सिस्टम पर हावी भ्रष्टाचार, सिस्टम लाचार !!

    ‘गरीबी हटाओ’ की तर्ज पर ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ भी बना जुमला

    किंकर्तव्यविमूढ़ दिखी सीबीआई, हाई कोर्ट को लेना पड़ा संज्ञान

    सीबीआई ट्रैप में फंसने से बच गया किस्मत का धनी ‘सुब्बाराव’

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था पर भ्रष्टाचार बुरी तरह हावी है. सभी राजनीतिक पार्टियां ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ का नारा बहुत जोरशोर से बुलंद करती हैं. परंतु सत्ता में आने के बाद वास्तविक धरातल पर वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करती नजर नहीं आतीं. ऐसे में यदि यह कहा जाए कि ‘गरीबी हटाओ’ की तर्ज पर ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ का नारा भी एक राजनीतिक जुमला बनकर रह गया है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. वर्तमान केंद्र सरकार ने भी सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद भी इस विषय पर लगभग हर मंच से बहुत गाल बजाए हैं, परंतु जमीनी स्तर पर इसने भी उतना काम नहीं किया, जितना कि वास्तव में किया जाना चाहिए था, यानि भ्रष्टाचार मिटाने या कम करने के लिए जो इच्छाशक्ति दर्शाई जानी चाहिए थी, वह इस सरकार ने भी नहीं दिखाई.

    भारतीय रेल भी इसका अपवाद नहीं है, बल्कि रेलवे का भ्रष्टाचार इसलिए ज्यादा सार्वजनिक रूप से परिलक्षित होता है, क्योंकि यह जन-सामान्य से जुड़ा एक बड़ा और महत्वपूर्ण महकमा है. यदि पिछले पांच साल के कामकाज को देखा जाए तो रेलवे में इस दरम्यान भ्रष्टाचार कम होने के बजाय लगभग पांच गुना बढ़ा है. स्थिति यह है कि रेलवे विजिलेंस पर किसी रेलकर्मी को ही भरोसा नहीं रह गया है. जहां तक सीबीआई और सीवीसी की बात है, तो इन दोनों शीर्ष जांच एजेंसियों की भी साख पिछले पांच वर्षों के दरम्यान कम ही हुई है. तथापि सामान्य आदमी सहित सरकारी कर्मचारियों को अपने विभागीय विजिलेंस सिस्टम की अपेक्षा आज भी सीबीआई एवं सीवीसी पर ही ज्यादा भरोसा है. मगर जब लगातार तीन महीनों तक किसी महाभ्रष्ट सरकारी अधिकारी को रंगेहाथ पकड़ने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत-मशक्कत करने के बाद भी सिर्फ राज्य सरकार की कोताही से उसका सारा परिश्रम व्यर्थ चला जाता है, तब उंगली सीधे राजनीतिक तिकड़म पर ही उठती है.

    यह मामला है दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर मंडल का. जहां वरिष्ठ मंडल विद्युत् अभियंता, ऑपरेशन (सीनियर डीईई/ऑप.) सुब्बाराव (प्रमोटी ग्रुप-ए अधिकारी) ने लोको निरीक्षक के पदों पर पदोन्नति देने के लिए अपनी रिश्वत का रेट चार से पांच लाख रुपये निर्धारित किया था और ‘ग्राहक’ सेट करने अथवा पटाने के लिए अपने कुछ दलाल भी लोको पायलट्स के बीच छोड़ दिए थे. एक ड्राइवर ने इसकी शिकायत सीबीआई से कर दी. सीबीआई ने लगातार तीन महीनों तक उक्त ड्राइवर और दलाल के बीच हो रही बातचीत एवं ‘बारगेनिंग’ को रिकॉर्ड किया. जब सब कुछ सुनिश्चित हो गया और सुब्बाराव को ट्रैप करने का समय आ गया, तो राज्य सरकार के चीफ सेक्रेटरी ने सीबीआई को ट्रैप की अनुमति देने में देरी कर दी, जो कि अंततः अब तक भी नहीं मिली है.

