कथित कोहरे के नाम पर सैकड़ों गाड़ियां रद्द, परेशान होते लाखों रेलयात्री

    होली की भीड़ और समर सीजन शुरू होने के बावजूद सोया है रेल प्रशासन

    ‘फॉग’ के नाम पर रेलयात्रियों को आखिर कब तक दिग्भ्रमित किया जाएगा?

    कोहरा सिर्फ कथित गैर-जरूरी ट्रेनों यानि सवारी गाड़ियों के लिए ही क्यों पड़ता है?

    उमेश शर्मा, ब्यूरो प्रमुख, प्रयागराज

    सैकड़ों ट्रेनें पिछले लगभग तीन महीनों से रद्द हैं. अभी यह प्रक्रिया 31 मार्च तक जारी रहने वाली है. ऐसी सूचना रेल मंत्रालय और रेल प्रशासन ने दी है. इससे हजारों-लाखों रेलयात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा 21 मार्च को होली का त्यौहार भी सिर पर आ गया है. तथापि आम्रपाली एक्सप्रेस और संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस जैसी अन्य तमाम लोकप्रिय ट्रेनों को पूर्ववत बहाल नहीं किया गया है, बल्कि ऐसी ट्रेनों को भी बिना किसी पूर्व सूचना के रद्द किया गया. यह सब बिना किसी नियोजन और कोहरे के नाम पर किया गया है, जबकि इस शीत सीजन में उत्तर भारत के लगभग किसी भी क्षेत्र में लंबे समय तक घना कोहरा नहीं पड़ा. इससे लाखों यात्रियों को भारी परेशानी हो रही है. होली की भीड़ के साथ ही अब पीक समर सीजन भी शुरू हो गया है, फिर भी रद्द की गई ऐसी तमाम ट्रेनें शुरू नहीं की जा रही हैं. ऐसे में हजारों रेलयात्री भारतीय रेल की ट्रैफिक प्लानिंग पर लानत भेज रहे हैं.

    कोहरे के नाम पर रद्द की गई सैकड़ों यात्री ट्रेनों के कारण आरक्षित कोचों में अनारक्षित यात्रियों के घुसने से न सिर्फ आरक्षित यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि यात्रियों में आपसी मारपीट के कारण कई बार कानून-व्यवस्था बिगड़ने की भी स्थिति पैदा हो रही है. इसके अलावा आम चुनावों के मद्देनजर यात्रियों एवं सामान्य जनता के बीच सरकार की छवि खराब करने का भी आरोप रेल प्रशासन पर लग रहा है.

    रेलयात्रियों एवं जनमानस की परेशानियों के लिए रेलयात्री सरकार और रेल प्रशासन की नियोजन संबंधी असफलता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उतर मध्य रेलवे जोन में झांसी मंडल में पिछले तीन माह से झांसी-लखनऊ इंटरसिटी एवं झांसी-लखनऊ पैसेंजर पिछले तीन महीनों से रद्द चल रही है. यह दोनों ट्रेनें बिना किसी नियोजन और कोहरे के नाम पर रद्द की गई हैं. जबकि इस शीत सीजन में उत्तर भारत के लगभग किसी भी क्षेत्र में घना कोहरा नही पड़ा. इससे झांसी, चिरगांव, मोठ, उरई, कालपी, पुखराया, भीमसेन, कानपुर जाने वाले हजारों दैनिक कामकाजी यात्रियों और व्यापारियों तथा शहर, कस्बाई एवं ग्रामीण अंचलों से आने-जाने वाले हजारों ग्रामीणों का प्रतिदिन का आना जाना है. यात्रियों द्वारा सवाल उठाया जा रहा है कि रद्द की गई इन गाड़ियों से रेलवे को हो रही आर्थिक क्षति और होली त्यौहार पर लाखों यात्रियों तथा जनसामान्य को हो रही परेशानियों का जिम्मेदार कौन है?

    गाड़ियों के पुनः संचालन के संबंध में जब समबन्धित अधिकारियों से पूछा गया कि झांसी से कानपुर के लिए संचालित होने वाली कितनी ट्रेनें कब से रद्द चल रही हैं. इस पर उनका सिर्फ इतना ही कहना था कि लिस्ट देखनी पड़ेगी. उन्होंने यह भी कहा कि मैंने जनवरी से यह लिस्ट नहीं देखी है. उनसे जब यह पूछा गया कि रद्द ट्रेनें पुनः कब से संचालित होंगी, तो उनका कहना था कि 31 मार्च तक तो फिलहाल रद्द हैं, उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा.

