करके फ्लेक्सी किराया दरों की तरफ से करोड़ों रेलयात्रियों का ध्यान हटाने में सफल रही थी. इसकी कसीदाकारी में यह भी कहा गया कि इस समायोजन के बाद रेलवे को अब केंद्र सरकार को सालाना लाभांश नहीं देना पड़ेगा और उसे अपने कामकाज से जुड़े मामलों में पूरी आजादी होगी. इसके बावजूद यह सच्चाई है कि अपने कर्मचारियों के वेतन-भत्तों और पूर्व कर्मचारियों की पेंशन सहित सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का बोझ रेलवे को खुद उठाना पड़ेगा.

    वर्तमान में रेलवे का वेतन बिल 70,125 करोड़ रुपए और पेंशन बिल करीब 45,500 करोड़ रुपए सालाना है. जबकि सालाना ईंधन बिल 23 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए रेलवे पर 30 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा. इसके साथ ही यात्री सेवाओं पर दी जाने वाली विभिन्न प्रकार की सब्सिडी की मद में भी रेलवे को ही सालाना 33 हजार करोड़ रुपए का बोझ उठाना होगा. विभिन्न श्रेणियों में दी जाने वाली किराया रियायत की समस्या का समाधान निकालने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा. हो सकता है कि थोड़े से हेरफेर के साथ इसका बोझ भी रेलवे को उठाने को कह दिया जाए. जबकि इस बजट मर्जर के बाद रेलवे को अपनी प्रत्येक योजना की फंडिंग के लिए कटोरा लेकर सरकार के दरवाजे पर खड़ा रहना पड़ेगा. तथापि, रेलमंत्री सुरेश प्रभु उर्फ मुनीमजी का कहना है कि रेलवे की अलग पहचान और कामकाजी स्वायत्तता जस की तस बनी रहेगी.

    फोटो परिचय : रेल बजट की घोषणाएं करने का ऐसा गरिमामय अवसर अब शायद किसी रेलमंत्री को नहीं मिल पाएगा.


    रेलमंत्री का कहना है कि रेलवे अपनी वर्तमान वित्तीय व्यवस्था कायम रखने के साथ ही अपने सभी राजस्व खर्चों को खुद पूरा करेगी. इसमें सामान्य कामकाजी व्यय, कर्मचारियों के वेतन-भत्तों और पेंशन का भुगतान भी शामिल है. अब संसद में रेल और सामान्य बजट एक साथ आने से जनता को रेलवे और देश की समूची वित्तीय स्थिति का पता चलेगा. रेल बजट का सामान्य बजट में समायोजन होने से रेलवे को अलग से सरकार को सालाना 9,700 करोड़ रुपए का लाभांश नहीं देना पड़ेगा, जबकि रेलवे को अब केंद्रीय बजट का समर्थन मिलेगा. रेलवे की अनुमानित 2.27 लाख करोड़ रुपए की पूंजी पर सरकार को सालाना लाभांश देना पड़ता है, जो कि बजट समायोजन के बाद अब नहीं देना पड़ेगा.

    ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित किए जाने का यह निर्णय रेलहित और देशहित में नहीं है. सरकार ने रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित करने का बहुत बड़ा और जोखिमपूर्ण निर्णय लिया है. एक तरफ केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि उन्हें जीडीपी के कुल 3.5% घाटे को कम करके 3.25% पर लाना है. दूसरी तरफ अब जब रेल बजट केंद्रीय बजट में मर्ज हो गया है, तब आईआरएफसी द्वारा लिया गया हजारों करोड़ का कर्ज भी अब केंद्रीय घाटे में मर्ज हो जाएगा. तब केंद्र का कुल जीडीपी घाटा 3.5% बढ़कर 4.5% से 5% तक पहुंच जाएगा. ऐसे में वित्तमंत्री अपना जीडीपी घाटा 3.25% पर कैसे ला पाएंगे? ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने इन मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श किए बिना ही रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित करने का जोखिमपूर्ण निर्णय लिया है. इसके अलावा इस मुद्दे पर कोई राष्ट्रीय बहस का मौका भी सरकार ने नहीं दिया.