    इस दरम्यान शिकायतकर्ता ने द.पू.म.रे. के वरिष्ठ उप-महाप्रबंधक एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी (एसडीजीएम/सीवीओ) अमित कुमार सिंह को व्यक्तिगत रूप से मिलकर उन्हें एक और लिखित शिकायत देकर उनसे सुब्बाराव के खिलाफ उचित कदम उठाने और कम से कम परीक्षा रद्द करके पुनः परीक्षा कराए जाने का अनुरोध किया, मगर उन्होंने इसे ट्रैप केस बताकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लिया. तत्पश्चात शिकायतकर्ता ने महाप्रबंधक/द.पू.म.रे. सुनील कुमार स्वोइन को भी एक अलग शिकायत देते हुए उनसे उक्त गंभीर मामले में हस्तक्षेप और अविलंब उचित कार्यवाही करने का निवेदन किया. परंतु जो खुद पहले से ही बड़ा कदाचारी हो, वह कैसे अपनी ही ‘बिरादरी’ और अपने कैडर के ही अधिकारी के विरुद्ध कोई कदम उठा सकता है? फलस्वरूप महाप्रबंधक के यहां से भी शिकायतकर्ता को नाउम्मीद ही होना पड़ा.

    इसके बाद हताश-निराश शिकायतकर्ता को अब अपनी नौकरी और जान के भी लाले पड़ते नजर आने लगे थे, क्योंकि इस दरम्यान उसकी इन समस्त गतिविधियों की भनक सुब्बाराव और उनके दलालों को लग चुकी थी. हालांकि इसकी ज्यादा आशंका सीबीआई द्वारा बनाए गए गवाहों पर है कि उन्होंने ही सम-प्रांतीय और सम-भाषी होने के नाते इसकी जानकारी सुब्बाराव को लीक की होगी? इसके बाद शिकायतकर्ता ने अपने बचाव का अन्य कोई रास्ता न देख सीधा छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संपर्क करके उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया. हालांकि चीफ जस्टिस ने पहले तो यह कहकर मामले से किनारा करने की कोशिश की कि इस पर वह सीधे कुछ नहीं कर सकते हैं. परंतु जब शिकायतकर्ता ने मामले की समस्त पृष्ठभूमि समझाते हुए अपने बचाव का अन्य कोई रास्ता नहीं होने का हवाला देकर अनुनय-विनय की, तब चीफ जस्टिस ने उसकी शिकायत को जनहित याचिका में बदलने पर सहमत होते हुए ‘अच्छा कुछ करता हूं’ कहकर उसे रुखसत कर दिया.

    उस दिन हाई कोर्ट में उपस्थित एक स्थानीय दैनिक के प्रतिनिधि को इस मामले की भनक लग गई और उसने इससे संबंधित एक खबर अगले दिन प्रकाशित कर दी. इसके परिणामस्वरूप द.पू.म.रे. एवं बिलासपुर मंडल मुख्यालय में भारी हड़कंप मचा. इससे पहले चूंकि सुब्बाराव एवं उनके दलालों को मामले की खबर लग चुकी थी, अतः उन्होंने शिकायतकर्ता और एक व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ पुलिस में फर्जी मामला दाखिल करा दिया. परंतु जब चीफ जस्टिस के कहने पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के अतिरिक्त रजिस्ट्रार संतोष कुमार तिवारी ने 2 अप्रैल को एसपी/बिलासपुर, एसपी/सीबीआई, रायपुर और जीएम/द.पू.म.रे. को पत्र (सं. 3782/2-15-17/2019/पीआईएल सेल/136) लिखकर मामले का संज्ञान लेते हुए उचित कार्रवाई करने का आदेश दिया, तो न सिर्फ शिकायतकर्ता और व्हिसल ब्लोअर के विरुद्ध फर्जी पुलिसिया कार्यवाही पर लगामलग गई, बल्कि उक्त तीनों प्राधिकारों द्वारा उक्त पत्र का संज्ञान लेते हुए फौरी कार्यवाही शुरू की गई. तथापि नतीजा अब तक शून्य ही है.

    हालांकि रेलवे में विभागीय प्रमोशन देने के लिए घूसखोरी की अक्सर तमाम चर्चाएं होती रहती हैं, और यह भी सही है कि ग्रुप-सी की विभिन्न श्रेणियों से लेकर ग्रुप-बी अधिकारियों तक के प्रमोशन रिश्वतखोरी से मुक्त नहीं हैं. द.पू.म.रे. बिलासपुर मंडल में भी इसका जो नंगा नाच देखने में आया है, वह भी कतई आश्चर्य पैदा नहीं कर रहा है. सीनियर डीईई/ऑप. सुब्बाराव ने तो बिलासपुर मंडल में आते ही घूसखोरी का ऐसा तांडव मचाया कि ठेकेदार ही नहीं, बल्कि उनके मातहत कर्मचारी भी रिश्वतखोरी के प्रति उनकी हवस से हैरान-परेशान होने लगे थे. इससे पहले नागपुर मंडल में भी इसी पद पर रहते हुए उन्होंने तमाम दलाल पैदा किए थे और ट्रांसफर, पोस्टिंग तथा डीएआर मामलों में खूब पैसा बनाया था. बाद में वहीं इलेक्ट्रिक जनरल में रहकर 250 रुपये वाली ट्यूब लाइट को विदेशी ब्रांड, जो भारत में उपलब्ध ही नहीं थी, बताकर 1175 रुपये में खरीद कर पूरे नागपुर मंडल में लगवा दिया. इस पर सीबीआई नागपुर (पत्र सं. मिस्लेनिअस/कंप्लेंट/सीबीआई/2017/558) द्वारा आज भी जांच लंबित है.