    इस संबंध में फोन पर जब उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) गौरव कृष्ण बंसल से संपर्क करके जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कहा कि वह इस वक्त जीएम मीटिंग हैं. उन्होंने बाद में बात करने को कहा. झांसी मंडल के पीआरओ मनोज सिंह ने फोन पर बताया कि मुख्यालय से ट्रेन रद्द के आदेश हैं. रेलमंत्री और रेल प्रशासन की गुणवत्ताविहीन व्यवस्था का खामियाजा आने वाले आम चुनावों के मद्देनजर यात्रियों तथा जनसामान्य के बीच सरकार की छवि खराब होने से इंकार नहीं किया जा सकता.

    उधर उत्तर रेलवे, फिरोजपुर मंडल के यात्रियों में भी कई इंटरसिटी और डेमू ट्रेनों के रद्द चलने से भारी नाराजगी है. बटला की फिल्म पत्रकार शगन ने ‘रेल समाचार’ को टैग एक ट्वीट में कहा कि अब तो मीडिया भी प्रधानमंत्री, रेलमंत्री और महाप्रबंधक से पूछ रहा है कि उसके रेल अधिकारी काम क्यों नहीं कर रहे हैं? उनका कहना है कि यदि जमीनी हकीकत देखी जाए तो रेलवे की कार्य-प्रणाली से आम तबका अत्यंत दुखी है. उन्होंने लिखा है कि यदि गाड़ी सं. 74643/42 को साल में सिर्फ छह महीने ही चलना है, तो इससे बेहतर होगा कि इस ट्रेन को बंद ही कर दिया जाए.

    इसके अलावा गुवाहटी के निवासी सतीश भरतिया ने लिखा है कि हर साल भारतीय रेल द्वारा ढ़ाई हजार करोड़ रुपये की एंटी-फॉग डिवाइस खरीदने में खर्च किए जाते हैं, मगर फिर भी हर साल हजारों सवारी गाड़ियों को फॉग के नाम पर हर साल महीनों रद्द रखा जाता है. इसके बावजूद कुछ वीआईपी ट्रेनों को छोड़कर कोई भी ट्रेन निर्धारित समय पर नहीं चलती है. वहीं एक अन्य ट्वीटर यूजर मनीष भडांग ने लिखा है कि भारतीय रेल का उद्देश्य तेजी से बदल रहा है. अब इसे कुछ ‘एलीट’ वर्ग के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सीधे प्राइवेट ट्रांसपोर्टर में परिवर्तित किया जा रहा है.

    गाड़ियों के अनावश्यक रद्दीकरण के संबंध में पूर्वोत्तर रेलवे के पूर्व महाप्रबंधक राजीव मिश्रा ने ‘रेल समाचार’ द्वारा किए गए एक ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सामान्यतः हर साल कुछ कम जरूरी ट्रेनों को उत्तर भारत में भारी कोहरे के सीजन के मद्देनजर 30 नवंबर से 15 फरवरी तक डेढ़ महीने के लिए अमूमन रद्द किया जाता है. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि परंतु अब यात्री/सवारी गाड़ियों को पुनर्संचलित करने में कोई कठिनाई नहीं है, क्योंकि मार्च महीने में कहीं भी कोहरा नहीं है और साथ ही होली की भीड़ भी शुरू हो गई है.

    अब सवाल यह उठता है कि कोहरा क्या सिर्फ कथित गैर-जरूरी ट्रेनों यानि सवारी गाड़ियों के लिए पड़ता है? क्या यह राजधानी, शताब्दी, दुरंतो इत्यादि प्रीमियम यानि वीआईपी ट्रेनों के लिए नहीं होता है? ऐसे में सिर्फ सवारी गाड़ियां ही क्यों हर साल रद्द की जाती हैं? क्या इसलिए कि इन सवारी गाड़ियों में दीन-हीन मजदूर वर्ग के लोग और कम आय वर्ग के दैनिक कामकाजी लोग यात्रा करते हैं? इसके अलावा कोहरे के नाम पर हर साल जो हजारों करोड़ रुपये की बरबादी और कदाचार हो रहा है, उसका क्या? फॉग डिवाइस के नाम पर हर साल रेलयात्रियों को जो ख्वाब दिखाए जाते हैं, उसका क्या? इस सबका सीधा अर्थ यह है कि कोहरे को लेकर रेल प्रशासन की रीति-नीति सही नहीं है. संबंधित रेल अधिकारियों का यातायात नियोजन और कार्य-प्रणाली संदिग्ध है. उनकी इस अकर्मण्यता का अंत होना चाहिए और शीत सीजन में यात्रियों को कोहरे के नाम पर परेशान किया जाना बंद किया जाना चाहिए.

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