    रेलमंत्री ने भी इस मुद्दे पर बिना कोई गंभीर चर्चा किए ही रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित करने को लिख दिया. रेलमंत्री ने यह सरकार के कहने पर ही लिखकर दिया होगा अथवा यह विचार उनके ही मुनीमी-दिमाग की उपज रहा हो सकता है. कहा यह गया था कि रेल मंत्रालय ने तो यह कहा है कि रेल बजट को आम बजट में समाहित किए जाने का नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव क्या होगा, इस पर विचार किया जा रहा है. जबकि इसी मुद्दे पर रेलमंत्री के साथ मतभेद होने से पूर्व एफसी/रेलवेज संजय मुखर्जी समय से पहले वीआरएस लेकर चले गए हैं. अब यह कहकर देश को बरगलाया जा रहा है कि ‘रेल बजट भी भारत सरकार का ही बजट था, क्योंकि बजट के बाद जो भी विड्रावल होता है, वह भारत सरकार के कंसोलिडेटेड फंड से ही होता है. इस पर यदि यह कहा जाए कि रेल बजट भारत सरकार का बजट नहीं है अथवा कंसोलिडेटेड फंड से अप्रूवल के बाद विड्रावल नहीं लिया जाता है, तो अलग बात है.’

    हालांकि अब जब रेल बजट वास्तव में केंद्रीय बजट में समाहित हो गया है, तब भी 30 हजार करोड़ की सालाना यात्री सब्सिडी भारत सरकार के खाते में जाने के बजाय रेलवे के ही मत्थे मढ़ दी गई है. इसके साथ ही यात्री सब्सिडी सहित रेलकर्मियों के वेतन-भत्ते, पेंशन और ईंधन बिल भी रेलवे के खाते में डाल दिए गए हैं. ऐसे में इस बजट मर्जर के क्या मायने निकाले जाएं? इसी तरह रेलवे के पास रेलकर्मियों का लगभग 42 हजार करोड़ का प्रोविडेंड फंड है, वह भारत सरकार के पास चला गया है. इस तरह इस बजट मर्जर का लाभ रेलवे के बजाय केंद्र को ही मिला है. इसके अलावा केंद्र सरकार समय-समय पर जो तमाम तरह के टैक्स रेलवे पर थोपती है और उसके लिए भी रेलवे को लड़ाई लड़नी पड़ती है, उससे भी छुटकारा नहीं मिला है. सिर्फ सालना 9,700 करोड़ की लाभांश अदायगी से निजात मिलने से रेलवे का कौन सा भला हो जाने वाला है? इस सबके बावजूद बजट मर्जर के बाद छोटे-छोटे फंड के लिए फाइनेंस कमिश्नर/रेलवेज (एफसी) को वित्त मंत्रालय के सेक्शन ऑफिसर, डायरेक्टर या अंडर सेक्रेटरी के दरवाजे पर कटोरा लेकर उसके चपरासी के पास घंटों बैठना पड़ेगा. ऐसे में बजट मर्जर का रेलवे को क्या लाभ मिला?

    अब चूंकि रेल बजट केंद्रीय बजट का हिस्सा हो गया है, इसलिए 92 साल पुराना रेल बजट अब इतिहास बन गया है. इस प्रकार अब न तो अलग से रेल बजट पेश होगा, और न ही उस पर संसद में अलग से बहस होगी. जिस तरह केंद्रीय बजट में दूसरे मंत्रालयों का जिक्र किया जाता है, उसी तरह अब रेलवे का भी किया जाएगा. परंतु सवाल यह उठता है कि इससे क्या रेलवे और इसमें रोजाना यात्रा करने वाले लगभग तीन करोड़ रेलयात्रियों का भी कुछ भला होगा? क्या रेल बजट के मर्जर से रेलवे की आय बढ़ जाएगी अथवा इसकी उत्पादकता पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा?