    बिलासपुर मंडल में सीनियर डीईई/ऑप. के पद पर पदस्थ होते ही सुब्बाराव ने सबसे पहले मुख्य क्रू-नियंत्रक एवं एक लोको निरीक्षक को अपना दलाल नियुक्त किया, जो 24 घंटे उन्हीं की सेवा में उनके ही इर्द-गिर्द बने रहते हैं. इसके बाद उन्होंने यहां अपनी घूसखोरी का तांडव शुरू किया. एक सहायक चालक, जिसका नाम प्रमोशन लिस्ट में 82वें नंबर पर था, को घूस लेकर प्रमोशन पर बिजुरी भेज दिया. जबकि 38 से 81 नंबर तक के लोग चिल्लाते रह गए. रनिंग रूम के एक ठेके को 99.9% नीचे के रेट में दे दिया. इन सब मामलों की सीवीसी जांच जारी है.

    बताते हैं कि सुब्बाराव ने बिलासपुर में पदस्थ होने के तुरंत बाद ही ऑन रिक्वेस्ट ट्रांसफर एप्लीकेशन फॉरवर्ड करने के लिए 20 हजार रुपये, एक से दूसरे स्टेशन पर ट्रांसफर के लिए 50 हजार रुपये, सजा कम या माफ करने के लिए आरोप के मुताबित 20 हजार से 4 से 5 लाख रुपये, इत्यादि स्तर पर घूसखोरी के विभिन्न रेट तय कर दिए थे. बताते हैं कि उनकी इस आदत की जानकारी उच्च अधिकारियों को भी थी. इसीलिए उन्हें यहां पोस्टिंग देते समय समझाईस भी दी गई थी, लेकिन आदतन घुसखोर कोई अधिकारी अपनी यह लत आसानी से कहां छोड़ पाता है?

    बताते हैं कि मामला गंभीर तब हो गया, जब उन्हें बिलासपुर मंडल में कुल 363 लोको पायलटों में से 17 लोको निरीक्षकों के चयन का जिम्मा सौप दिया गया. परीक्षा का शेड्यूल 15 जनवरी से 18 मार्च तक प्रत्येक सोमवार को होना तय हुआ. इसके लिए उनके दलाल उनके घर जाकर सौदा तय करने लगे. सूत्र बताते हैं कि किस्तवार रकम भी पहुंचाई जाने लगी थी. इस सबकी जानकरी होने पर रनिंग स्टाफ में भूचाल आ गया कि इस तरह तो निष्पक्ष चयन होना नामुमकिन है. इसी बीच एक ड्राइवर ने उनको जेल की हवा खिलाने का निश्चय किया. उसने उनके नागपुर वाले सबसे प्रिय दलाल, जिसको उन्होंने ही लोको निरीक्षक बनाया था, से संपर्क किया. दलाल ने साहब (सुब्बाराव) से बात कर सीट पक्की कर ली. दलाल ने उक्त ड्राइवर को वेरिफिकेशन के लिए दुर्ग बुलाया और उससे रेलवे आईडी एवं आधार कार्ड की झेरॉक्स कॉपी भी ले ली, जिसे साहब के पास भेज कर पक्का करवाया.

    इसके बाद दलाल और ड्राइवर के बीच बातचीत का सिलसिला मुक्त रूप से होने लगा. यदि इस तमाम बातचीत का व्यौरा कागज पर लिखा जाए, तो कई पन्नों में होगा. हालांकि ‘रेल समाचार’ के पास यह सारा व्यौरा सुरक्षित है. कानूनी कार्यवाही का सिलसिला दि. 20.01.19 से तब शुरू हुआ था, जब इसकी विधिवत शिकायत सीबीआई/एसीबी रायपुर को लिखित में की गई. सीबीआई अधिकारियों की एक बड़ी टीम ने बतौर स्वतंत्र गवाह दो अन्य विभागों के अधिकारियों की मौजूदगी में बिलासपुर में अपनी कार्यवाही शुरू की. दलाल शिकायतकर्ता को हिदायत देता रहा कि साहब घर पर 10 से 10.15 बजे बुलाए हैं. यह बस एक फार्मैलिटी है कि किसी को प्रमोशन दे रहे हैं, तो उसे एक बार ठीक से देख लेना चाहते हैं. दलाल ने साथ में यह भी हिदायत दी कि साहब से पैसे की बात मत करना, साहब खुद ही उसके माध्यम से बता देंगे कि उसको आगे क्या करना है. इसके बाद दलाल ने तुरंत बंगले का नंबर और लोकेशन साहब से पूछकर ड्राइवर (कंडीडेट) को बता दिया.

