प्रभु की मैनेज्ड पब्लिसिटी लगातार जारी

    अगले 6-7 महीनों में भारतीय रेल में ‘बिग बैंग रिफार्म’ होने का दावा कर रहे हैं सुरेश प्रभु

    जबकि ट्रेनसेट आयात करने का टेंडर भी अब तक फाइनल नहीं कर पाए हैं उनके अधिकारी

    चेयरमैन, रेलवे बोर्ड सहित रेलमंत्री के आदेशों का पालन नहीं करता है कोई भी रेलवे बोर्ड मेंबर

    मीडिया को प्रभु द्वारा बताई गई बातों का रेलवे के प्रत्यक्ष सुधार से कोई संबंध नहीं है..

    प्रधानमंत्री और पीएमओ की नजर में सिर्फ अपनी इमेज बनाए रखने के लिए कही गई हैं

    सुरेश त्रिपाठी

    पिछली बार जब ‘रेलवे समाचार’ ने 5 अक्टूबर 2015 को ‘बिहार चुनावों के बाद रेल मंत्रालय से बाहर हो सकते हैं सुरेश प्रभु’ और 12 अक्टूबर 2015 को ‘दुर्घटना से देर भली, सुरेश प्रभु को हटाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सही कदम होगा’ तथा 15 जनवरी 2016 को ‘नई बोतल में पुरानी शराब की तर्ज पर पुरानी बोतल में नया सोमरस’ शीर्षकों से रेलमंत्री सुरेश प्रभु द्वारा भारतीय रेल की की जा रही फोटोशॉपिंग की गहराई तक बखिया उधेड़ते हुए लगातार तीन विस्तृत खबरें प्रकाशित की थीं, उसके तुरंत बाद भारतीय रेल के समस्त जनसंपर्क अधिकारियों और महाप्रबंधकों एवं मंडल रेल प्रबंधकों को ‘मीडिया मैनेजमेंट’ में लगाकर देश भर के अखबारों और टीवी चैनलों पर सुरेश प्रभु ‘मैनेज्ड मीडिया पब्लिसिटी अभियान’ चलाकर प्रधानमंत्री की तारीफ हासिल करके बचने में कामयाब हो गए थे. इस बार आदर्श सोसाइटी मामले में सुरेश प्रभु का नाम आने के बाद जब ‘रेलवे समाचार’ ने अपने विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से 32 हेडिंग्स के साथ इसी महीने 4 मई को ‘ईमानदार, आदर्शवादी रेलमंत्री सुरेश प्रभु का आदर्श घोटाला’ शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की और संसद सत्र के बाद होने वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में प्रभु को रेल मंत्रालय से हटाए जाने की संभावना जताई, तब पुनः सुरेश प्रभु ने ‘मैनेज्ड मीडिया पब्लिसिटी’ का अपना पुराना अभियान शुरू कर दिया है. उक्त तीनों विस्तृत खबरें आज भी ‘रेलवे समाचार’ की वेबसाइट www.railsamachar.com मौजूद हैं.