    पिछले करीब ढ़ाई साल से सरकारी पदों, योजनाओं, संस्थाओं और वर्ग विशेष के नाम बदलकर रिफार्म-दर-रिफार्म का ढिंढोरा पीटने पर उतारू सरकार को यह समझना चाहिए कि हर बदलाव ‘रिफार्म’ (सुधार) नहीं होता है. रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित करके अलग से रेल बजट की छपाई को खत्म करना, उस पर होने वाली बहस में जाया होने वाला संसद का कीमती समय बचाना, सांसदों की अपने संसदीय क्षेत्र में रेल लाइनें बिछाने, उनकी नई गाड़ियां चलाने की मांगों का दबाव खत्म करना अथवा इस प्रकार की चालबाजी से देश की विकास दर (जीडीपी) बढ़ाना ही यदि इस समायोजन का मूल उद्देश्य है, तो इसे सरकार के ‘रिफार्म’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती. ऐसे तमाम तर्क इसलिए भी कुतर्क माने जाएंगे, क्योंकि इस प्रकार के कथित रिफार्म का अर्थ यह होगा कि सरकार जिन जगहों पर दबाव झेलने की स्थिति में नहीं हो, उन्हें जड़ से खत्म कर दिया जाए. ऐसे में अगर किसी विभाग में भ्रष्टाचार हो, (जो कि सरकार के तीनों अंगों में अब भयानक रूप ले चुका है), और उस विभाग की मशीनरी भी कमजोर हो, तथा सरकार उसे नियंत्रित न कर पा रही हो, तो क्या उस विभाग को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए? इस प्रकार यदि देखा जाए तो सरकार को अपने ज्यादातर विभाग बंद कर देने पड़ेंगे.

    फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित कर देने के बाद उसमें रेलवे को कितनी जगह या अहमियत मिल पाएगी? क्या वित्तमंत्री भी ठीक उसी तरह संसद में रेल बजट पढ़ेंगे, जिस तरह रेलमंत्री पढ़ते रहे हैं? अथवा रेलवे का संपूर्ण लेखा-जोखा केंद्रीय बजट का मात्र एक ‘जोड़’ (एनेक्जर) बनकर रह जाएगा? यह सब तो बाद में भी पता चलता रहेगा, मगर रेल बजट के मर्जर से एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि अब रेलवे की पारदर्शिता पूरी तरह समाप्त जाएगी. इसकी आशंका इसलिए भी है, क्योंकि आजादी के बाद के सात दशकों तक रेलवे का कामकाज देश की जनता को साफ नजर आता रहा है. अब तक रेलवे की दुर्दशा की चिंता भी लोगों को होती रही है और इसकी अच्छाईयां भी उन तक पहुंचती रही हैं. अब तक लोगों को यह भी जानकारी मिलती रही है कि रेलवे को एक रुपया कमाने के लिए 90-95 पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. रेल बजट समाप्त होने के बाद यह सब जानकारी शायद अब लोगों को नहीं मिल पाएगी. इसके अलावा लोगों को रेलवे की आर्थिक स्थिति के बारे में भी अब कोई अंदाजा नहीं हो पाएगा.

    अब तक रेलमंत्री द्वारा संसद में रेल बजट पेश करने के समय की गई घोषणाओं की वास्तविक स्थिति लोगों को एक साल बाद पता चल पाती थी कि उन्होंने बजट में जितनी घोषणाएं की थीं, उनमें से कितनी पूरी हुईं और कितनी हवा-हवाई साबित हुईं? अब जब रेल बजट का ही पता नहीं चल पाएगा, तो कौन जान पाएगा कि रेलमंत्री ने क्या-क्या करने के वादे किए थे, और क्या-क्या किया है? भारत में रेलवे सर्वसामान्य आदमी के लिए सर्व-सुलभ और सबसे सस्ता, सुरक्षित एवं किफायती यातायात का साधन है. देश का हर आदमी न सिर्फ इससे जुड़ा हुआ है, बल्कि इससे पर्याप्त जुड़ाव भी महसूस करता है. देश के हर कोने के लोगों को यह उम्मीद होती है कि इस बार रेल बजट में उनके क्षेत्र को कुछ न कुछ जरूर मिलेगा. लेकिन अब जब रेल बजट ही नहीं रहा, तो फिर इससे कौन क्या उम्मीद बांधेगा? इस तरह से यदि देखा जाए, तो देश के इस सबसे बड़े सरकारी वाणिज्यिक उपक्रम से जनता की तमाम उम्मीदें ही खत्म हो जाएंगी. सरकार ने रेल बजट को समाप्त करने का निर्णय लेने से पहले इस पर पूरे देश की जनता को व्यापक बहस का मौका देना जरूरी नहीं समझा. क्या देश की जनता के सामने यह बात स्पष्ट नहीं होनी चाहिए कि सरकार के इस निर्णय से रेलवे का कितना नफा-नुकसान होगा?

