रेलयात्रियों की परेशानी का सबब बनी 'सुविधा ट्रेनें'

    ‘सुविधा ट्रेनों’ के नाम पर रेल प्रशासन कर रहा है रेलयात्रियों के साथ भयानक धोखाधड़ी

    अब तक चलाई गई सभी प्रीमियम या सुविधा ट्रेनों का वास्तविक ऑडिट किया जाना चाहिए

    रेलवे के यात्री किरायों को राज्य सड़क परिवहन की बसों के किराए के समकक्ष किया जाना चाहिए

    गोरखपुर ब्यूरो : भारतीय रेल के एक कथित समझदार पूर्व मेंबर ट्रैफिक द्वारा ‘प्रीमियम ट्रेनों’ के नाम से शुरू हुई रेलयात्रियों की लूट अब तथाकथित ‘सुविधा ट्रेनों’ के रूप में बदल गई है. हालांकि यह विचार न तो पहले सफल हुआ था, और न ही अब तक सफल हो पाया है. भले ही इन ट्रेनों का नाम बदलकर अब सुविधा ट्रेन कर दिया गया है. टिकट दलालों से यात्रियों को बचाने के नाम पर इन ट्रेनों की संपूर्ण टिकट बुकिंग इंटरनेट के जरिए हो रही है. तथापि, उनसे यात्रियों का बचाव फिर भी नहीं हो पा रहा है. इंटरनेट पर टिकट बुकिंग के समय यह ट्रेनें पूरी भरी हुई दिखाई देती हैं, मगर वास्तविकता में यह आधी से भी ज्यादा खाली चलाई जा रही हैं. तथापि इनमें यात्रियों से तीन से चार गुना किराया वसूला जा रहा है.

    इसके बावजूद तथाकथित ‘सुविधा’ के नाम पर इन ट्रेनों में यात्रियों को कोई सुविधा नहीं मिल पा रही है. कई कथित सुविधा ट्रेनों में पैंट्रीकार तक नहीं लगाई जा रही है. जबकि इनमें साफ-सफाई बिलकुल नहीं है. इन ट्रेनों को ज्यादातर कंडम कोचों को ठोंक-पीटकर चलाया जा रहा है. यात्रियों द्वारा की जा रही शिकायतों की कहीं भी और किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है. इसका ताजा उदाहरण सुविधा ट्रेन नं. 02504 में 27 मई को लखनऊ से न्यू जलपाईगुड़ी की यात्रा कर रहे डॉ. आई. ए. अंसारी द्वारा ट्रेन में की गई लिखित शिकायत में देखा जा सकता है. डॉ. अंसारी (पीएनआर नं. 2764814248) एक आपातकालीन स्थित में उक्त ट्रेन में यात्रा कर रहे थे. उन्होंने उक्त ट्रेन की सेकंड एसी की तीन टिकटों के लिए तीन गुना किराए (करीब 18,000 रुपए) का भुगतान किया था. तथापि ट्रेन में न तो पैंट्रीकार की सुविधा थी, न ही उनके कोच के किसी टॉयलेट में पानी था, और न ही ट्रेन चलने से पहले उनके कोच या पूरी ट्रेन में किसी प्रकार की साफ-सफाई की गई थी.

    डॉ. अंसारी ने पहले तो कोच कंडक्टर से इसकी शिकायत की. कंडक्टर ने उन्हें दो टूक शब्दों में सीधे रेलमंत्री को शिकायत भेजने को कह दिया. मगर चूंकि डॉ. अंसारी का अपना ट्विटर एकाउंट नहीं था, इसलिए उन्होंने कंडक्टर से शिकायत पुस्तिका देने को कहा. काफी देर की आनाकानी के बाद कंडक्टर ने उन्हें शिकायत पुस्तिका उपलब्ध कराई. शिकायत पुस्तिका में अपनी लिखित शिकायत में डॉ. अंसारी ने कहा है कि उन्होंने जब से लखनऊ से यात्रा शुरू की है, तभी से उनके कोच में पानी बिलकुल नहीं है. कोच में साफ-सफाई एकदम नहीं है. खाने की कोई व्यवस्था (सुविधा) नहीं है. उन्होंने लिखा है कि गंदे चादर, तकिए और कंबल दिए गए, जब इसकी शिकायत की गई तो कोच अटेंडेंट ने उन्हें बदलकर दिया. उन्होंने लिखा है कि गाड़ी में ‘सुविधा’ के नाम पर कुछ भी नहीं है, जबकि किराया तीन टिकट का लगभग 18,000 रुपया लिया गया है. उन्होंने लिखा है कि उन्हें इतने महंगे टिकट दिए गए, जबकि कोच की आधे से ज्यादा बर्थें लखनऊ से ही खाली आ रही हैं. डॉ. अंसारी ने अपना किराया वापस किए जाने की भी मांग की है.

