भगत नहीं हैं डीजी पद पर अधिकृत

    डीजी/आरपीएफ ने चोरी-छिपे आईपीएस मेस, रायपुर में ली आरपीएफ की सलामी

    निरीक्षण के नाम पर डीजी ने आलीशान सैलून और हेलीकाफ्टर से किया भ्रमण

    द.पू.म.रे. के 1700 आरपीएफ वाले कैसे करेंगे रावघाट रेल परियोजना की सुरक्षा?

    सुरेश त्रिपाठी

    दिल्ली हाई कोर्ट के स्टे ऑर्डर के मद्देनजर महानिदेशक, रेलवे सुरक्षा बल (डीजी/ आरपीएफ) के पद पर एस. के. भगत (आईपीएस) की नियुक्ति फिलहाल अदालती और कानूनी विवाद में है. इसके चलते वह न तो कोई निर्णय लेने की स्थिति में हैं, न ही कोई मीटिंग कर सकते हैं, और न ही कहीं कोई निरीक्षण करने के लिए फिलहाल संवैधानिक रूप से अधिकृत हैं. जानकारों का कहना है कि इन सब गतिविधियों के दौरान उनके द्वारा लिए जाने वाले निर्णय और उनके अनुपालन के लिए दिए गए उनके निर्देशों की अनुपालना का कोई कानूनी आधार मौजूद नहीं है. उनका कहना है कि जब तक अदालत द्वारा इस मामले पर कोई स्थिति स्पष्ट नहीं कर दी जाती है, तब तक श्री भगत को ऐसी तमाम गतिविधियों से स्वयं को निर्लिप्त रखना चाहिए.

    तथापि, डीजी/आरपीएफ के पद पर फिलहाल अनधिकृत रूप से पदस्थ एस. के. भगत ने गत सप्ताह पूर्व तट रेलवे और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का निरीक्षण दौरा किया. पूर्व तट रेलवे में 27 मई को नक्सल प्रभावित दांतेवाडा क्षेत्र का निरीक्षण करने के दौरान श्री भगत ने कुछ आवश्यक निर्देश भी दिए. इस मौके पर पूर्व तट रेलवे के सीएससी अतुल पाठक सहित अन्य आरपीएफ अधिकारी और बड़ी संख्या में आरपीएफ कर्मी भी उनके साथ मौजूद थे. इसके बाद वह 28 मई को दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के रायपुर मंडल पहुंचे थे. उनके साथ पू.त.रे. के सीएससी अतुल पाठक सहित आईजी/रे.बो. निर्मल सिंह और द.पू.म.रे. के डीआईजी/सीएससी रवीन्द्र वर्मा, सशश्त्र सीमा बल के डीआईजी विनोद नायक, एसपी आरिफ शेख हुसैन तथा बड़ी संख्या में आरपीएफ कर्मी एवं अधिकारी उपस्थित थे.

    रायपुर आगमन पर उनके भ्रमण अथवा कथित निरीक्षण के लिए विशेष रूप से रेलवे का आलीशान सैलून उपलब्ध कराया गया. इस सैलून और मात्र एक एसएलआर के साथ एक इंजन उनके भ्रमण लिए विशेष रूप से चलाया गया. इस दरम्यान उन्होंने गुडुम रेलवे स्टेशन और आरपीएफ बैरक का निरीक्षण किया. वहां से दो किमी दूर वह मरकाटोला स्थित एसएसबी कैंप भी गए. गुडुम नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के नाम पर डीजी/आरपीएफ की सुरक्षा के लिए आरपीएफ के 40 कमांडो और 30 आरपीएफ अधिकारियों के अलावा एसएसबी एवं जिला पुलिस के जवानों को भी तैनात किया गया था.

    इसके अतिरिक्त उनके तामझाम को दर्शाने के लिए करीब 400 आरपीएफ कर्मी भी लगाए गए थे, जिन्हें द.पू.म.रे. के विभिन्न स्थानों से बुलाया गया था. इसके अलावा जगदलपुर-रावघाट रेल परियोजना का हवाई निरीक्षण करने हेतु डीजी के लिए सीआरपीएफ का हेलीकाफ्टर उपलब्ध कराया गया. इसका भुगतान रेलवे को अलग से करना पड़ेगा. वहां से वापस आने के बाद रायपुर आईपीएस मेस में आरपीएफ की एक विशेष गारद को बुलाकर उन्हें सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर) दी गई. इसके बाद वह हवाई मार्ग से ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे.

    जानकारों का कहना है कि विभागीय आरपीएफ अधिकारी अपनी पूरी गरिमा को गिरवी रखकर इन बाहरी अधिकारियों की चापलूसी और चमचागीरी में लग जाते हैं, जबकि ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन द्वारा जो अदालती लड़ाई शुरू की गई है, उसका सारा लाभ इन गरिमाविहीन आरपीएफ अधिकारियों को ही मिलने वाला है. उनका यह भी कहना है कि तथाकथित डीजी/आरपीएफ ने तो अदालती एवं कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए रेलवे क्षेत्र से बाहर आईपीएस मेस में सलामी ली, मगर इन विभागीय आरपीएफ अधिकारियों को आरपीएफ गारद की ऐसी कोई सलामी अपने क्षेत्र से बाहर जाकर देने से सपष्ट मना कर देना चाहिए था. उनका कहना है कि नियम और परंपरा के विरुद्ध किए गए इस कार्य के लिए सभी संबंधित आरपीएफ अधिकारियों के खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है. क्या यह कार्रवाई करने की हिम्मत रेलवे बोर्ड, एमएस, सीआरबी अथवा रेलमंत्री द्वारा दिखाई जाएगी?

