ट्रैफिक निदेशालय की अकर्मण्यता के चलते प्रभावहीन हो रहा रेल प्रशासन

    ‘ओब्लाइज’ करने वाले चुनिंदा अधिकारियों की होती है बिलासपुर में पोस्टिंग

    ट्रैफिक निदेशालय द्वारा सुविधानुसार मैनेज होता है सीओएम/द.पू.म.रे. का पद

    कोलकाता से भुवनेश्वर की पट्टी में निदेशालय द्वारा दी जा रही भ्रष्टाचार को प्रश्रय

    भ्रष्टाचार में लिप्त जीएम/द.पू.म.रे. के अबतक के कामकाज की जांच कराने की मांग

    यूनियन को ‘ओब्लाइज’ करने के चक्कर में ईमानदार अधिकारी को नहीं मिला न्याय

    सुरेश त्रिपाठी

    तमाम जद्दोजहद के बाद अंततः जीएम/द.पू.म.रे. ने मंगलवार, 30 जनवरी को प्रिंसिपल सीसीएम/द.पू.म.रे. के पद से शिवराज सिंह को कार्यमुक्त कर दिया है. परंतु उन्होंने अब तक गोरखपुर के लिए प्रस्थान नहीं किया है, क्योंकि 31 जनवरी को वाणिज्य स्टाफ ने उन्हें विदाई देने हेतु लंच पर आमंत्रित किया है. इसी के साथ पी. के. जेना भी सीपीटीएम/द.पू.रे., कोलकाता के पद से कार्यमुक्त होकर बुधवार, 31 जनवरी को शिवराज सिंह की जगह बतौर प्रिंसिपल सीसीएम/द.पू.म.रे. अपना नया पदभार संभालने बिलासपुर के लिए निकल गए हैं. तथापि, शिवराज सिंह के बिलासपुर में बने रहते जीएम द्वारा श्री जेना को चार्ज सौंपा जाएगा, इसमें कुछ अधिकारियों ने फिलहाल संदेह व्यक्त किया है. इसके अलावा प्रिंसिपल सीओएम/द.पू.म.रे. के पद पर एसडीजीएम/पूर्व रेलवे यू. के. बल का भी पोस्टिंग ऑर्डर रेलवे बोर्ड से जारी कर दिया गया है.

    फोटो परिचय : दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे मुख्यालय, बिलासपुर में मंगलवार, 30 जनवरी को प्रिंसिपल सीसीएम/द.पू.म.रे. शिवराज सिंह को विदाई देते हुए जीएम/द.पू.म.रे. सुनील सिंह स्वाईं.

    ‘रेलवे समाचार’ को अपने विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार शिवराज सिंह के मामले में जीएम/द.पू.म.रे. ने रेलवे बोर्ड को पिछले करीब दस दिनों तक गुमराह किया और उन्हें कैट से अपना ट्रांसफर रुकवाने का स्थगनादेश ले आने का मौका मुहैया कराया. परंतु समान पद पर ट्रांसफर किए जाने के कारण कैट ने रेल प्रशासन के निर्णय में कोई हस्तक्षेप करने से स्पष्ट इंकार कर दिया. उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड के आदेश पर 23 जनवरी को द.पू.म.रे. मुख्यालय से प्रिंसिपल सीसीएम/द.पू.म.रे. का चार्ज प्रिंसिपल सीओएम/द.पू.म.रे. को सौंपे जाने का जो आदेश निकाला गया था, वह वास्तव में रेलवे बोर्ड की आँखों में धूल झोंकने के लिए था, क्योंकि चार्ज रिलिंक्विश किए जाने के उक्त कथित आदेश के बाद भी वह कार्यालय में बैठकर लगातार फाइलें निपटा रहे थे और मेटल पास आदि भी जमा नहीं कराया था. कई वरिष्ठ अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि जीएम की सहमति या शह के बिना ऐसा कोई काम संभव नहीं हो सकता है.