    फोटो परिचय : संसद में रेल बजट प्रस्तुत करने जाने से पूर्व रेलवे बोर्ड के सभी मेंबर्स के साथ ऐसी गरिमामयी तस्वीरें खिंचवाने का अवसर अब न तो किसी रेलमंत्री, रेल राज्यमंत्री को मिलेगा और न ही रेलवे बोर्ड के मेंबर्स को. रेल बजट मर्ज होने के बाद अब इन सभी ने अपनी गरिमा और अहमियत को खुद ही खो दिया है.


    रेल बजट का केंद्रीय बजट में समायोजन किए जाने के निर्णय के संदर्भ में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि रेल बजट बनाने में काफी समय नष्ट होता है, इस पर बहुत सारा पैसा भी खर्च करना पड़ता है, इस सबके बाद संसद में लंबी-चौड़ी बहस भी होती है, जिसमें काफी कीमती समय नष्ट होता है. यहां यह सवाल उठता है कि क्या रेल बजट को केंद्रीय बजट में समाहित कर दिए जाने से ही रेलवे की उत्पादकता बढ़ जाएगी? अथवा क्या बजट बनाने का समय, लंबी संसदीय बहसों का समय और पैसा बच जाएगा? क्या रेलवे का घाटा कम हो जाएगा और यह रातोंरात एक चमचमाता हुआ सितारा बन जाएगी अथवा भारी-भरकम मुनाफा कमाकर भारत सरकार की नवरत्न कंपनियों में शामिल हो जाएगी? सरकार का यह कहना सही हो सकता है कि अलग रेल बजट बनाने में काफी समय लगता है और इसकी छपाई में बहुत सारा कागज भी बरबाद होता है, लेकिन सरकार ने यह नहीं सोचा कि जब बजट बनता है, तो उससे पहले उसका नियोजन (प्लानिंग) भी होता है.

    बजट के समय रेल अधिकारियों पर इस बात का पर्याप्त दबाव होता है कि वे सुविधाओं के विस्तार के लिए नई अवधारणाओं, नए-नए विचारों और सुझावों को सामने लाएं. इसके साथ ही पिछले बजट के वादों और घोषणाओं को पूरा करने की चिंता भी इससे जुड़ी हुई होती है, वरना सरकार के लिए संसद में बहस के दौरान जवाब देना मुश्किल हो जाता है. संसद में जब रेल बजट पर चर्चा होती है, तब तमाम सांसद उस दौरान अपने संसदीय क्षेत्र की शिकायतें भी रखते हैं. ये शिकायतें उनकी नहीं, बल्कि उनके संसदीय क्षेत्र की जनता की होती हैं. इस प्रकार जब जनता की प्रतिक्रियाएं संसद के पटल पर गूंजती हैं, तब व्यवस्था पर उनका पर्याप्त प्रभाव भी पड़ता है. अब यदि जनता की यह प्रतिक्रियाएं ही रेल बजट के केंद्रीय बजट में समाहित होने पर संसद में नहीं गूंजेंगी, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता यानि करोड़ों रेलयात्रियों को ही होगा. अब अगर रेलवे पर चर्चा न होने से इसका भला हो जाएगा, तो फिर सामान्य बजट पर भी तो इसी तरह की तमाम तैयारियां करनी पड़ती हैं. ऐसे में क्या देर-सबेर सामान्य बजट को भी समाप्त कर दिया जाएगा और सरकार का प्रत्येक कामकाज नौकरशाही के रुतबे और दबदबे से ही चला करेगा?

सम्पादकीय