सीआरबी की नियुक्ति का मामला सर्च कमेटी के हवाले

    अब नियम, परंपरा, काबिलियत, योग्यता, ईमानदारी और अनुभव का कोई मतलब नहीं होगा

    सुरेश त्रिपाठी

    वर्तमान चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ए. के. मितल 31 जुलाई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. रेल मंत्रालय में उनकी जगह नए चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) की खोज बहुत तेजी से शुरू हो गई है. परंतु इस बार परंपरागत प्रक्रिया और निर्धारित नियमों को दरकिनार करके सक्षम और योग्य अधिकारी की तलाश का जिम्मा एक सर्च कमेटी को सौंपा गया है. रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पद के योग्य एवं काबिल (एलिजिबल) अधिकारियों की एक सूची बनाकर हाल ही में सीआरबी द्वारा रेलमंत्री के समक्ष प्रस्तुत की गई थी, परंतु रेलमंत्री को उक्त सूची में अपने अनुरूप कोई काबिल अधिकारी नजर नहीं आया. इसके परिणामस्वरूप उन्होंने नए सीआरबी की तलाश का मामला एक सर्च कमेटी को सौंपने को कहकर फाइल पर इस बाबत अपना मंतव्य भी दर्ज कर दिया. जानकारों का कहना है कि सीआरबी ने भी अब इस मामले को सर्च कमेटी को सौंपे जाने का ऑर्डर कर दिया है.

    हालांकि इस कथित सर्च कमेटी के सदस्य कौन-कौन हैं, इस बारे में तो फिलहाल कुछ ज्ञात नहीं हो सका है, मगर जानकारों का कहना है कि अब यह सर्वविदित है कि सर्च कमेटी का मतलब वर्तमान समय में सत्ताधारी पार्टी भाजपा अथवा उससे जुड़ा संगठन आरएसएस होता है. यानि भाजपा या आरएसएस के कर्ताधर्ता जो कहेंगे, जिसके नाम पर उंगली रखेंगे, वही काबिल और योग्य करार दिया जाएगा. जानकारों का यह भी कहना है कि इस सबके ऊपर जिसकी तरफ प्रधानमंत्री का इशारा होगा, सर्च कमेटी उसके अनुरूप अंग्रेजी बनाएगी, और कहा जाएगा कि ‘इतना काबिल एवं योग्य एसेट देश में मौजूद था, मगर पिछले 70 सालों में किसी को नजर नहीं आया, यह जब फलां हॉस्पिटल में पैदा हुआ था, तो इसके पैदा होते ही पूरे हास्पिटल में उजाला हो गया था, और जब यह छह साल का था, तब इसने कालिया नाग की नाक में नकेल डालकर अपने शहर को उसके कोपभाजन से बचाया था. इसके बाद वह जैसे-जैसे बड़ा होता गया उसकी बहादुरी के चलते उसकी ख्याति चारों तरफ फैलती चली गई और अब हमने इसकी काबिलियत और दिव्य-दृष्टि को पहचाना है, इसे सीआरबी इसलिए बनाया जा रहा है, क्योंकि एक यही है, जो अब भारतीय रेल का उद्धार कर सकता है.’

    कुछ इसी तरह वर्तमान रेलमंत्री की भी खोज की गई थी और उन्हें दल-बदल करवाकर यह कहा गया था कि उनकी प्रतिभा और काबिलियत की पहचान उनकी पार्टी को नहीं हुई, उनकी प्रतिभा को पहले भी भाजपा या आरएसएस ने ही पहचाना था और अटलबिहारी बाजपेई सरकार में अहम् मंत्रालय सौंपा था और अब पुनः उनकी काबिलियत की पहचान करके उन्हें रेलमंत्री बनाया गया है. जानकारों का कहना है कि अब भले ही वह एक अयोग्य मुनीम की तरह भारतीय रेल का बंटाधार कर रहे हैं, और कर्ज में डूबाकर उसे निजीकरण की तरफ ढकेल रहे हैं, और भले ही संपूर्ण रेलवे बोर्ड द्वारा पूरी तरह से नकार दिए जाने के बावजूद यह ‘मुनीम जी’ डॉ. बिबेक देबरॉय कमेटी की रिपोर्ट पर पिछले दरवाजे से पूरी शिद्दत के साथ अमल कर रहे हैं, मगर पूरा रेलवे बोर्ड और रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठन मूकदर्शक बने हुए हैं और मुनीमजी को नाकाबिल, नासमझ, अयोग्य, पूरी तरह से नापास इत्यादि कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री पूरी कर रहे हैं. मगर यह भी सच है कि भारतीय रेल में चौतरफा अराजकता का माहौल है, आए दिन जहां-तहां दुर्घटनाएं हो रही हैं, घटिया अर्थ-वर्क के चलते थोड़ी सी ही बरसात में रेल लाइनों का फाउंडेशन बह जा रहा है, घटिया मेंटेनेंस के कारण लोकल ट्रेनों की कपलिंक टूट रही हैं, चौतरफा अनधिकृत वेंडर्स की भरमार है, ई-कैटरिंग में यात्रियों को ख़राब और बासी खाना सप्लाई किया जा रहा है, कोई भी ट्रेन निर्धारित समय पर नहीं चल रही है, लंबी दूरी की ज्यादातर गाड़ियां दो से चार घंटे की देरी से चल रही हैं, मगर प्रधानमंत्री को दर्शाने के लिए सोशल मीडिया और ट्विटर पर भारतीय रेल की छवि चमाचम चमचमाई जा रही है.