    जहां रेलवे बोर्ड स्तर पर ट्रेनसेट आयात का टेंडर, जिसकी तारीख पहले दिसंबर 2015 तक और फिर 29 फरवरी 2016 तक आगे बढ़ाई गई थी, अब तक फाइनल नहीं हो पाया है, जहां आतंरिक प्रशासनिक और जमीनी स्तर पर भारतीय रेल में कोई दर्शनीय सुधार नजर नहीं आ रहा है, जहां न सिर्फ पूरी भारतीय रेल ट्विटर पर दौड़ रही है, बल्कि बच्चों को दूध पहुंचाकर, छोटे बच्चों को डायपर पहनाकर, बीमार यात्रियों को दवाईयां उपलब्ध करवाकर, जुकाम के लिए इन्हेलर देकर, तथाकथित साफ-सुथरे ट्रैक एवं प्लेटफार्मों की फोटो डालकर और फेवर एवं चापलूसी वाली तमाम ट्विट्स को रि-ट्विट करके बड़े पैमाने पर फोटोशॉपिंग के साथ मुफ्त की सस्ती लोकप्रियता हासिल की जा रही है, जहां सीआरबी सहित रेलवे बोर्ड का कोई भी मेंबर रेलमंत्री के आदेशों का पालन नहीं कर रहा है, डीजी/आरपीएफ की नियुक्ति और यूनियन पदाधिकारियों के तबादले इसका ज्वलंत और ताजे उदाहरण हैं, जहां पीएचओडी स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों का मात्र चार-पांच महीनों में ही अनावश्यक और मनमानी तबादला सिर्फ इसलिए कर दिया जाता है, क्योंकि कोई महाभ्रष्ट और चरित्रहीन महाप्रबंधक ऐसा चाहता है, मगर रेलमंत्री कुछ नहीं कर पाते हैं, जहां सिर्फ नए-नए निदेशालय और नए-नए पीएसयू बनाकर अधिकारियों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जा रही है, जहां ‘गतिमान एक्स.’ का डेढ़ साल बाद उदघाटन हो पाया हो, फिर भी वह निर्धारित समय पर अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पा रही है, वहां सुरेश प्रभु दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में कथित रूप से प्लांट किए गए एक इंटरव्यू में अगले 6-7 महीनों में भारतीय रेल में बहुत बड़ा रिफार्म (बिग बैंग रिफार्म) होने का दावा कर रहे हैं.

    रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने दावा किया है कि महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किया जा रहा है और इसके लिए अपॉइंटमेंट कमेटी ऑफ कैबिनेट (एसीसी) को पहले ही लिखा जा चुका है. जानकारों का कहना है कि प्रभु से यह पूछा जाना चाहिए कि जब उक्त दोनों पदों की नियुक्तियों के लिए बने पैनल्स को एसीसी ने उसकी संस्तुति के बाद रेलवे बोर्ड की वेबसाइट पर डाले जाने को कहा था, उस पर तो रेलमंत्री आज तक न तो रेलवे बोर्ड से अमल नहीं करवा पाए हैं, और न ही रेलवे बोर्ड से यह पूछ पाए हैं कि एसीसी के लिखित में कहने के बावजूद डीआरएम पैनल पर एसीसी की संस्तुति क्यों नहीं ली जा रही है? तब इसमें उन्होंने नया क्या किया है?

    इसके अलावा रेलमंत्री डीओपीटी के ओएम नं. 20011/1/2012-ईएसटीटी.(डी), दि. 04.03.2014 के दिशा-निर्देशों को रेलवे में आज करीब सवा दो साल बाद भी लागू नहीं करवा पाए हैं. जबकि पटना कैट को गलत, दिग्भ्रमित करने वाला और विरोधाभाषी स्पीकिंग ऑर्डर देने तथा डीजी/आरपीएफ की नियुक्ति एवं यूनियन पदाधिकारियों के नियम विरुद्ध तबादलों पर उनका आदेश न मानने वाले सीआरबी और बोर्ड मेंबर्स के खिलाफ रेलमंत्री कोई कदम नहीं उठा पाए हैं. यही नहीं, डीआरएम पैनल में पांच अधिकारियों के नाम कब और कैसे तथा किसके कहने पर शामिल किए गए, और पहले से शामिल अधिकारियों को दरकिनार करके उन अधिकारियों की पोस्टिंग भी कैसे कर दी गई, यह रेलमंत्री को पता होने के बाद भी उन्होंने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया. जबकि इसमें बहुत बड़े पैमाने पर लेनदेन और भारी भ्रष्टाचार हुए होने की पुख्ता खबर है. डीआरएम पोस्टिंग से दरकिनार किए गए एक अधिकारी ने रेलवे बोर्ड के खिलाफ एससी/एसटी कमीशन में शिकायत भी दर्ज करवाई है, यह भी शायद रेलमंत्री को पता नहीं होगा.