    शिकायतकर्ता ड्राइवर साहब के बंगले पर बताए गए समय से पहुंच गया. साहब से मिलने का यह सारा घटनाक्रम पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ही संपन्न हुआ. साहब ने ड्राइवर को यह कहकर रुखसत कर दिया कि बाकी बातें वह दलाल से ही कर ले. दलाल ने खुद फोन करके ड्राइवर को बताया कि साहब ने ओके कर दिया है, अब पैसे का इंतजाम कर लो. यह पूछने पर कि कितना पैसा देना है, दलाल ने कहा कि वह साहब से पूछकर कल बताएगा.

    अगले दिन 21.01.19 को फोन करके दलाल ने ड्राइवर को बताया कि साहब बोले हैं कि 4 से 5 लाख लगेगा. यह कहने पर कि यह तो बहुत ज्यादा है. दलाल ने कहा कि साहब बोले हैं कि इतना ही वह अन्य लोगों से भी ले रहे हैं, क्योंकि इसमें से उन्हें सीनियर डीपीओ को भी देना पड़ता है. जब पूछा गया कि क्या किस्तों में दे सकते हैं, तो दलाल ने कहा कि नहीं, साहब इकठ्ठा ही लेते हैं और डायरेक्ट पार्टी से कभी नहीं लेते. इसके बाद दलाल ने उससे कहा कि तुम जितना जल्दी हो सके, पैसे का इंतजाम कर सीट सुरक्षित कर लो, मैं बिलासपुर आकर खुद साहब को पैसा देने जाऊंगा. उसने यह भी हिदायत दी कि परीक्षा में उतना ही लिखना, जितना आता हो, बाकी खाली छोड़ देना, जो बाद में साहब कैसे करना है उसे देख लेंगे. इस तरह से घूस से संबंधित तमाम बातें रिकार्ड कर सीबीआई ने सील बंद कर ली. अब सिर्फ घूस की रकम देकर साहब को रंगेहाथ पकड़ने की मामूली प्रक्रिया ही बाकी रह गई थी.

    इसी बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में बिना अनुमति कोई भी कार्यवाही करने पर सीबीआई पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे सीबीआई ने दि. 28.01.19 को अनुमति के लिए एक पत्र राज्य सरकार के चीफ सेक्रेटरी को लिखा, लेकिन राज्य शासन ने राजनीतिक कारणों से अनुमति को अब तक लंबित रखा है. जबकि सीबीआई ने दि. 05.03.19 को पुनः स्मरण पत्र दिया. उधर साहब को रंगेहाथ पकड़ने का अवसर तो अब निकल चुका था, लेकिन सूत्र बताते हैं कि सीबीआई ने इस स्तर तक जो कार्यवाही किया है, उससे अपराध तो सिद्ध हो चुका है. उधर कार्यवाही में देरी के कारण साहब को इन सारी गतिविधियों की जानकारी मिल चुकी थी. साहब ने अपने विभाग के एक बाबू का आपात आरक्षण करवाकर और उसकी ड्यूटी दिखाकर सारा माल एक सूटकेस में भरकर हैदराबाद अपने सगे-संबंधी के पास भेज दिया. चूंकि यह घूसखोर साहब उक्त ड्राइवर का बॉस है और मामला अधर में लटका है, यह देखकर ड्राइवर ने खुद दि. 14.03.19 को राज्य के मुख्य सचिव से मिलकर आग्रह किया कि यदि राज्य शासन सीबीआई को अनुमति नहीं दे रहा है, तो राज्य के एसीबी से आगे की कार्यवाही की जाए, क्योकि यदि कोई कार्यवाही नहीं होगी, तो साहब उसे जान से भी मरवा सकता है और उसका नौकरी करना तो मुश्किल कर ही देगा. इसके बावजूद राज्य शासन ने अब तक कुछ नहीं किया है.