    द.पू.म.रे. मुख्यालय बिलासपुर स्थित हमारे विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पोस्टिंग के कुछ समय बाद तक जीएम की सीसीएम से पटरी नहीं बैठ रही थी. परंतु ‘पटाने में माहिर’ सीसीएम ने अंततः जीएम को पटा ही लिया था. सूत्रों का कहना है कि इसी के परिणामस्वरूप सीसीएम की कोई फाइल जीएम के पास नहीं अटकती थी, जबकि अन्य विभाग प्रमुखों की फाइलें महीनों तक जीएम कार्यालय में पड़ी रहती हैं और संबंधित विभाग प्रमुखों को कहा जाता है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में ही फाइलों को निपटाया करें.

    सूत्रों का यह भी कहना है कि कामकाज से पूरी तरह निर्लिप्त और अनभिज्ञ जीएम की रुचि सिर्फ वसूली, पार्टीबाजी और फेसबुक पर अपनी तमाम ऊलजलूल गतिविधियों की फोटो पोस्ट करने में ही रहती है. कई वरिष्ठ अधिकारियों का तो यह भी कहना है कि आधे से अधिक वर्तमान जीएम और डीआरएम ऐसे हैं, जिन्होंने कभी कोई काम नहीं किया, इसीलिए उनकी एसीआर हमेशा आउटस्टैंडिंग रही है और इसीलिए आज वह अपने इसी नाकारेपन के कारण उच्च पदों पर विराजमान हैं, जबकि इन सभी की विश्वसनीयता और कार्यक्षमता सिरे से संदिग्ध है. द.पू.म.रे. मुख्यालय के लगभग सभी विभाग प्रमुखों सहित तमाम कर्मचारियों ने जीएम के अब तक के समस्त कामकाज की विजिलेंस से आतंरिक जांच कराए जाने की मांग की है.

    उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि उपरोक्त तीनों वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारी अपनी वर्तमान जगह/शहर छोड़ने को तैयार नहीं थे. इसके लिए ट्रैफिक निदेशालय, रेलवे बोर्ड से लेकर तीनों जोनल मुख्यालयों तक कुटिल अंदरूनी और विभागीय राजनीति हुई और इस सबके लिए सीआरबी को निशाना बनाया गया तथा उनके विरुद्ध अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग में भी शिकायत किए जाने के साथ ही उन तक कई माध्यमों से यह धमकी भी पहुंचाई गई कि यदि वह ये तबादले रद्द नहीं करते हैं, तो उन्हें आयोग में इसका अपमानजनक खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

    सूत्रों का कहना है कि इस सारे मामले में उत्तर रेलवे के बदनाम ‘थ्री-के’ सहित उसके जैसे कई चोर, चापलूस, चरित्रहीन अधिकारियों के भी तार जुड़े हुए थे, जो दरबदर होने के बाद से बदले की भावना के चलते सीआरबी के खिलाफ साजिशें रचने में लगे हुए हैं. जबकि पूरे इस मामले में ट्रैफिक निदेशालय की भूमिका पूरी तरह से संदिग्ध रही है, क्योंकि सभी संबंधित ट्रांसफर ऑर्डर पर अमल कराने हेतु उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति का प्रयोग नहीं किया और सीआरबी के खिलाफ माहौल को भड़काने में प्रमुख भूमिका निभाई.

    इसके साथ ही बिलासपुर जैसे अत्यंत कमाऊ मंडल एवं द.पू.म.रे. मुख्यालय में खासतौर पर उन चुनिंदा ट्रैफिक अधिकारियों की पोस्टिंग में ट्रैफिक निदेशालय की विशेष रुचि देखने को मिलती है, जो कि ट्रैफिक निदेशालय में बैठे उच्च अधिकारियों को पर्याप्त मोबदला देने में अपनी सहमति दर्शाते हैं. ट्रैफिक निदेशालय की अकर्मण्यता और ट्रैफिक अधिकारियों की पोस्टिंग/ट्रांसफर के पीछे छिपे हुए भारी भ्रष्टाचार का प्रमाण यह है कि जब सीओएम के पद से सुरजीत दास को ट्रांसफर किया गया था, तब इसी ट्रैफिक निदेशालय ने कैट में उनके खिलाफ यह कहा था कि चूंकि उसे यहां सीओएम की पोस्ट को अपग्रेड करना है, इसलिए सुरजीत दास (एसएजी) का ट्रांसफर किया गया है. परंतु अब सुरजीत दास (एचएजी) को यह अवसर दिए जाने के बजाय पुनः उसी पोस्ट को डाउनग्रेड करके यू. के. बल (एसएजी) को पदस्थ किया गया है.