    रेलवे में घटते यात्रियों के बारे में सुरेश प्रभु का कहना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि अपर क्लास के यात्री हवाई जहाज की तरफ और लोअर क्लास के यात्री सड़क परिवहन की ओर जा रहे हैं. जानकारों का कहना है कि अब इस सीए का सीमित दिमाग रखने वाले और हर चीज को सीए की ही नजर से देखने वाले मंत्री को यह कौन समझाएगा कि अपर क्लास के यात्री भारी-भरकम किराया देने के बावजूद ट्रेनों के अपर क्लास कोचों में गंदगी, घटिया खानपान व्यवस्था और गुणवत्ताविहीन सर्विस, चारों तरफ घूमते काक्रोच, कूपे में उड़ते हुए मच्छर और मक्खियों तथा ट्रेन ट्रेवल में लगने वाले 26-36-40 घंटों के समय के कारण हवाई यात्रा की तरफ मुड़ रहे हैं, न कि अपनी मर्जी से जा रहे हैं. जबकि लोअर क्लास के यात्री सड़क की तरफ इसलिए नहीं जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें वहां बहुत बढ़िया और आरामदायक तथा सस्ता सफर मिल रहा है, बल्कि इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि प्रभु की रेल अथवा प्रभु के अकर्मण्य रेल अधिकारी उन्हें ट्रेनों में उचित जगह (बर्थ/सीट) नहीं मुहैया करा पा रहे हैं. इसके अलावा इन कथित लोअर क्लास के लोगों/यात्रियों की भी आय में पर्याप्त वृद्धि हुई है, जिससे अब उन्हें भेड़-बकरियों की तरह प्रभु की रेल में यात्रा करना मंजूर नहीं हो रहा है.

    जहां तक भारतीय रेल में निजी निवेश की बात है, तो पिछले डेढ़-दो सालों में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का डेढ़ लाख करोड़ का एकमात्र निवेश होने के अलावा कोई अन्य निजी निवेश नहीं आया है. एलआईसी के निवेश को निजी निवेश नहीं कहा जा सकता है. यह सरकार का सरकार द्वारा सरकार को अपने एक हाथ से दूसरे हाथ को दिया गया पैसा है, जिसका भारी-भरकम व्याज भारतीय रेल को ही चुकाना पड़ेगा. जबकि तमाम दावों के बाद भी किसी भी तरह का निजी निवेश अब तक भारतीय रेल में नहीं हुआ है. जहां तक मधेपुरा और मढौरा के डीजल एवं विद्युत् इंजनों के कारखानों में अमेरिकी जीई और फ्रांस की अल्स्टोम कंपनियों के निवेश की बात है, तो प्रभु भी खुद यह स्वीकार कर रहे हैं कि वहां अभी तक सिर्फ कथित भूमि-पूजन ही हुआ है, जबकि यह दोनों कारखाने विदेशी कंपनियों को देकर प्रभु ने अपने वाराणसी और चितरंजन स्थित डीजल एवं इलेक्ट्रिक इंजनों के कारखानों को बंद होने की तरफ धकेलकर इनके हजारों कर्मचारियों सहित देश के सामने बेरोजगारी बढ़ाने का उपक्रम किया है. कोचों के आयात से प्रभु ने न सिर्फ देश की कीमती विदेशी मुद्रा को खर्च करने और घोटालों को बढ़ावा देने, बल्कि हर प्रकार के कोच निर्माण करने में पूरी तरह से सक्षम कई देशी कंपनियों को भी बंद होने की तरफ ढकेल दिया है. इसके अलावा भारतीय रेल द्वारा जो उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश में नई कोच फैक्ट्रियां स्थापित की जा रही हैं, उनका क्या होगा?