    बहरहाल, सीआरबी के लिए विभागीय स्तर पर सबसे पहला नाम अश्वनी लोहानी (आईआरएसएमई) का चल रहा है, जो कि फिलहाल रेलवे से प्रतिनियुक्ति पर एयर इंडिया के प्रबंध निदेशक हैं. उनका कार्यकाल करीब दो साल पांच महीने बाकी है. वह 31 दिसंबर 2018 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं. इसके बाद दक्षिण मध्य रेलवे के महाप्रबंधक रवीन्द्र गुप्ता का भी नाम है, जिनका कार्यकाल 31 जुलाई 2018 तक पूरे दो साल का है. इनके अलावा बतौर महाप्रबंधक दक्षिण पूर्व रेलवे, मेट्रो रेलवे एवं पूर्व रेलवे तीनों का एकसाथ चार्ज संभाल रहे ए. के. गोयल के नाम की भी चर्चा हो रही है, जबकि उनका कार्यकाल दो साल से कम रह गया है. वह 30 अप्रैल 2018 को सेवानिवृत्त होंगे. जानकारों का कहना है कि कोई बड़ी बात नहीं होगी यदि श्री गोयल को सीआरबी बना दिया जाए, क्योंकि अब रेलवे स्टोर्स वाले बहुत मजबूत स्थिति में हैं और उनके पास बजट भी बहुत होता है. तथापि उनका यह भी कहना है कि मगर अब शायद ही अन्य सर्विस/कैडर वाले किसी स्टोर्स ऑफिसर को सीआरबी बनने का मौका देंगे, क्योंकि वर्तमान ‘स्टोरकीपर’ की कार्य-प्रणाली को देखने के बाद सभी कैडर उनसे बहुत बुरी तरह खफा हो चुके हैं.

    दूसरी तरफ रेलवे बोर्ड में बतौर मेंबर कार्यरत कोई भी अधिकारी सीआरबी बनने की पहली शर्त को पूरा नहीं कर पा रहा है. उल्लेखनीय है कि जिस तरह जीएम बनने के लिए न्यूनतम दो साल का कार्यकाल बाकी होना जरुरी है, ठीक उसी तरह सीआरबी बनने के लिए भी न्यूनतम दो साल का कार्यकाल होना जरुरी है. इसके अलावा सीआरबी के लिए दो तरह की अन्य शर्तें भी हैं, जिन्हें समय-समय पर अपने चहेतों को पुरस्कृत करने के लिए बनाया गया है. रेलवे बोर्ड में सबसे सीनियर मेंबर (स्टाफ) प्रदीप कुमार हैं, उनका कार्यकाल एक साल से कम (30 जून 2017) रह गया है, जबकि मेंबर मैकेनिकल हेमंत कुमार चार महीने बाद 30 नवंबर 2016 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. मेंबर इलेक्ट्रिकल ए. के. कपूर का कार्यकाल सिर्फ सात महीने (फरवरी 2017) बाकी है. नव-नियुक्त मेंबर इंजीनियरिंग ए. के. मित्तल का भी कार्यकाल 31 अगस्त 2017 (13 महीने) तक है. अब मेंबर ट्रैफिक मोहम्मद जमशेद ही बोर्ड में एक ऐसे अधिकारी हैं, जिनका कार्यकाल सबसे ज्यादा 23 महीने का है. उनकी सेवानिवृत्ति 30 जून 2018 को होगी.

    हालांकि उपरोक्त में से सीआरबी पद के लिए सबसे काबिल और योग्य अधिकारी अश्वनी लोहानी हैं, क्योंकि उनकी काबिलियत, योग्यता और ईमानदारी निर्विवाद रूप से स्थापित है. यदि उन्हें यह मौका दिया जाता है, तो वह एक योग्य रेल अधिकारी होने के नाते भारतीय रेल के उत्थान में प्रधानमंत्री और रेलमंत्री का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं. इसके अलावा जानकारों का यह भी कहना है कि अगले साल उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मुस्लिम कार्ड खेलकर यदि प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी भाजपा सहित आरएसएस ने राजनीतिक लाभ लेने का उद्देश्य सामने रखा, तो इसका फायदा मोहम्मद जमशेद को मिल सकता है, क्योंकि राजनीतिक स्तर पर तब भाजपा यह दावा कर सकती है कि पिछले लगभग पचास साल सत्ता में रहने और आजादी के 69 साल बाद भी किसी मुस्लिम को रेलवे बोर्ड का चेयरमैन (पदेन प्रधान सचिव, भारत सरकार) नहीं बनाया गया, मगर भाजपा ही वह एकमात्र सेकुलर राजनीतिक पार्टी है, जिसने यह काम किया है और जो मुसलमानों की सच्ची हितैषी है. ऐसी स्थिति में सर्च कमेटी किसी को भी सीआरबी बना सकती है, क्योंकि अब नियम, परंपरा के अलावा व्यक्ति की काबिलियत, योग्यता, ईमानदारी और अनुभव का कोई मतलब नहीं होगा.

सम्पादकीय