    रेल प्रशासन इन ट्रेनों के बारे में जो कह रहा है उसका तात्पर्य यह है ‘कि यदि यात्री के पास रेलवे का कंफर्म टिकट नहीं है और इमरजेंसी में उसे यात्रा करनी है, तो उसे अपनी जेब कटवाने के लिए तैयार रहना चाहिए, हम उसकी जेब काटने के लिए बिलकुल तैयार बैठे हैं.’ डायनैमिक‍फेयर के नाम पर रेल प्रशासन अब हर सीजन में यात्रियों की जेब काटकर मुनाफा कमाने में जुट गया है. तथापि यात्रियों के साथ इन ट्रेनों के नाम पर धोखाधड़ी की जा रही है. यात्रियों को उनकी जरूरत के अनुसार सुविधा, स्पेशल, प्रीमियम जैसी कथित ट्रेनों में बर्थ तो मिल रही है, लेकिन इसके लिए उनको सामान्य से चार-पांच गुना ज्यादा किराया देना पड़ रहा है. पहले ऐसा पीक या त्योहारी सीजन में ही किया जाता था, उससे पहले रेलवे द्वारा ऐसे अवसरों पर सामान्य किराए पर ही विशेष ट्रेनें चलाई जाती थीं. लेकिन अब हर सीजन में यात्रियों को लूटने के लिए रेल प्रशासन ने सुविधा ट्रेनों के नाम पर नई धोखाधड़ी शुरू की है.

    इस विषय में बात किए जाने पर रेलवे के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने ‘रेलवे समाचार’ से कहा कि डायनैमिक फेयर का विचार रेलवे की आमदनी को बढ़ाने के लिए लाया गया है. कुछ रेलवे रूट ऐसे हैं, जिन पर हर सीजन में बर्थ की डिमांड ज्यादा होती है. जरूरत या पीक सीजन में बहुत से यात्री दलालों के जरिए टिकट लेने में टिकट के दाम का 3 से 4 गुना तक खर्च करते हैं. ऐसे में यह पैसा अब रेलवे के पास आ रहा है. उनका कहना था कि यह कंसेप्ट विमानन कंपनियों में काफी पहले से चल रहा है. जिन रूट पर डिमांड ज्यादा होती है और सीटें कम होती हैं, उन रूट पर डायनैमिक फेयर ज्यादा होता है. तत्काल टिकटों का भी 50 प्रतिशत कोटा इसके अंतर्गत लाया गया है. इन पर तत्काल किराए से करीब तीन गुना तक चार्ज किया जा रहा है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे ने दलालों पर लगाम लगाने के लिए कई उपाय किए हैं.

    उल्लेखनीय है कि रेलवे की नीति के अनुसार डायनैमिक फेयर पालिसी के अंतर्गत प्रीमियम या सुविधा ट्रेनों में हर 20 प्रतिशत टिकट बुकिंग के बाद किराया बढ़ा दिया जाता है. जैसे-जैसे सीटें कम होती जाती हैं, टिकटों के दाम बढ़ते जाते हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली से गोरखपुर या गोरखपुर से दिल्ली के लिए सामान्य एसी 3 का किराया करीब 1100 रुपए है. लेकिन इसके लिए अगले 7 से 10 दिनों के डायनैमिक फेयर 4200 रुपए तक है. डायनैमिक फेयर की शुरूआत करीब 3000 रुपए से होती है और हर 20 प्रतिशत बुकिंग पर यह बढ़ते-बढ़ते अंतिम 20 प्रतिशत के लिए 4200 रुपए तक हो जाती है. दूसरे बिजी रूट्स पर भी यही हाल है.

    परंतु यात्रियों की परेशानी यह है कि उन्हें हवाई जहाज के बराबर किराया खर्च कर मजबूरी में ट्रेन में 24-36-48 घंटों की यात्रा करनी पड़ रही है. सामान्य दिनों में दिल्ली-मुंबई रूट पर हवाई जहाज का किराया 4000 रुपए के करीब है, वहीं डायनैमिक फेयर के साथ एसी 3 का किराया इससे ज्यादा हो जाता है. ऐसा भी नहीं है कि इन ट्रेनों में सिर्फ पूरी सीट के लिए ही रेलवे द्वारा डायनैमिक फेयर लिया जा रहा है, बल्कि आरएसी सीट के लिए भी यात्रियों को कंफर्म सीट के बराबर ही डायनैमिक फेयर देना पड़ रहा है.