    भारतीय रेल में सुधारों की धीमी गति पर किसी मंजे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की तरह बहुत कुछ छिपाते हुए रेलमंत्री प्रभु कुछ इस तरह प्रदर्शित करते हुए कहते हैं कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ घटित हो रहा है, मगर फिलहाल वह उसका खुलासा नहीं करना चाहते हैं. वह इस बारे में वह सिर्फ रेलवे बोर्ड की रिस्ट्रक्चरिंग, एकाउंटिंग सुधार और रेगुलेटर की स्थापना की बात कहते हैं, ये सब प्रोसेस में हैं. रेलवे में एकाउंटिंग का सुधार बहुत पहले से चल रहा है, जो कि अब लगभग पूरा हो गया है. जहां तक रेलवे बोर्ड की रिस्ट्रक्चरिंग की बात है, तो जानकारों का कहना है कि एक तरफ दोनों मान्यताप्राप्त लेबर फेडरेशन लिखित में देकर इसके तौर-तरीकों का विरोध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ नए-नए डायरेक्टरेट स्थापित किए जाने को रिस्ट्रक्चरिंग की संज्ञा नहीं दी जा सकती है. इसके अलावा तमाम वरिष्ठ रेल अधिकारी भी अब सुरेश प्रभु को एक अक्षम और दिग्भ्रमित मंत्री मानने लगे हैं. उनका कहना है कि रेलमंत्री जो कर रहे हैं, उसे सिर्फ कुछ कॉर्पोरेट घरानों के इशारों पर रेलवे को टुकड़ों में बांटकर उनका हितसाधन और भारतीय रेल का बंटाधार करने का प्रयास कहा जा सकता है. रेलमंत्री अधिकारियों के विभिन्न कैडरों के मर्जर पर जल्दी ही कैबिनेट में एक प्रस्ताव ले जाने की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि चूंकि अधिकारियों के मामले में यूपीएससी का दखल है, इसलिए इस मामले में उसकी भी मंजूरी लेनी होगी.

    इसके अगले कदम के रूप में वह मेंबर पैसेंजर बिजनेस और मेंबर फ्रेट की दो नई पोस्टें बनाए जाने की बात भी कह रहे हैं. जानकारों का कहना है कि यह भी अधिकारियों की संख्या बढ़ाने वाली ही बात है, जिसका कोई प्रत्यक्ष फायदा रेलवे को नहीं होने वाला है. उनका कहना है कि जब रेलवे में यात्री ही नहीं रहेंगे, तो मेंबर पैसेंजर बिजनेस किस बात का बिजनेस करेगा और जब रेलवे की अधिकांश माल ढुलाई सड़क की तरफ जा रही है और जब रेलवे में माल ही नहीं आएगा, तो मेंबर फ्रेट कौन सी माल ढुलाई करके रेलवे की आय बढ़ाएगा? यह निश्चित रूप से ‘स्टोरकीपर’ द्वारा दिया गया सुझाव लगता है, जिसकी प्रकृति ही यह जता रही है कि यह दोनों नए पद खरीदी-बिक्री से संबंधित अधिकारियों के भले के लिए ही बनाए जा रहे हैं. जबकि नीचे स्तर पर 33 साल की सेवा अथवा 55 साल की आयु होने पर तमाम रेलकर्मियों को घर भेजे जाने की प्रक्रिया भी प्रभु ने चला रखी है. इसका तात्पर्य यह है कि निकट भविष्य में भारतीय रेल की अपनी समस्त विशेषता खत्म होने वाली है और टुकड़ों में इसे निजी कॉर्पोरेट घरानों को सौंपा जाने वाला है.