    कई उच्च अधिकारियों का कहना है कि उपरोक्त तिकड़मबाजी से स्पष्ट जाहिर है कि कोलकाता-बिलासपुर-भुवनेश्वर की पट्टी में कुछ चुनिंदा ट्रैफिक अधिकारियों की पोस्टिंग करके लंबे समय से ट्रैफिक निदेशालय द्वारा भारी भ्रष्टाचार को प्रश्रय दी जा रही है. उनका कहना है कि निवृत्त सीओएम ने भी जूनियर स्केल से एचएजी तक अपनी लगभग पूरी सेवा बिलासपुर में ही की और सिर्फ डीआरएम बनने पर ही यहां से बाहर गए थे. उन्होंने बताया कि वर्तमान जीएम (आईआरएसईई) भी बिलासपुर में ही एडीआरएम रहे हैं और काम की जानकारी न होने पर तत्कालीन डीआरएम की खूब डांट खाते थे, उन्हें भी बखूबी मालूम है कि यहां ट्रैफिक/कमर्शियल में अवैध कमाई की कितनी असीम संभावनाएं मौजूद हैं. यही कारण है कि उनका भी सारा ध्यान सिर्फ कमाई पर ही लगा रहता है.

    उधर, दक्षिण रेलवे में यूनियन के घोषित गुलाम जीएम की अकर्मण्यता और भ्रष्ट सीओएम एवं सीसीएम की समस्त कुटिल राजनीति से बखूबी वाकिफ ट्रैफिक निदेशालय अथवा रेलवे बोर्ड से न्याय न मिलने के कारण एक ईमानदार ट्रैफिक अधिकारी को लंबी छुट्टी पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इसके अलावा इसमें भी शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि लंबे समय से ट्रैफिक निदेशालय भी यूनियन का गुलाम रहा है. यही वजह है कि येनकेन प्रकारेण जब उक्त अधिकारी को मात देने के लिए ट्रैफिक निदेशालय, जीएम, सीओएम/सीसीएम को कोई हथियार नहीं मिला, तो सुरजीत दास के जैसा ही बहाना बनाकर और यह कहकर कैट को भी गुमराह किया गया कि न तो उसे मंडल से बाहर भेजा रहा है और न ही उसको वर्तमान से नीची पोस्ट पर पदस्थ किया जा रहा है. इस तरह की चालाकियों के चलते उपरोक्त सभी अकर्मण्य एवं भ्रष्ट लोगों ने उक्त अधिकारी को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है.

    इसके अलावा ‘रेलवे समाचार’ को रेलवे बोर्ड के अपने विश्वसनीय सूत्रों से यह भी खबर मिली है कि अब किसी भी अधिकारी की प्रिंसिपल ईडी/कैटरिंग की पोस्ट पर जाने में अनिच्छा के चलते शायद अब ‘कैटरिंग’ को एएम/टीएंडसी संजीव गर्ग के पास ही यथावत रखा जाने वाला है. सूत्रों का कहना है कि ‘रेलवे समाचार’ की खबर के बाद इस ‘अलगाव’ के बारे में पीएमओ द्वारा सवाल उठाया गया है और यह पूछा गया है कि उसकी अनुमति के बिना ऐसा कैसे किया गया है? इस पर रेलवे बोर्ड को कोई जवाब देते नहीं बन रहा है. ‘रेलवे समाचार’ को यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि दक्षिण रेलवे में यूनियन को ओब्लाइज करने सहित ट्रैफिक/कमर्शियल विभाग में उपरोक्त तमाम संदिग्ध गतिविधियां सिर्फ रीढ़हीन ट्रैफिक निदेशालय की अकर्मण्यता अथवा नपुंशकता के चलते ही संभव हो पा रही हैं.

सम्पादकीय