    हाल ही में रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने अपने एक बयान में कहा है कि सन 2020 तक वेटिंग टिकट के बजाय सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराने की योजना है. उन्होंने कहा कि 2020 तक सबको जरूरत के अनुसार कंफर्म बर्थ/सीट मिलेगी. यही बात रेल बजट के दौरान रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने भी कही थी कि रेलवे द्वारा ऐसे उपाय किए जा रहे हैं कि सन 2020 तक सबको बिना किसी परेशानी के ट्रेनों में कंफर्म बर्थ मिल जाए.

    रेल प्रशासन का हवाई यात्रा से रेल यात्रा की तुलना करना न सिर्फ निहायत असंगत बल्कि अनैतिक भी है. हवाई यात्रा में आदमी सामान्यतः तीन हजार और पीक सीजन में आठ से 12 हजार की हवाई टिकट पर अधिकतम दो से ढ़ाई घंटे में देश के किसी भी कोने में पहुंच जाता है, जबकि रेलवे द्वारा कथित सुविधा ट्रेनों में इतना किराया अब हर सीजन में लिया जाने लगा है, परंतु उसका यात्रा समय और अन्य सुविधाएं जैसी की तैसी ही नहीं बल्कि अत्यंत गई-गुजरी भी हैं. हवाई कंपनियां तो सप्ताह के दिनों और सप्ताहांत के हिसाब से भी डायनैमिक प्राइस वसूलती हैं. सप्ताह के दिनों की तुलना में सप्ताहांत पर उनका किराया 25 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

    उदाहरण के लिए दिल्ली से मुंबई का हवाई किराया अगर समय दिनों में 3500 रुपए है, तो यही सप्ताहांत में 4000 रुपए तक हो जाता है. शनिवार और रविवार में भी कुछ अंतर आ जाता है. त्योहारों के समय हवाई किराए में तीन से चार गुना तक बढ़ोतरी कर दी जाती है. जैसे सामान्य दिनों का किराया 3500 रुपए है, तो होली या दीवाली के समय यह 8,000 से 14,000 रुपए तक कुछ भी हो सकता है. तथापि हवाई कंपनियों जैसी सुविधा मुहैया करा पाना रेलवे के लिए फिलहाल दूर की कौड़ी ही कहा जा सकता है. अतः इस तथाकथित डायनैमिक फेयर पालिसी पर रेल प्रशासन को अविलंब पुनर्विचार करना चाहिए. इसके साथ ही अब तक चलाई गई सभी प्रीमियम या सुविधा ट्रेनों का वास्तविक ऑडिट किया जाना चाहिए.

    परंतु इसके साथ ही सर्वप्रथम यह भी सुनिश्चित किया जाना अत्यंत आवश्यक है कि भारतीय रेल सामाजिक-आर्थिक संगठन है या वाणिज्यिक? भारतीय रेल यदि सामाजिक-आर्थिक संस्था है, तो इसे अपने उपभोक्ताओं, ग्राहकों या उपयोगकर्ताओं को उपरोक्त तथाकथित ‘सुविधा ट्रेनों’ अथवा इस या उस मद के बहाने लूटना बंद कर देना चाहिए. और यदि वाणिज्यिक संस्था है, तो फिर भारतीय रेल के सती-सावित्री वाले चरित्र को तिलांजलि देकर शुद्ध रूप से पैसा कमाने वाली किसी बाजारू संस्था के रूप में सामने आकर तमाम राज्यों की ‘राज्य सड़क परिवहन सेवा’ यानि बसों के किराए के समकक्ष रेलवे का यात्री किराया सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इससे होगा यह कि लगभग मुफ्त में रेल की सवारी गांठने वाले कम दूरी के यात्री इससे छंटकर सड़कों/बसों की तरफ मुड़ जाएंगे, तब लगभग मुफ्त में अपनी जनता को मौज-मस्ती कराने वाली राज्य सरकारों को समझ में आएगा, जब उन्हें पर्याप्त और सुविधाजनक बसों का इंतजाम करना पड़ेगा. वरना तो भारतीय रेल ‘गरीब की जोरू और देश भर की भौजाई' बनी ही हुई है.

सम्पादकीय