    प्रभु ने यूपीए सरकार की ‘रेलवे टैरिफ अथॉरिटी’ की जगह सीए के खुराफाती दिमाग का इस्तेमाल करते हुए इसका दायरा बढ़ाकर इसे एनडीए की ‘रेलवे डेवलपमेंट अथॉरिटी’ बनाए जाने का प्रस्ताव दिसंबर 2015 में किया था, जिस पर लगभग छह महीनों से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी प्रभु कह रहे हैं कि अब तक उस पर तथाकथित ‘स्टेक होल्डर्स’ के विचार आमंत्रित किए जा रहे हैं. जहां तक महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों की चयन प्रक्रिया बदले जाने की बात है, तो इस पर प्रभु कहते हैं कि इस बारे में एसीसी को लिखा गया है. जबकि सच यह है कि जहां पांच-पांच, छह-छह महीनों से महाप्रबंधकों के पद खाली पड़े हैं, और 31 मार्च 2016 तक जीएम पैनल अलाइव होने के बावजूद प्रभु उनकी नियुक्ति नहीं कर पाए हैं, वहीं 19 मंडल रेल प्रबंधकों की नियुक्ति में करीब आठ महीनों की अक्षम्य देरी हुई है. उसमें भी भ्रष्टाचार और जोड़तोड़ के साथ पांच अधिकारियों के नाम अलग से जोड़कर उन्हें पोस्टिंग भी दे दी गई है. जबकि इस पर कैट के आदेश को रेलवे बोर्ड ने ताक पर रख दिया और उसे जवाब देना भी जरुरी नहीं समझा. जानकारों और कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि प्रभु को इस सबसे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उन्हें तो अपनी फर्जी बयानबाजी और फोटोशॉपिंग के जरिए प्रधानमंत्री को कुछ इस तरह से प्रभावित करना है कि उनकी काबिलियत पर कोई आंच आए बिना कैबिनेट में उनका स्थान सुरक्षित बना रहे, जबकि उक्त दोनों नियुक्तियों अथवा चयन के लिए एसीसी द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन न करने वाले रेलवे बोर्ड को प्रभु मुर्गा नहीं बना पा रहे हैं.

    रेल परियोजनाओं के अमल में हो रही देरी पर प्रभु का गर्व पूर्वक कहना है कि पिछले दो सालों में रेलवे में जो सुधार हुआ है, वह आजादी के बाद हुआ पहला तेज सुधार है, ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था. इस पर कई कार्यरत और सेवानिवृत्त वरिष्ठ रेल अधिकारियों का कहना है कि इसका मतलब यह है कि प्रभु से पहले हुए सभी रेलमंत्री अक्षम, अनपढ़, गंवार और नाकाबिल थे, बस वही एक हैं जो कि पिछले एक-डेढ़ साल में भारतीय रेल को एकदम से उठाकर आसमान में पहुंचा दिए हैं. प्रभु कहते हैं कि उनके कार्यकाल में 85% कैपिटल एक्सपेंडिचर हुआ है. इस पर अधिकारियों का कहना है कि अब प्रभु को कौन बताए कि यह तथाकथित कैपिटल एक्सपेंडिचर ऐसी तमाम अनुत्पादक मदों में हो रहा है, जिनसे रेलवे को कोई फायदा नहीं मिल रहा है. प्रभु कहते हैं कि टेंडर फाइनल करने की समयावधि में कमी आई है. जबकि अधिकारी कहते हैं कि प्रभु को किसी भी जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है, और न ही वह यह सब जानना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें जमीनी हकीकत से कोई लेनादेना ही नहीं है. उन्हें क्या मालूम है कि उनकी नाक के नीचे उत्तर रेलवे निर्माण संगठन में बैठे कुछ अधिकारी न सिर्फ एक-एक टेंडर फाइनल करने में सालों लगा रहे हैं, बल्कि लोएस्ट को कोई बायपास करके अपने फेवरिट को टेंडर देने के लिए कितनी तिकड़म कर रहे हैं और चालू टेंडर को सिर्फ इसलिए टर्मिनेट कर दिए हैं कि टेंडरर ने उन्हें मुंह-मांगा कमीशन नहीं दिया, जिससे उक्त कार्य दो साल पिछड़ चुका है.