    मामले की गंभीरता को देखते हुए संपूर्ण व्यौरे और मोबाइल पर हुए वार्तालाप की सीडी के साथ एक शिकायत द.पू.म.रे. के एसडीजीएम/सीवीओ को की गई. तथ्यों को समझने और मामले की जटिलता को देखने के बाद एसडीजीएम भी अपने दायित्व से भाग खड़े हुए. यह जानते हुए भी कि इसमें गलत लोगों का चयन हो रहा है, फिर भी साहब को हटाकर नई कमेटी बनाने तथा दुबारा परीक्षा की सिफारिश करने की जिम्मेदारी से एसडीजीएम क्यों भाग खड़े हुए, यह संदेह के घेरे में है. दूसरी बात यह कि यह केस सतर्कता विभाग को पका-पकाया मिल रहा था, जिसमें उसे इसके सिवाय कुछ नहीं करना था कि नागपुर के दलाल यानि संबंधित लोको निरीक्षक को बुलाकर सीडी में रिकॉर्ड तथ्यों और काल डिटेल से दिन एवं समय का मिलान करके उनकी पुष्टि कर लेने मात्र से सारा अपराध सिद्ध हो जाता. परंतु जब सतर्कता विभाग अथवा खुद एसडीजीएम ही भ्रष्टाचार की स्वयंसिद्ध शिकायत को नजरंदाज करें, उस पर लीपापोती करने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस सतर्कता रूपी सफेद हाथी को आखिर रेलवे ने क्यों पाल रखा है?

    सही मायने में रेलवे का यह कथित सतर्कता विभाग छोटे कर्मचारियों के छोटे भ्रष्टाचार पर कार्यवाही को ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है. जहां गंभीर शिकायतों अथवा अधिकारियों पर कार्यवाही की बात आती है, वहां यह हमजोली बनकर भाईचारा निभाने लगते हैं. यहां ज्ञातव्य है कि रेलवे का सतर्कता विभाग ही एक ऐसा विभाग है, जहां सारा स्टाफ रेलवे का ही होता है. उन्हें इस बात का पूरा अनुभव होता है कि भ्रष्टाचार के लूपहोल कहां-कहां और कैसे-कैसे होते हैं, ऐसे में समुचित कार्यवाही करके उस पर पर्याप्त लगाम लगाई जा सकती है. तथापि यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसका एक ही अर्थ निकलता है कि भ्रष्टाचार के हमाम में सभी नंगे हैं.

    शिकायतकर्ता को जब यहां से न्याय नहीं मिला, तो उसने सीडी और संपूर्ण व्यौरे के साथ एक और शिकायत महाप्रबंधक/द.पू.म.रे. को दी. लेकिन यहां से भी उसे निराश होना पड़ा. उसको ऐसा महसूस होने लगा कि उसने शिकायत करके बहुत बड़ा अपराध कर दिया है और अपनी जान जोखिम में डाल ली है. उधर साहब जितना जल्दी हो परीक्षा की कापियां जांच कर जल्दी से जल्दी पैनल आउट करने में जोरशोर से जुट गए. शिकायतकर्ता को मदद करने वाले एक व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ एक पत्र देकर अपने दलाल मुख्य क्रू-नियंत्रक एवं लोको निरीक्षक के माध्यम से तोरवा थाना, बिलासपुर में एक झूठी शिकायत दर्ज करा दी. इसकी प्रतिलिपि एसपी/बिलासपुर को भी भेज दी. साहब यह सब इसलिए कर रहे थे कि जिससे उनके अपराध से लोगों का ध्यान भटक जाए और वह चुपके से घूस की मोटी रकम लेकर निकल जाएं. परंतु उनकी इन कायराना हरकतों पर विराम तब लग गया, जब मजबूर शिकायतकर्ता अपनी फरियाद लेकर सीधे छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के पास पहुंच गया.

    मामले के गंभीरता और किसी तरफ से कार्यवाही न होने की बात को चीफ जस्टिस ने गंभीरता से लेते हुए पीआईएल सेक्शन को आदेशित किया कि पहले संबंधितों को पत्र लिखकर कार्यवाही करने की हिदायत दी जाए. अतिरिक्त रजिस्ट्रार ने एसपी/बिलासपुर, एसपी/सीबीआई रायपुर और जीएम/द.पू.म.रे. को पत्र भेजकर मामले में कार्यवाही करने के लिए कहा. इसके बाद ही सबके कान में जूं रेंगी. लेकिन खबर लिखे जाने तक आरोपियों से कोई पूछताछ की नहीं की गई है. आरोपी साहब को निलंबित अथवा स्थानांतरित भी नहीं किया गया, न ही परीक्षा निरस्त कर दुबारा कराने का निर्णय लिया गया है. सिर्फ यही पता चला है कि पीसीपीओ ने सीनियर डीपीओ, बिलासपुर से उक्त परीक्षा से संबंधित फाइल तलब की है.

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