    ज्ञातव्य है कि जगदलपुर-रावघाट रेल लाइन (141 किमी.) का निर्माण एक निजी कंपनी ‘बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा किया जाने वाला है. इसके जरिए रावघाट से भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए आयरन ओर की आपूर्ति की जाएगी. प्राप्त जानकारी के अनुसार जहां से फिलहाल आयरन ओर की आपूर्ति हो रही है, वहां अब करीब दो साल की आवश्यकता पूरी करने के लिए ही आयरन ओर बचा है. इस लाइन के निर्माण सहित पूरे नक्सल प्रभावित क्षेत्र की सुरक्षा और रखवाली के लिए पैरा मिलिटरी फोर्सेज के लगभग दस हजार जवान तैनात हैं.

    परंतु बताते हैं कि डीजी का कहना है कि अब इस लाइन के सुरक्षित निर्माण की जिम्मेदारी आरपीएफ को सौंपी जाएगी. इसी बात का जायजा लेने के लिए डीजी महोदय ने रेलवे का लाखों रुपया फूंककर इस क्षेत्र का हवाई निरीक्षण किया है. जबकि प्राप्त जानकारी के अनुसार द.पू.म.रे. के पास कुल 1700 आरपीएफ कर्मी हैं. सूत्रों का कहना है कि कुछ समय पहले द.पू.म.रे. आरपीएफ मुख्यालय की तरफ से छह हजार आरपीएफ कर्मियों की नई भर्ती हेतु जीएम को एक प्रस्तवा भेजा गया था. परंतु जीएम ने इसे कम करके मात्र 232 आरपीएफ कर्मियों की भर्ती की मंजूरी दी थी. सूत्रों ने बताया कि इन 232 को लेखा विभाग की अनुशंसा के बाद जब रेलवे बोर्ड को भेजा गया, तो रेलवे बोर्ड ने 232 की भी भर्ती को नामंजूर करते हुए फाइल वापस कर दी.

    जानकारों का अनुमान है कि आरपीएफ की लगभग 70 हजार की कुल सेंक्शन स्ट्रेंथ होने के बावजूद इसमें करीब 15 हजार सिपाहियों की शार्टेज पहले से ही चल रही है. जबकि लगभग इतनी ही संख्या में आरपीएफ सिपाही आरपीएफ एवं अन्य रेल अधिकारियों के बंगलों पर उनके बीवी-बच्चों की सेवा में तैनात हैं. ऐसे में कुल उपलब्ध अनुमानित 40-45 हजार आरपीएफ कर्मियों पर 12 हजार मेल/एक्स. ट्रेनों और करीब 10 हजार मालगाड़ियों सहित तमाम रेल कारखानों, रेलवे स्टेशनों, मरम्मत डिपो, साइडिंग्स इत्यादि रेल संपत्तियों के साथ ट्रेस पासिंग को रोकने तथा अदालती कार्यों की भी जिम्मेदारी है. यदि विभिन्न रेल अधिकारियों, खासतौर पर आरपीएफ अधिकारियों के बंगलों पर अनावश्यक और अनुत्पादक रूप से तैनात इन लगभग 15 हजार आरपीएफ कर्मियों को उनके बीवी-बच्चों की व्यक्तिगत गुलामी से मुक्त कर दिया जाए, तो यह 15 हजार जवान उपरोक्त तमाम जिम्मेदारियों को निभाने में काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं.

    जानकारों का कहना है कि आरपीएफ की भलाई वाले ऐसे जो आवश्यक कार्य हैं, और जो उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं, ऐसे कार्य करने में डीजी के पद पर आने वाले बाहरी अधिकारियों की कोई रुचि नहीं होती है. स्टेशनों के कथित निरीक्षण और अनुचित लाभ पाने के लिए वह अपना कीमती समय नष्ट करते हैं. हालांकि उनके इन तथाकथित निरीक्षणों का कोई औचित्य नहीं होता है. इस अलावा अन्य विभागों के अधिकारियों को भी उनके इन कथित निरीक्षणों से न तो कोई फर्क पड़ता है और न ही इसमें उनका कोई सहयोग होता है. जबकि वह ऐसे निरीक्षणों के दौरान भी आरपीएफ बैरकों को देखने जाने में अपनी तौहीन समझते हैं. स्टाफ वेलफेयर का पैसा जो आरपीएफ बैरकों को सर्व-सुविधासंपन्न बनाए जाने पर खर्च किया जाना चाहिए, उसका कोई हिसाब-किताब किसी को पता नहीं है कि वह कहां खर्च किया जा रहा है, जबकि स्टाफ बेनिफिट स्कीम का पैसा पिछले करीब 10-12 वर्षों से आरपीएफ स्टाफ को नहीं मिल पाया है.

    जानकारों का कहना है कि वर्तमान तथाकथित डीजी/आरपीएफ, जो कि फिलहाल कोई भी प्रशासनिक निर्णय लेने और कोई भी निरीक्षण करने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत नहीं हैं, ने भी रेलवे के आलीशान सैलून का उपभोग और रेलवे के खर्च पर हवाई भ्रमण या निरीक्षण शायद यही सोचकर कर लिया है कि ‘पता नहीं, 17 अगस्त के बाद यह मुफ्तखोरी करने को मिलेगी भी या नहीं.’ उनका कहना है कि यही सोचकर और ऐसे ही हवाई किले बनाकर तथा अपनी उच्चता कायम रखने के लिए ही तो संसद द्वारा पारित कानून को पिछले 30-32 सालों से धता बताकर यह बाहरी अधिकारी उक्त पद पर असंवैधानिक रूप से जबरन अपना कब्जा बनाए हुए हैं और आगे भी बनाए रखना चाहते हैं? जबकि इसमें रेलवे बोर्ड की अकर्मण्यता उनके लिए अत्यंत मुफीद साबित हो रही है.

सम्पादकीय