    अधिकारियों का कहना है कि प्रभु वाराणसी स्थित डीएलडब्ल्यू में पहले के 500 दिनों की अपेक्षा अब 88 दिनों में टेंडर फाइनल होने का उदाहरण इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि वाराणसी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है और इससे प्रधानमंत्री का ध्यान तुरंत उनकी कथित काबिलियत पर जाएगा. जबकि यह कतई सच नहीं है. और यदि है भी, तो एकाध ऐसे कार्य को उनकी अथवा उनके अकर्मण्य अधिकारियों की काबिलियत का पैमाना नहीं माना जा सकता है. प्रभु कहते हैं कि यदि सुधार की गति धीमी है, तो प्रतिदिन 7 किमी. ट्रैक बिछाने को क्या कहा जाएगा, जबकि उनके आने से पहले यह गति प्रतिदिन मात्र 4.3 किमी. की थी. इस पर अधिकारियों का कहना है कि प्रभु और उनके ना-काबिल मेंबर इंजीनियरिंग दोनों मिलकर देश को और जनता को न सिर्फ मूर्ख बना रहे हैं, बल्कि ऐसा कहकर उन्हें दिग्भ्रमित भी कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि एक तो रेलवे बोर्ड मेंबर द्वारा उन्हें बताया गया यह आंकड़ा फर्जी हो सकता है, दूसरे जहां चीन द्वारा रोजाना 70 किमी. ट्रैक बिछाया जा रहा हो, वहां भारतीय रेलमंत्री द्वारा प्रतिदिन मात्र 7 किमी. ट्रैक बिछाए जाने को लेकर अपनी पीठ कुछ ऐसे ठोंकी जा रही है जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है, जबकि रोज 7 किमी. ट्रैक बिछाने की बात रेलमंत्री को बताने वाले बोर्ड मेंबर्स को शर्म से डूब मारना चाहिए.

    रेलमंत्री कहते हैं कि डीएफसी का निर्माण अपने पूर्व निर्धारित समय 2019 में पूरा हो जाएगा. मगर उसका क्या होगा जो उन्होंने अभी एक और नया कॉरिडोर सेंक्शन किया है? जबकि 2019 में डीएफसी का संपूर्ण निर्माण कार्य पूरा होना संभव नहीं लगता है. जानकारों का कहना है कि वर्ष 2019 में सत्ता में रहें या न रहें, मगर प्रभु भी यहीं इसी देश में रहेंगे, और हम भी, तब देखेंगे कि वह कितना सही अनुमान और कितनी सही भविष्यवाणी कर लेते हैं? उनका कहना है कि प्रभु भी अब बार-बार यह कहकर मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह बयानबाजी करने लगे हैं कि वह सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि उन पर अमल भी कर रहे हैं, ऐसा उनसे पहले किसी भी रेलमंत्री ने नहीं किया था.

    उन्होंने कहा कि यह सही है कि प्रभु के समय में विभिन्न रेल परियोजनाओं के अमल में तेजी आई है, मगर उनका यह कहना सही नहीं हो सकता है कि सिर्फ वही काम कर रहे हैं, सिर्फ वही काबिल हैं, बाकी सब नकारे रहे हैं. उन्होंने कहा कि प्रभु का यह कहना भी काफी हद तक सही है कि वह दोहरीकरण और तिहरीकरण की उन तमाम विलंबित रेल परियोजनाओं पर अमल कर रहे हैं, जो कि बहुत पहले सेंक्शन की गई थीं. उनका कहना है कि यह काम कभी तो होना था, जो कि अब प्रभु के हिस्से में आया है, तो उन्हें ही करवाना होगा, शायद इसी तरह अगले टर्म की भी सत्ता हासिल हो जाए. उन्होंने यह भी कहा कि यह तो सुनिश्चित है कि मोदी सरकार को सत्ता का अगला टर्म मिलना रेल मंत्रालय की सफलता और असफलता पर ही निर्भर करेगा, क्योंकि मोदी जी ने रेलवे को लेकर बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें देश भर की जनता के मन में पैदा कर दी हैं. कई अधिकारियों का यह भी कहना है कि प्रभु द्वारा अन्य जो बातें कही गई हैं, उनका भारतीय रेल के प्रत्यक्ष सुधार से कोई संबंध नहीं है. वह सब प्रधानमंत्री और पीएमओ की नजर में प्रभु द्वारा सिर्फ अपनी इमेज बनाने के लिए कही गई हैं.

सम्पादकीय